Saturday, June 23, 2018

रामायण के अनुसार नारी गहने क्यों पहनती हैं? भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों?’’ . ‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था। . ‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’ ‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’ ‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’ मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’ ‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’ ‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’’ ‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’ ‘‘बेंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’ ‘‘यह नथ क्यों?’’ ‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’’ ‘‘और यह टीका?’’ ‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’ ‘‘और यह बंदनी क्यों?’’ ‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’ ‘‘पत्ती का अर्थ?’’ ‘‘पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।’’ ‘‘कर्णफूल क्यों?’’ ‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।’’ ‘‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?’’ ‘‘हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’ ‘‘मोहनलता क्यों?’’ ‘‘मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’ ‘‘नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री?’’ ‘‘पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कडे का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा, छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बडियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’ ‘‘माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है?’’ ‘‘बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’ ‘‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे... राम राम

रामायण के अनुसार नारी गहने क्यों पहनती हैं?

भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों?’’
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‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था।
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‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’
‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’
‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’
मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’
‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’
‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’’
‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’
‘‘बेंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’
‘‘यह नथ क्यों?’’
‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’’
‘‘और यह टीका?’’
‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’
‘‘और यह बंदनी क्यों?’’
‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’
‘‘पत्ती का अर्थ?’’
‘‘पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।’’
‘‘कर्णफूल क्यों?’’
‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।’’
‘‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?’’
‘‘हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’
‘‘मोहनलता क्यों?’’
‘‘मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’
‘‘नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री?’’
‘‘पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कडे का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा, छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बडियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’
‘‘माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है?’’
‘‘बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’
‘‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे...

राम राम

रुद्राभिषेक का महत्च :- . . भोलेनाथ महादेव हर रूप में भक्तों का कल्याण करते महादेव को प्रसन्न करने का रामबाण उपाय है रुद्राभिषेक। जानकारों की मानें तो सही समय पर रुद्राभिषेक करके आप शिव से मनचाहा वरदान पा सकते हैं। क्योंकि शिव के रुद्र रूप को बहुत प्रिय है रुद्र अभिषेक तो आइए जानते हैं रुद्राभिषेक के लिए लाभकारी मंत्र। ऐसे करें अभिषेकसावन के महीने में भगवान शिव के शिवलिंग रूप का अभिषेक करें। . १) पंचाक्षरी मंत्र के साथ दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, पंचामृत, इत्र, फलों के रस, गंगाजल के बाद शुद्ध जल से अभिषेक कराएं। २) चने की दाल, सरसों तेल, काले तिल, आदि कई सामग्रियों से महादेव का अभिषेक करें। इसके बाद फूल, दूर्वा, बिल्वपत्र, आकपुष्प, धतूरा, कनेल आदि चढ़ाएं। अभ्रक, भांग आदि अर्पित करने के बाद नैवेद्य, फलों से भाग लगाएं। श्रीफल भेंट करने के बाद धूप-दीप से आरती करें। अभिषेक के दौरान पूजन विधि के साथ-साथ मंत्रों का जाप भी बेहद आवश्यक माना गया है। अभिषेक मंत्र न बने तो फिर महामृत्युंजय मंत्र का जाप हो, गायत्री मंत्र हो या शिव भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। महामृत्युंजय मंत्र . ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ रुद्राभिषेक की महिमाभगवान शिव बड़े ही सरल और सहज हैं। उनका आशीर्वाद भक्त को क्षण मात्र की भक्ति से प्राप्त हो जाता है। भगवान भोलेनाथ को रुद्राभिषेक सबसे ज्यादा प्रिय है। पुराणों में वर्णन आता है कि रुद्राभिषेक से शिवजी को प्रसन्न करके आप असंभव को भी संभव बना सकते हैं। अपने भविष्य को शिव स्त्रोत्र के जाप से संवार सकते हैं। मनोवांछित फल पाने के लिए . नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वरायनित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥ मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वरायमंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥ शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकायश्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥ अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।। निरोगी जीवन के लिए . सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ।। कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय। सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे।। इसका करें पाठ . नमामिशमीशान निर्वाण रूपं। विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं।। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाश माकाश वासं भजेयम।। निराकार मोंकार मूलं तुरीयं। गिराज्ञान गोतीत मीशं गिरीशं।। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसार पारं नतोहं।। तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूति कोटि प्रभा श्री शरीरं।। स्फुरंमौली कल्लो लीनिचार गंगा। लसद्भाल बालेन्दु कंठे भुजंगा।। चलत्कुण्डलं भू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननम नीलकंठं दयालं।। म्रिगाधीश चर्माम्बरम मुंडमालं। प्रियम कंकरम सर्व नाथं भजामि।। प्रचंद्म प्रकिष्ट्म प्रगल्भम परेशं। अखंडम अजम भानु कोटि प्रकाशम।। त्रयः शूल निर्मूलनम शूलपाणीम। भजेयम भवानी पतिम भावगम्यं।। कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्ज्नानंद दाता पुरारी।। चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।। न यावत उमानाथ पादार विन्दम। भजंतीह लोके परे वा नाराणं।। न तावत सुखं शान्ति संताप नाशं। प्रभो पाहि आपन्न मामीश शम्भो । जय शिव भोले

रुद्राभिषेक का महत्च :-
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भोलेनाथ महादेव हर रूप में भक्तों का कल्याण करते महादेव को प्रसन्न करने का रामबाण उपाय है रुद्राभिषेक। जानकारों की मानें तो सही समय पर रुद्राभिषेक करके आप शिव से मनचाहा वरदान पा सकते हैं। क्योंकि शिव के रुद्र रूप को बहुत प्रिय है रुद्र अभिषेक तो आइए जानते हैं रुद्राभिषेक के लिए लाभकारी मंत्र।

ऐसे करें अभिषेकसावन के महीने में भगवान शिव के शिवलिंग रूप का अभिषेक करें। 
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१) पंचाक्षरी मंत्र के साथ दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, पंचामृत, इत्र, फलों के रस, गंगाजल के बाद शुद्ध जल से अभिषेक कराएं।
२) चने की दाल, सरसों तेल, काले तिल, आदि कई सामग्रियों से महादेव का अभिषेक करें।

इसके बाद फूल, दूर्वा, बिल्वपत्र, आकपुष्प, धतूरा, कनेल आदि चढ़ाएं। अभ्रक, भांग आदि अर्पित करने के बाद नैवेद्य, फलों से भाग लगाएं।

श्रीफल भेंट करने के बाद धूप-दीप से आरती करें। अभिषेक के दौरान पूजन विधि के साथ-साथ मंत्रों का जाप भी बेहद आवश्यक माना गया है।

अभिषेक मंत्र न बने तो फिर महामृत्युंजय मंत्र का जाप हो, गायत्री मंत्र हो या शिव भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें।

महामृत्युंजय मंत्र
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ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

रुद्राभिषेक की महिमाभगवान शिव बड़े ही सरल और सहज हैं। उनका आशीर्वाद भक्त को क्षण मात्र की भक्ति से प्राप्त हो जाता है। भगवान भोलेनाथ को रुद्राभिषेक सबसे ज्यादा प्रिय है। पुराणों में वर्णन आता है कि रुद्राभिषेक से शिवजी को प्रसन्न करके आप असंभव को भी संभव बना सकते हैं। अपने भविष्य को शिव स्त्रोत्र के जाप से संवार सकते हैं।

मनोवांछित फल पाने के लिए
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नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वरायनित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वरायमंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकायश्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।

निरोगी जीवन के लिए
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सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ।।

कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे।।

इसका करें पाठ
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नमामिशमीशान निर्वाण रूपं।
विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाश माकाश वासं भजेयम।।

निराकार मोंकार मूलं तुरीयं।
गिराज्ञान गोतीत मीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसार पारं नतोहं।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं।
मनोभूति कोटि प्रभा श्री शरीरं।।
स्फुरंमौली कल्लो लीनिचार गंगा।
लसद्भाल बालेन्दु कंठे भुजंगा।।
चलत्कुण्डलं भू सुनेत्रं विशालं।
प्रसन्नाननम नीलकंठं दयालं।।
म्रिगाधीश चर्माम्बरम मुंडमालं।
प्रियम कंकरम सर्व नाथं भजामि।।
प्रचंद्म प्रकिष्ट्म प्रगल्भम परेशं।
अखंडम अजम भानु कोटि प्रकाशम।।
त्रयः शूल निर्मूलनम शूलपाणीम।
भजेयम भवानी पतिम भावगम्यं।।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी।
सदा सज्ज्नानंद दाता पुरारी।।
चिदानंद संदोह मोहापहारी।
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।
न यावत उमानाथ पादार विन्दम।
भजंतीह लोके परे वा नाराणं।।
न तावत सुखं शान्ति संताप नाशं।
प्रभो पाहि आपन्न मामीश शम्भो ।

जय शिव भोले

देवालय दर्शन.... . . . देवालय जाकर बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे खड़े-खड़े दर्शन करते है। जबकि शास्त्रों के अनुसार यह गलत है। इसलिए मंदिर जाएं तो यह ध्यान रखें कि मंदिर में भगवान की मूर्ति के दर्शन हमेशा बैठकर करें। साथ ही दर्शन करते समय यह ध्यान रखें सबसे पहले मूर्ति के चरणों को देखें नतमस्तक होकर प्रार्थना करें। . फिर देवता के वक्ष पर, अर्थात् अनाहतचक्रपर मन एकाग्र करें व अंत में देव मूर्ति के नेत्रों की देखें व उनके रूप को अपने नेत्रोंमें बसाएं। मंदिर में कुछ भी मांगने या प्रार्थना करते समय दान लेने की, क्षमा याचना या आशीर्वाद लेने की अवस्था में बैठकर प्रार्थना करें। . इससे आपकी हर मनोकामना तो शीघ्र ही पूरी होगी। साथ ही मंदिर जाने के पूर्ण सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगेंगे। ☝हे परमात्मा आप की असीम कृपा मुझ पर बरस रही है मैं आप को प्रणाम करता हूँ ।

देवालय दर्शन....
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देवालय जाकर बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे खड़े-खड़े दर्शन करते है। जबकि शास्त्रों के अनुसार यह गलत है।
इसलिए मंदिर जाएं तो यह ध्यान रखें कि मंदिर में भगवान की मूर्ति के दर्शन हमेशा बैठकर करें। साथ ही दर्शन करते समय यह ध्यान रखें सबसे पहले मूर्ति के चरणों को देखें नतमस्तक होकर प्रार्थना करें।
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फिर देवता के वक्ष पर, अर्थात् अनाहतचक्रपर मन एकाग्र करें व अंत में देव मूर्ति के नेत्रों की देखें व उनके रूप को अपने नेत्रोंमें बसाएं। मंदिर में कुछ भी मांगने या प्रार्थना करते समय दान लेने की, क्षमा याचना या आशीर्वाद लेने की अवस्था में बैठकर प्रार्थना करें।
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इससे आपकी हर मनोकामना तो शीघ्र ही पूरी होगी। साथ ही मंदिर जाने के पूर्ण सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगेंगे।

☝हे परमात्मा आप की असीम कृपा मुझ पर बरस रही है मैं आप को प्रणाम करता हूँ ।

🌿भगवान् श्री कृष्ण को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामो से जाना जाता है। 🌿उत्तर प्रदेश मे कृष्ण या गोपाल,गोविन्द इत्यादि नामो से जानते हैं। 🌿राजस्थान मे श्रीनाथ जी या ठाकुर जी के नाम से जानते हैं। 🌿महाराष्ट्र मे बिट्ठल के नाम से जाने जाते हैं। 🌿उड़ीसा मे जगन्नाथ के नाम से जाने जाते हैं। 🌿बंगाल मे गोपालजी के नाम से जाने जाते हैं। 🌿दक्षिण भारत मे वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जातेहैं। 🌿गुजरात मे द्वारकाधीश के नाम से जाने जाते हैं। 🌿असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूवोर्त्तर क्षेत्रों मे कृष्ण नाम से ही पूजा होती है। 🌿मलेसिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंगलैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है। 🌿गोविन्द या गोपाल मे "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इंद्रियों , दोनो से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद मे गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश मे इंद्रियाँ हो वही गोविंद है गोपाल है। 🌿श्री कृष्ण के पिता का नाम वासुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था.. श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल मे हुआ था। 🌿श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद मे तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे। 🌿श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी मे उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग मे हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नही था।। 🌿श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु । 🌿दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था। 🌿श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। 🌿श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सांदीपनि से अलौकिक विद्याओं का ज्ञान अर्जित किया था।। 🌿श्री कृष्ण की कुल आयु 125 वर्ष थी। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ मे चार घोड़े जुड़े होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था। 🌿श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे। 🌿श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था। 🌿श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था। 🌿श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया 🌿श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट मे दे दिया था। 🌿श्री कृष्ण अवतार नही थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" 🌿सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--भगवद् गीता अध्याय 18, श्री कृष्ण 🌿सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मै सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत🌿 हरे कृष्णा...

🌿भगवान् श्री कृष्ण को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामो से जाना जाता है।

🌿उत्तर प्रदेश मे कृष्ण या गोपाल,गोविन्द इत्यादि नामो से जानते हैं।

🌿राजस्थान मे श्रीनाथ जी या ठाकुर जी के नाम से जानते हैं।

🌿महाराष्ट्र मे बिट्ठल के नाम से जाने जाते हैं।

🌿उड़ीसा मे जगन्नाथ के नाम से जाने जाते हैं।

🌿बंगाल मे गोपालजी के नाम से जाने जाते हैं।

🌿दक्षिण भारत मे वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जातेहैं।

🌿गुजरात मे द्वारकाधीश के नाम से जाने जाते हैं।

🌿असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूवोर्त्तर क्षेत्रों मे कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।

🌿मलेसिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंगलैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।

🌿गोविन्द या गोपाल मे "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इंद्रियों , दोनो से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद मे गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश मे इंद्रियाँ हो वही गोविंद है गोपाल है।

🌿श्री कृष्ण के पिता का नाम वासुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल मे हुआ था।

🌿श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद मे तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

🌿श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी मे उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग मे हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नही था।।

🌿श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।

🌿दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।

🌿श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था।

🌿श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सांदीपनि से अलौकिक विद्याओं का ज्ञान अर्जित किया था।।

🌿श्री कृष्ण की कुल आयु 125 वर्ष थी। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ मे चार घोड़े जुड़े होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।

🌿श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।

🌿श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।

🌿श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।

🌿श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया

🌿श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट मे दे दिया था।

🌿श्री कृष्ण अवतार नही थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्"

🌿सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--भगवद् गीता अध्याय 18,
श्री कृष्ण

🌿सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मै सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत🌿
      
हरे कृष्णा...

धार्मिक कार्य में मौली क्यों बांधते हैं ? . मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं। मौली का अर्थ : - 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है। मौली बांधने का मंत्र : - येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’ कैसी होती है मौली? मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव। मौली बांधने के नियम : - शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए। मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए। कब बांधी जाती है मौली? पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें। प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है। क्यों बांधते हैं मौली? मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं। किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं। मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है। इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है। मौली करती है रक्षा : - मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है। इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता। आध्यात्मिक पक्ष : - शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है। यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है। इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है। चिकित्सीय पक्ष : - प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है। हाथ में बांधे जाने का लाभ : - शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। कमर पर बांधी गई मौली : - कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते। मनोवैज्ञानिक लाभ : - मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है !

धार्मिक कार्य में मौली क्यों बांधते हैं ?
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मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।

मौली का अर्थ : - 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।

मौली बांधने का मंत्र : - 
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’

कैसी होती है मौली?

मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।

मौली बांधने के नियम : - शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।

कब बांधी जाती है मौली?

पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।

प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।

क्यों बांधते हैं मौली?

मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।

मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।*

हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।
इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

मौली करती है रक्षा : -  मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।

इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।

आध्यात्मिक पक्ष : - शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।

यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है।

इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है।

चिकित्सीय पक्ष : - प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।

हाथ में बांधे जाने का लाभ : - शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है।

कमर पर बांधी गई मौली : - कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।

मनोवैज्ञानिक लाभ : - मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है !

क्या होती है अक्षौहिणी सेना, कितने होते है सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ ..... महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र में हुए कौरव-पांडवों के युद्ध में कुल 18 अक्षौहिणी सेनाओं ने युद्ध किया था। इनमें से 11 अक्षौहिणी सेना कौरवों के पक्ष में थी, वहीं 7 ने पांडवों के पक्ष में युद्ध किया था। 1 अक्षौहिणी सेना में कितने रथ, हाथी, पैदल सैनिक व घोड़े होते हैं, इसके संबंध में महाभारत के पर्वसंग्रह पर्व के दूसरे अध्याय में विस्तार पूर्वक बताया गया है। आज हम आपको वही बता रहे हैं। एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सैनिक और तीन घोड़ों को मिलाकर पत्ति बनती है। पत्ति की तिगुनी संख्या को सेनामुख कहते हैं। तीन सेनामुख का एक गुल्म होता हैं। तीन गुल्म का एक गण, तीन गण की एक वाहिनी और तीन वाहिनियों की एक पृतना होती हैं। तीन पृतना की एक चमू, तीन चमू की एक अनीकिनी और 10 अनीकिनी की एक अक्षौहिणी होती है। इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर रथ होते हैं। इस गणना के अनुसार, एक अक्षौहिणी सेना में हाथी की संख्या भी इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर होती है। एक अक्षौहिणी सेना में पैदल सैनिकों की संख्या एक लाख नौ हज़ार तीन सौ पचास होती हैं। एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की संख्या पैंसठ हज़ार छः सौ दस बताई गई है। इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथ, इतने ही हाथी, 109350 सैनिक व 65610 घोड़े होते हैं।

क्या होती है अक्षौहिणी सेना, कितने होते है सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ .....

महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र में हुए कौरव-पांडवों के युद्ध में कुल 18 अक्षौहिणी सेनाओं ने युद्ध किया था। इनमें से 11 अक्षौहिणी सेना कौरवों के पक्ष में थी, वहीं 7 ने पांडवों के पक्ष में युद्ध किया था। 1 अक्षौहिणी सेना में कितने रथ, हाथी, पैदल सैनिक व घोड़े होते हैं, इसके संबंध में महाभारत के पर्वसंग्रह पर्व के दूसरे अध्याय में विस्तार पूर्वक बताया गया है। आज हम आपको वही बता रहे हैं।

एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सैनिक और तीन घोड़ों को मिलाकर पत्ति बनती है।

पत्ति की तिगुनी संख्या को सेनामुख कहते हैं। तीन सेनामुख का एक गुल्म होता हैं।

तीन गुल्म का एक गण, तीन गण की एक वाहिनी और तीन वाहिनियों की एक पृतना होती हैं।

तीन पृतना की एक चमू, तीन चमू की एक अनीकिनी और 10 अनीकिनी की एक अक्षौहिणी होती है।

इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर रथ होते हैं।

इस गणना के अनुसार, एक अक्षौहिणी सेना में हाथी की संख्या भी इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर होती है।

एक अक्षौहिणी सेना में पैदल सैनिकों की संख्या एक लाख नौ हज़ार तीन सौ पचास होती हैं।

एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की संख्या पैंसठ हज़ार छः सौ दस बताई गई है।

इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथ, इतने ही हाथी, 109350 सैनिक व 65610 घोड़े होते हैं।

Friday, June 22, 2018

बाज लगभग सत्तर वर्ष जीवित रहता है | परन्तु अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है | उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं | पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं | चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है | पंख भारी होकर उड़ान को सीमित कर देते हैं | भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं | उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं :- 1. देह त्याग दे | 2. गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे | 3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे" जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता | बाज चुनता है तीसरा रास्ता और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है | वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का | उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने का | नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है | और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का एक सौ पचास दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी इस पुनर्स्थापना के बाद वह तीस वर्ष और जीता है ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ | एक सौ पचास दिन न सही 50 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में | जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही विस्वास रखे इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी | धयान रखे की बिना विध्वंस के निर्माण नहीं होता .........

बाज लगभग सत्तर वर्ष जीवित रहता है | परन्तु अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है | उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं |

पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं | चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है |
पंख भारी होकर उड़ान को सीमित कर देते हैं | भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं |

उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं :-

1. देह त्याग दे |
2. गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे |
3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे"

जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता |

बाज चुनता है तीसरा रास्ता और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है | वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का | उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने का | नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है |
और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का एक सौ पचास दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी इस पुनर्स्थापना के बाद वह तीस वर्ष और जीता है ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ |

एक सौ पचास दिन न सही 50 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में | जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही विस्वास रखे इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी |

धयान रखे की बिना विध्वंस के निर्माण नहीं होता .........