Saturday, June 23, 2018

🌿भगवान् श्री कृष्ण को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामो से जाना जाता है। 🌿उत्तर प्रदेश मे कृष्ण या गोपाल,गोविन्द इत्यादि नामो से जानते हैं। 🌿राजस्थान मे श्रीनाथ जी या ठाकुर जी के नाम से जानते हैं। 🌿महाराष्ट्र मे बिट्ठल के नाम से जाने जाते हैं। 🌿उड़ीसा मे जगन्नाथ के नाम से जाने जाते हैं। 🌿बंगाल मे गोपालजी के नाम से जाने जाते हैं। 🌿दक्षिण भारत मे वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जातेहैं। 🌿गुजरात मे द्वारकाधीश के नाम से जाने जाते हैं। 🌿असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूवोर्त्तर क्षेत्रों मे कृष्ण नाम से ही पूजा होती है। 🌿मलेसिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंगलैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है। 🌿गोविन्द या गोपाल मे "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इंद्रियों , दोनो से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद मे गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश मे इंद्रियाँ हो वही गोविंद है गोपाल है। 🌿श्री कृष्ण के पिता का नाम वासुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था.. श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल मे हुआ था। 🌿श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद मे तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे। 🌿श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी मे उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग मे हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नही था।। 🌿श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु । 🌿दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था। 🌿श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। 🌿श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सांदीपनि से अलौकिक विद्याओं का ज्ञान अर्जित किया था।। 🌿श्री कृष्ण की कुल आयु 125 वर्ष थी। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ मे चार घोड़े जुड़े होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था। 🌿श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे। 🌿श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था। 🌿श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था। 🌿श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया 🌿श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट मे दे दिया था। 🌿श्री कृष्ण अवतार नही थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" 🌿सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--भगवद् गीता अध्याय 18, श्री कृष्ण 🌿सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मै सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत🌿 हरे कृष्णा...

🌿भगवान् श्री कृष्ण को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामो से जाना जाता है।

🌿उत्तर प्रदेश मे कृष्ण या गोपाल,गोविन्द इत्यादि नामो से जानते हैं।

🌿राजस्थान मे श्रीनाथ जी या ठाकुर जी के नाम से जानते हैं।

🌿महाराष्ट्र मे बिट्ठल के नाम से जाने जाते हैं।

🌿उड़ीसा मे जगन्नाथ के नाम से जाने जाते हैं।

🌿बंगाल मे गोपालजी के नाम से जाने जाते हैं।

🌿दक्षिण भारत मे वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जातेहैं।

🌿गुजरात मे द्वारकाधीश के नाम से जाने जाते हैं।

🌿असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूवोर्त्तर क्षेत्रों मे कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।

🌿मलेसिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंगलैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।

🌿गोविन्द या गोपाल मे "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इंद्रियों , दोनो से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद मे गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश मे इंद्रियाँ हो वही गोविंद है गोपाल है।

🌿श्री कृष्ण के पिता का नाम वासुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल मे हुआ था।

🌿श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद मे तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

🌿श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी मे उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग मे हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नही था।।

🌿श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।

🌿दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।

🌿श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था।

🌿श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सांदीपनि से अलौकिक विद्याओं का ज्ञान अर्जित किया था।।

🌿श्री कृष्ण की कुल आयु 125 वर्ष थी। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ मे चार घोड़े जुड़े होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।

🌿श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।

🌿श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।

🌿श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।

🌿श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया

🌿श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट मे दे दिया था।

🌿श्री कृष्ण अवतार नही थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्"

🌿सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--भगवद् गीता अध्याय 18,
श्री कृष्ण

🌿सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मै सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत🌿
      
हरे कृष्णा...

धार्मिक कार्य में मौली क्यों बांधते हैं ? . मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं। मौली का अर्थ : - 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है। मौली बांधने का मंत्र : - येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’ कैसी होती है मौली? मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव। मौली बांधने के नियम : - शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए। मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए। कब बांधी जाती है मौली? पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें। प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है। क्यों बांधते हैं मौली? मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं। किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं। मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है। इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है। मौली करती है रक्षा : - मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है। इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता। आध्यात्मिक पक्ष : - शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है। यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है। इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है। चिकित्सीय पक्ष : - प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है। हाथ में बांधे जाने का लाभ : - शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। कमर पर बांधी गई मौली : - कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते। मनोवैज्ञानिक लाभ : - मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है !

धार्मिक कार्य में मौली क्यों बांधते हैं ?
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मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।

मौली का अर्थ : - 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।

मौली बांधने का मंत्र : - 
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’

कैसी होती है मौली?

मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।

मौली बांधने के नियम : - शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।

कब बांधी जाती है मौली?

पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।

प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।

क्यों बांधते हैं मौली?

मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।

मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।*

हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।
इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

मौली करती है रक्षा : -  मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।

इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।

आध्यात्मिक पक्ष : - शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।

यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है।

इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है।

चिकित्सीय पक्ष : - प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।

हाथ में बांधे जाने का लाभ : - शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है।

कमर पर बांधी गई मौली : - कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।

मनोवैज्ञानिक लाभ : - मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है !

क्या होती है अक्षौहिणी सेना, कितने होते है सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ ..... महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र में हुए कौरव-पांडवों के युद्ध में कुल 18 अक्षौहिणी सेनाओं ने युद्ध किया था। इनमें से 11 अक्षौहिणी सेना कौरवों के पक्ष में थी, वहीं 7 ने पांडवों के पक्ष में युद्ध किया था। 1 अक्षौहिणी सेना में कितने रथ, हाथी, पैदल सैनिक व घोड़े होते हैं, इसके संबंध में महाभारत के पर्वसंग्रह पर्व के दूसरे अध्याय में विस्तार पूर्वक बताया गया है। आज हम आपको वही बता रहे हैं। एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सैनिक और तीन घोड़ों को मिलाकर पत्ति बनती है। पत्ति की तिगुनी संख्या को सेनामुख कहते हैं। तीन सेनामुख का एक गुल्म होता हैं। तीन गुल्म का एक गण, तीन गण की एक वाहिनी और तीन वाहिनियों की एक पृतना होती हैं। तीन पृतना की एक चमू, तीन चमू की एक अनीकिनी और 10 अनीकिनी की एक अक्षौहिणी होती है। इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर रथ होते हैं। इस गणना के अनुसार, एक अक्षौहिणी सेना में हाथी की संख्या भी इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर होती है। एक अक्षौहिणी सेना में पैदल सैनिकों की संख्या एक लाख नौ हज़ार तीन सौ पचास होती हैं। एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की संख्या पैंसठ हज़ार छः सौ दस बताई गई है। इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथ, इतने ही हाथी, 109350 सैनिक व 65610 घोड़े होते हैं।

क्या होती है अक्षौहिणी सेना, कितने होते है सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ .....

महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र में हुए कौरव-पांडवों के युद्ध में कुल 18 अक्षौहिणी सेनाओं ने युद्ध किया था। इनमें से 11 अक्षौहिणी सेना कौरवों के पक्ष में थी, वहीं 7 ने पांडवों के पक्ष में युद्ध किया था। 1 अक्षौहिणी सेना में कितने रथ, हाथी, पैदल सैनिक व घोड़े होते हैं, इसके संबंध में महाभारत के पर्वसंग्रह पर्व के दूसरे अध्याय में विस्तार पूर्वक बताया गया है। आज हम आपको वही बता रहे हैं।

एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सैनिक और तीन घोड़ों को मिलाकर पत्ति बनती है।

पत्ति की तिगुनी संख्या को सेनामुख कहते हैं। तीन सेनामुख का एक गुल्म होता हैं।

तीन गुल्म का एक गण, तीन गण की एक वाहिनी और तीन वाहिनियों की एक पृतना होती हैं।

तीन पृतना की एक चमू, तीन चमू की एक अनीकिनी और 10 अनीकिनी की एक अक्षौहिणी होती है।

इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर रथ होते हैं।

इस गणना के अनुसार, एक अक्षौहिणी सेना में हाथी की संख्या भी इक्कीस हज़ार आठ सौ सत्तर होती है।

एक अक्षौहिणी सेना में पैदल सैनिकों की संख्या एक लाख नौ हज़ार तीन सौ पचास होती हैं।

एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की संख्या पैंसठ हज़ार छः सौ दस बताई गई है।

इस प्रकार एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथ, इतने ही हाथी, 109350 सैनिक व 65610 घोड़े होते हैं।

Friday, June 22, 2018

बाज लगभग सत्तर वर्ष जीवित रहता है | परन्तु अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है | उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं | पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं | चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है | पंख भारी होकर उड़ान को सीमित कर देते हैं | भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं | उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं :- 1. देह त्याग दे | 2. गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे | 3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे" जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता | बाज चुनता है तीसरा रास्ता और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है | वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का | उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने का | नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है | और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का एक सौ पचास दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी इस पुनर्स्थापना के बाद वह तीस वर्ष और जीता है ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ | एक सौ पचास दिन न सही 50 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में | जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही विस्वास रखे इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी | धयान रखे की बिना विध्वंस के निर्माण नहीं होता .........

बाज लगभग सत्तर वर्ष जीवित रहता है | परन्तु अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है | उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं |

पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं | चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है |
पंख भारी होकर उड़ान को सीमित कर देते हैं | भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं |

उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं :-

1. देह त्याग दे |
2. गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे |
3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे"

जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता |

बाज चुनता है तीसरा रास्ता और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है | वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का | उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने का | नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है |
और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का एक सौ पचास दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी इस पुनर्स्थापना के बाद वह तीस वर्ष और जीता है ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ |

एक सौ पचास दिन न सही 50 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में | जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही विस्वास रखे इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी |

धयान रखे की बिना विध्वंस के निर्माण नहीं होता .........

ऋषि अष्टावक्र का शरीर कई जगह से टेढ़ा-मेढ़ा था, इसलिए वह सुन्दर नहीं दिखते थे । एक दिन जब ऋषि अष्टावक्र राजा जनक की सभा में पहुँचे तो उन्हें देखते ही सभा के सभी सदस्य हँस पड़े। ऋषि अष्टावक्र सभा के सदस्यों को हँसता देखकर वापिस लौटने लगे। यह देखकर राजा जनक ने ऋषि अष्टावक्र से पूछा- ‘‘भगवन ! आप वापिस क्यों जा रहे हैं ?’’ ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया- ‘‘राजन ! मैं मूर्खों की सभा में नहीं बैठता।’’ ऋषि अष्टावक्र की बात सुनकर सभा के सदस्य नाराज हो गए और उनमें से एक सदस्य ने क्रोध में बोल ही दिया - ‘‘हम मूर्ख क्यों हुए ? आपका शरीर ही ऐसा है तो हम क्या करें ?’’ तभी ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया - ‘‘तुम लोगों को यह नहीं मालूम कि तुम क्या कर रहे हो ! अरे, तुम मुझ पर नहीं, सर्वशक्तिमान ईश्वर पर हँस रहे हो । मनुष्य का शरीर तो हांडी की तरह है, जिसे ईश्वर रुपी कुम्हार ने बनाया है। हांडी की हँसी उड़ाना क्या कुम्हार की हँसी उड़ाना नहीं हुआ ?’’ अष्टावक्र का यह तर्क सुनकर सभी सभा सदस्य लज्जित हो गए और उन्होंने ऋषि अष्टावक्र से क्षमा मांगी । हम में से ज्यादातर लोग आमतौर पर किसी ना किसी व्यक्ति को देखकर हँसते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं कि वह कैसे भद्दा दिखता है या कैसे भद्दे कपड़े पहने हुए है । लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो हम परमात्मा का ही मजाक उड़ाते हैं ना कि उस व्यक्ति का । इन्सान के व्यक्तित्व का निर्माण उसका रंग, शरीर या कपड़ों से नहीं हुआ करता, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य के विचारों एवं उसके आचरण से हुआ करता है। 🙏🧡🙏

ऋषि अष्टावक्र का शरीर कई जगह से टेढ़ा-मेढ़ा था, इसलिए वह सुन्दर नहीं दिखते थे । एक दिन जब ऋषि अष्टावक्र राजा जनक की सभा में पहुँचे तो उन्हें देखते ही सभा के सभी सदस्य हँस पड़े। ऋषि अष्टावक्र सभा के सदस्यों को हँसता देखकर वापिस लौटने लगे।
यह देखकर राजा जनक ने ऋषि अष्टावक्र से पूछा- ‘‘भगवन ! आप वापिस क्यों जा रहे हैं ?’’
     ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया- ‘‘राजन ! मैं मूर्खों की सभा में नहीं बैठता।’’
         ऋषि अष्टावक्र की बात सुनकर सभा के सदस्य नाराज हो गए और उनमें से एक सदस्य ने क्रोध में बोल ही दिया - ‘‘हम मूर्ख क्यों हुए ? आपका शरीर ही ऐसा है तो हम क्या करें ?’’
तभी ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया - ‘‘तुम लोगों को यह नहीं मालूम कि तुम क्या कर रहे हो ! अरे, तुम मुझ पर नहीं, सर्वशक्तिमान ईश्वर पर हँस रहे हो । मनुष्य का शरीर तो हांडी की तरह है, जिसे ईश्वर रुपी कुम्हार ने बनाया है। हांडी की हँसी उड़ाना क्या कुम्हार की हँसी उड़ाना नहीं हुआ ?’’ अष्टावक्र का यह तर्क सुनकर सभी सभा सदस्य लज्जित हो गए और उन्होंने ऋषि अष्टावक्र से क्षमा मांगी ।
           हम में से ज्यादातर लोग आमतौर पर किसी ना किसी व्यक्ति को देखकर हँसते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं कि वह कैसे भद्दा दिखता है या कैसे भद्दे कपड़े पहने हुए है । लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो हम परमात्मा का ही मजाक उड़ाते हैं ना कि उस व्यक्ति का ।
     इन्सान के व्यक्तित्व का निर्माण उसका रंग, शरीर या कपड़ों से नहीं हुआ करता, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य के विचारों एवं उसके आचरण से हुआ करता है।
🙏🧡🙏

Thursday, June 14, 2018

#कैलास #पर्वत #के #रहस्य कैलास पर्वत एक अनसुलझा रहस्य, कैलास पर्वत के इन 8 रहस्यों से नासा भी परेशान हो चुका है। कैलास पर्वत के रहस्य- कैलाश पर्वत, इस एतिहासिक पर्वत को आज तक हम सनातनी और भारतीय लोग शिव का वास स्थान मानते हैं. शास्त्रों में यही लिखा है कि कैलास पर शिव का वास है. किन्तु वहीँ नासा जैसी वैज्ञानिक संस्था के लिए कैलास एक रहस्यमयी जगह है. नासा के साथ-साथ कई रूसी वैज्ञानिकों ने कैलास पर्वत पर अपनी रिपोर्ट पेश की है। सभी का मानना है कि कैलास वाकई कई अलौकिक शक्तियों का केंद्र है. विज्ञान यह दावा तो नहीं करता है कि यहाँ शिव देखे गये हैं किन्तु यह सभी मानते हैं कि यहाँ कई पवित्र शक्तियां जरुर काम कर रही हैं. तो आइये आज हम आपको कैलास पर्वत से जुड़े हुए कुछ रहस्य बताते हैं। कैलास पर्वत के रहस्य रहस्य 1 रूस के वैज्ञानिको का ऐसा मानना है कि कैलास पर्वत आकाश और धरती के साथ इस तरह से केंद्र में है जहाँ चारों दिशाएँ मिल रही हैं. वहीँ रूसी विज्ञान का दावा है कि यह स्थान एक्सिस मुंडी है और इसी स्थान पर व्यक्ति अलौकिक शक्तियों से आसानी से संपर्क कर सकता है. धरती पर यह स्थान सबसे अधिक शक्तिशाली स्थान है। रहस्य 2 दावा किया जाता है कि आज तक कोई भी व्यक्ति कैलास पर्वत के शिखर पर नहीं पहुच पाया है. वहीँ 11 सदी में तिब्बत के योगी मिलारेपी के यहाँ जाने का दावा किया जाता है किन्तु इस योगी के पास इस बात के सबूत नहीं थे या फिर वह खुद सबूत पेश नहीं करना चाहता था इसलिए यह भी रहस्य है कि इन्होनें यहाँ कदम रखा या फिर वह कुछ बताना नहीं चाहते थे। रहस्य 3 कैलास पर्वत पर दो झीलें हैं और यह दोनों ही रहस्य बनी हुई हैं. आज तक इनका भी रहस्य कोई खोज नहीं पाया है. एक झील साफ़ और पवित्र जल की है. इसका आकार सूर्य के बराबर बताया गया है. वहीँ दूसरी झील अपवित्र और गंदे जल की है तो इसका आकार चन्द्रमा के समान है. ऐसा कैसे हुआ है यह भी कोई नहीं जानता है। रहस्य 4 अब यहाँ के आध्यात्मिक और शास्त्रों के अनुसार रहस्य की बात करें तो कैलास पर्वत पर कोई भी व्यक्ति शरीर के साथ उच्चतम शिखर पर नहीं पहुच सकता है. ऐसा बताया गया है कि यहाँ देव लोग आज भी वास करते हैं. पवित्र संतों की आत्माओं को ही यहाँ वास करने का अधिकार दिया गया है। रहस्य 5- कैलास पर्वत का एक रहस्य यह भी बताया जाता है कि जब कैलास पर बर्फ पिघलती है तो यहाँ से डमरू जैसी आवाज आती है. इसे कई लोगों ने सुना है. लेकिन इस रहस्य को आज तक कोई हल नहीं कर पाया है। रहस्य 6 कई बार कैलास पर्वत पर सात तरह की लाइट आसमान में देखी गयी है. नासा का ऐसा मानना है कि यहाँ चुम्बकीय बल है और आसमान से मिलकर वह कई बार इस तरह की चीजों का निर्माण करता है। रहस्य 7- कैलास पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्म का केंद्र माना गया है. यहाँ कई साधू और संत अपने देवों से टेलीपेथी तकनीक से संपर्क करते हैं. असल में यह आध्यात्मिक संपर्क होता है। रहस्य 8 कैलास पर्वत का सबसे बड़ा रहस्य खुद विज्ञान ने साबित किया है कि यहाँ प्रकाश और ध्वनी की बीच इस तरह का समागम होता है कि यहाँ से ॐ की आवाजें सुनाई देती हैं। तो अब आप समझ गये होंगे कि कैलास पर्वत क्यों आज भी इतना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व रखे हुए है. हर साल यहाँ दुनियाभर से कई लोग अनुभव लेने आते हैं और वहीँ सनातन धर्म के लिए कैलास सबसे बड़ा धार्मिक स्थल भी बना हुआ है। #हर_हर_महादेव

#कैलास #पर्वत #के #रहस्य

कैलास पर्वत एक अनसुलझा रहस्य, कैलास पर्वत के इन 8 रहस्यों से नासा भी परेशान हो चुका है।

कैलास पर्वत के रहस्य- कैलाश पर्वत, इस एतिहासिक पर्वत को आज तक हम सनातनी और भारतीय लोग शिव का वास स्थान मानते हैं. शास्त्रों में यही लिखा है कि कैलास पर शिव का वास है. किन्तु वहीँ नासा जैसी वैज्ञानिक संस्था के लिए कैलास एक रहस्यमयी जगह है. नासा के साथ-साथ कई रूसी वैज्ञानिकों ने कैलास पर्वत पर अपनी रिपोर्ट पेश की है।

सभी का मानना है कि कैलास वाकई कई अलौकिक शक्तियों का केंद्र है. विज्ञान यह दावा तो नहीं करता है कि यहाँ शिव देखे गये हैं किन्तु यह सभी मानते हैं कि यहाँ कई पवित्र शक्तियां जरुर काम कर रही हैं. तो आइये आज हम आपको कैलास पर्वत से जुड़े हुए कुछ रहस्य बताते हैं।

कैलास पर्वत के रहस्य

रहस्य 1  रूस के वैज्ञानिको का ऐसा मानना है कि कैलास पर्वत आकाश और धरती के साथ इस तरह से केंद्र में है जहाँ चारों दिशाएँ मिल रही हैं. वहीँ रूसी विज्ञान का दावा है कि यह स्थान एक्सिस मुंडी है और इसी स्थान पर व्यक्ति अलौकिक शक्तियों से आसानी से संपर्क कर सकता है. धरती पर यह स्थान सबसे अधिक शक्तिशाली स्थान है।

रहस्य 2
दावा किया जाता है कि आज तक कोई भी व्यक्ति कैलास पर्वत के शिखर पर नहीं पहुच पाया है. वहीँ 11 सदी में तिब्बत के योगी मिलारेपी के यहाँ जाने का दावा किया जाता है किन्तु इस योगी के पास इस बात के सबूत नहीं थे या फिर वह खुद सबूत पेश नहीं करना चाहता था इसलिए यह भी रहस्य है कि इन्होनें यहाँ कदम रखा या फिर वह कुछ बताना नहीं चाहते थे।

रहस्य 3
कैलास पर्वत पर दो झीलें हैं और यह दोनों ही रहस्य बनी हुई हैं. आज तक इनका भी रहस्य कोई खोज नहीं पाया है. एक झील साफ़ और पवित्र जल की है. इसका आकार सूर्य के बराबर बताया गया है. वहीँ दूसरी झील अपवित्र और गंदे जल की है तो इसका आकार चन्द्रमा के समान है. ऐसा कैसे हुआ है यह भी कोई नहीं जानता है।

रहस्य 4 
अब यहाँ के आध्यात्मिक और शास्त्रों के अनुसार रहस्य की बात करें तो कैलास पर्वत पर कोई भी व्यक्ति शरीर के साथ उच्चतम शिखर पर नहीं पहुच सकता है. ऐसा बताया गया है कि यहाँ देव लोग आज भी वास करते हैं. पवित्र संतों की आत्माओं को ही यहाँ वास करने का अधिकार दिया गया है।

रहस्य 5-
कैलास पर्वत का एक रहस्य यह भी बताया जाता है कि जब कैलास पर बर्फ पिघलती है तो यहाँ से डमरू जैसी आवाज आती है. इसे कई लोगों ने सुना है. लेकिन इस रहस्य को आज तक कोई हल नहीं कर पाया है।

रहस्य 6
कई बार कैलास पर्वत पर सात तरह की लाइट आसमान में देखी गयी है. नासा का ऐसा मानना है कि यहाँ चुम्बकीय बल है और आसमान से मिलकर वह कई बार इस तरह की चीजों का निर्माण करता है।

रहस्य 7-
कैलास पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्म का केंद्र माना गया है. यहाँ कई साधू और संत अपने देवों से टेलीपेथी तकनीक से संपर्क करते हैं. असल में यह आध्यात्मिक संपर्क होता है।

रहस्य 8
कैलास पर्वत का सबसे बड़ा रहस्य खुद विज्ञान ने साबित किया है कि यहाँ प्रकाश और ध्वनी की बीच इस तरह का समागम होता है कि यहाँ से ॐ की आवाजें सुनाई देती हैं।

तो अब आप समझ गये होंगे कि कैलास पर्वत क्यों आज भी इतना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व रखे हुए है. हर साल यहाँ दुनियाभर से कई लोग अनुभव लेने आते हैं और वहीँ सनातन धर्म के लिए कैलास सबसे बड़ा धार्मिक स्थल भी बना हुआ है।
  
                          #हर_हर_महादेव

Thursday, June 7, 2018

जनेऊ क्यों पहनते हैं जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इसे उपनयन संस्कार कहते’उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है। आओ जानते है जनेऊ धारण  के बारे मे। कौन कर सकता है जनेऊ धारण हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। ब्रह्मचारी और विवाहित : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं। जनेऊ क्या है आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। कैसे करते हैं जनेऊ धारण बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है- यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

जनेऊ क्यों पहनते हैं

जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इसे उपनयन संस्कार कहते’उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है। आओ जानते है जनेऊ धारण  के बारे मे।

कौन कर सकता है जनेऊ धारण

हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म।

ब्रह्मचारी और विवाहित : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

जनेऊ क्या है

आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

कैसे करते हैं जनेऊ धारण

बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है-

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।