Friday, November 2, 2018

हनुमानजी में अतुलित बल है ।इसका मापदंड क्या है?

हनुमानजी में अतुलित बल है ।इसका मापदंड क्या है?

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पुराने समय में बल की माप हाथियों की शक्ति से की जाती थी ।आजकल तो लोगों में उतना बल ही नहीं है,
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इसलिए आजकल घोड़े की शक्ति (Horse Power- अश्व शक्ति )से बल की माप को दर्शाया जाता है ।
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कहते हैं कि दुःशासन में दस हजार हाथियों का बल था फिर भी वह द्रौपदी की साड़ी खींचते खींचते हताश हो गया था ।
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हनुमानजी के बल के विषय में आप ऐसे समझ सकते हैं --
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10000 हाथी = एक दिग्गज
10000 दिग्गज = एक ऐरावत
10000 ऐरावत = एक इन्द्र
10000 इन्द्र =
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हनुमान जी की सबसे छोटी कनिष्ठा उंगली का बल।

अब आप समझ सकते हैं कि हनुमानजी में कितना बल है ।

इसीलिए
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तुलसीदास जी भी कहते हैं --
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(अतुलितबलधामम् *****।)
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हनुमानजी की विशेषता देखिए
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इतने बलशाली होकर भी उनमें कोई अभिमान नहीं है ।वे कहते हैं कि मुझमें कोई बल नहीं है ।

समुद्र लाँघने के समय सब वानरों ने अपने अपने बल का बखान किया।किसी ने पूछा कि हनुमानजी आप कैसे चुप हैं? आपने अपने बल के बारे में कुछ नहीं कहा ।
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हनुमानजी बोले --मुझमें कोई बल ही नहीं है, जो मैं बखान करूँ ।कहा कि आप तो अतुलितबलधामम् कहे जाते हैं । हनुमानजी बोले - हाँ ! सही है ।धाम का अर्थ है,
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घर या मकान ।तो मुझमें जो बल है, वह मेरा नहीं है, क्योंकि मकान में जो होता है,
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बह मकान का नही होता, मकान मालिक का होता है, जो उस घर में रहता होता है, उसी का होता है ।
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तो आपके अंदर कौन रहता है ।हनुमानजी बोले- हमारे हृदय में तो प्रभु राम जी रहते हैं,
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इसीलिए बल भी उन्हीं का है।किसी ने कहा --इसका प्रमाण? बोले प्रमाण भी है ।
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जब इन्द्र पुत्र जयंत कौआ बनकर सीता जी के चरणों कोे चोंच के द्वारा घायल कर गया था ।तब राम जी ने सींक का बाण उसके पीछे लगा दिया था ।
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वह पूरे ब्रह्माण्ड में शरण माँगता फिरा।किसी ने शरण नहीं दी।
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(काहूँ बैठन कहा न ओही।
राखि को सकै राम कर द्रोही।।)
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जो भगवान राम से द्रोह करे, उसे कौन बचाबे।नारद जी को उस पर दया आ गयी।
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उन्होंने उसे तुरंत श्री राम जी के पास भेज दिया।उसने जाकर प्रार्थना की और चरण पकड़ लिए ।
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(आतुर सभय गहेसि पद जाई।
त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ।।
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई।
मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।)
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प्रभु !! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए ।आपके अतुलित बल और अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य )को मैं मंदबुद्धि जान नहीं पाया था ।तो अतुलित बल राम जी का है और राम जी ही मेरे हृदय में निवास करते हैं,
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इसलिए बल तो उन्हीं का है।मैं तो केवल उनके बल का धाम हूँ । कितनी निरभिमानता?
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महावीर होकर भी कहते हैं कि यह तो भगवान का बल है।
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इसीलिए उनका नाम हनुमान है, कोई मान (अभिमान) ही नहीं ।

जय जय सियाराम
जय हनुमान

कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

रक्षा सूत्र -

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कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

आपने देखा होगा कि लोग पूजा-पाठ और शुभ अवसरों पर कलाई में मौली यानी कलावा बांधते हैं। आपने सोचा है कि इसके पीछे क्या कारण हो सकता है।

अगर आप यह मानते है कि यह धार्मिक कारणों से होता है तो आप आधी-अधूरी जानकारी रखते हैं। असल में कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

कलावा बांधने की परंपरा ऐसे शुरु हुई

वैज्ञानिक करणों पर बात करने से पहले आइये बात करते हैं इसके कुछ धार्मिक पहलुओं पर। शास्त्रों के अनुसार कलावा यानी मौली बांधने की परंपरा की शुरुआत देवी लक्ष्मी और राजा बलि ने की थी।

कलावा को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, माना जाता है कि कलाई पर इसे बांधने से जीवन पर आने वाले संकट से रक्षा होती है।

इसका कारण यह है कि कलावा बांधने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव की कृपा प्राप्त होती है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की अनुकूलता का भी लाभ मिलता है।

गंभीर रोगों से रक्षा करता है कलावा ........

शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती है।

कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। इससे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का सामंजस्य बना रहता है।

माना जाता है कि कलावा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाव होता है।

कब कैसे धारण करें कलावा .......

शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

पर्व त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। Prasad Davrani

भगवान गणेश की प्रिय दुर्वा की महिमा

भगवान गणेश की
प्रिय दुर्वा की महिमा
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महालक्ष्मी की छोटी
बहन है दुर्वा !!
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पौराणिक संदर्भों से ज्ञान होता
है कि क्षीर सागर से उत्पन्न होने
के कारण भगवान विष्णु को यह
अत्यंत प्रिय रही और क्षीर सागर
से जन्म लेने के कारण लक्ष्मी
की छोटी बहन कहलाई।

विष्च्यवादि सर्व देवानां,
दुर्वे त्वं प्रीतिदायदा।
क्षीरसागर सम्भूते,
वंशवृद्धिकारी भव।।

दुर्वा यानी दूब जैसा कोई अन्य
पदार्थ,इस धरा पर हो ही नहीं
सकता,जो देव मनुष्य व पशु
तीनों को ही प्रिय है।

नन्ही दूब के आचमन से देवता,
दूब आच्‍छादित मैदानों पर
भ्रमण से मनुष्य और भोजन
के रूप में पशु इसको पाकर
प्रसन्न रहते हैं।

खेल के मैदान,मंदिर,बाग-बगीचे
में उगी नन्ही दूब का मखमली
हरा गलीचा सबको अपनी ओर
आकर्षित करता है।

सबके पांव से रगड़ खाती,
विपरी‍त परिस्थितियों में भी
जीवित रहती,देवताओं को
प्रिय व मानव के लिए
मंगलकारी व आरोग्य
प्रदायक है।

हरी कोमल दूब का महत्व :

अनेक युगों से हरी कोमल दूब
का मैदान सर्वप्रिय और उद्यानों
का आवश्यक अंग रहा है।

अथर्ववेद तथा कौटिल्य
अर्थशास्त्र में हरी व कोमल
दूब का संदर्भ मिलता है।

पुराणों में भी नंदन वन
का वर्णन मिलता है।

वाटिकाओं में समतल व ऊंची-
नीची घुमावदार भूमि पर कोमल
हरी दूब लगी हुई है,जिस पर
कुलांचे मारते हिरण घास चर
रहे हैं और गाय बड़े चाव से
घास खाकर जुगाली कर रही है।

सम्राट विक्रमादित्य और
अशोक के काल में भी हरित
घास मैदानों की बहुलता थी।

मुगलकाल से पूर्व व
पश्चात उद्यान कला
अत्यंत वि‍कसित थी।

हरे घास के मैदानों पर विभिन्न
प्रकार के घुमावदार बेलबूटों
युक्त कटाव के उभार उपवनों
शोभा बढ़ाते थे।

कश्मीर,मैसूर के वृंदावन
गार्डन के ‍हरित घास के
उपवन,हैदराबाद में फिल्म
सिटी के बगीचों की हरित
आभा की झलक से मन
पुलकित हो जाता है।

पौराणिक संदर्भों से ज्ञान होता
है कि क्षीर सागर से उत्पन्न होने
के कारण भगवान विष्णु को यह
अत्यंत प्रिय रही और क्षीर सागर
से जन्म लेने के कारण लक्ष्मी
की छोटी बहन कहलाई।

विष्च्यवादि सर्व देवानां,
दुर्वे त्वं प्रीतिदायदा।
क्षीरसागर सम्भूते,
वंशवृद्धिकारी भव।।

गौरीपूजन,गणेश पूजन में दुर्वा
दल से आचमन अ‍त्यंत शुभ
माना गया है।

जहां रत्नभूषित,झिलमिल
करती इंद्रधनुषी छटा बिखेरे
लक्ष्मी रहती है वहीं हरित वस्त्रों
मे लिपटी सुकुमार कन्या के
अक्षय रूप से कौन आकर्षित
न होगा ?

बलवर्धक दुर्वा कालनेमि
राक्षस का प्राकृतिक
भोजन थी।
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इसके सेवन से वह अति
बलशाली हो गया था।

महर्षि दुर्वासा को भी
दुर्वा रस अत्यंत प्रिय था।

तुलसीदास ने इसे अन्य
मांगलिक पदार्थों के
समकक्ष माना है।

दधि दुर्वा रोचन फल-फूला।
नव तुलसीदल मंगल मूला।।

वा‍ल्मीकि ऋषि ने भी भगवान
राम के वर्ण की तुलना दुर्वा से
कर इसको कितना सम्मान
दिया है-

रामदुर्वा दल श्यामे,
पद्याक्षं पीतवाससा।

यह पौधा जमीन पर रेंगता,
चलने में बाधा नहीं पहुंचाता,
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीवित रहता हुआ विनम्रता
व दृढ़ता का पाठ पढ़ाता है।

प्रखर सूर्य किरणों में यह ऊपर
से सूख जाती है लेकिन मूल में
प्राण रहते हैं और जरा-सी जल

की बूंदों से पुन: हरी हो जाती है।

कहा जाता है कि इसकी जड़ें
पाताल लोक तक जाती हैं और
अमृत खींचती हैं।

विनम्रता,दृढ़ता,अमरत्व,सर्व
मंगलकारी होने के कारण ही
प्रत्येक युग में नन्हीं दूब के
विशाल गुणों से कोई-न-कोई
संत अवश्य प्रभावित रहा है,
तब ही गुरुनानक ने इसके
जीवन का अनुसरण करने
की प्रेरणा दी है-

नानक नन्हों हो रहो,
जैसे नन्हीं दूब।
और घास जल जाएगी,
दूब खूब की खूब।

महाराणा प्रताप के दुर्दिनों
में भी घास उनके परिवार
का सहारा बनी।

जिस प्रकार यह स्वयं बढ़ती है
उसी प्रकार यह वंश वृद्धि की
भी संकेतक है।

आज भी राजस्थान में अनेक
परिवारों में पुत्र जन्म की सूचना
दूर-देश के संबंधियों नाना,दादा,
मामा को भेजनी होती है तो
संदेशवाहक कुछ न कहकर
केवल दुर्वा दल के ही दर्शन
कराते हैं।

इसका अर्थ यही है कि
पुत्र जन्म हुआ है।

इस कृत्य को
'हरी दिखाना' कहते हैं।

अगर डाक द्वारा सूचना
भेजनी हो तो लिफाफे में
दो-तीन तिनके दूब के डाल
दिए जाते हैं,जो कि शुभ सूचना
के प्रतीक होते हैं।

विवाह में वरमाला में भी
दुर्वा दल का उपयोग शुभ
माना जाता है।

आजकल इसका उपयोग
नहीं किया जाता है।

नटखट जड़ोंवाली घास :

दूब का पौधा एक बार लगाने
के बाद उस जगह से नष्ट करना
मुश्किल है।

यह नन्ही नटखट अपनी जड़ें
(गांठें)जमीन में रोपती पसरती
ही जाती है।

विश्व के अलग-अलग देशों
में इसकी अनेक प्रजातियां
उपलब्‍ध हैं।

भारत में प्राय: तीन वर्णों
की दूब दिखाई देती है-
--श्याम हरित,हर‍ित व श्वेत।

श्याम हरित दूब दक्षिण
भारत में दिखाई देती है।

हर‍ित उत्तरी भारत व
राजस्थान,गुजरात में
दिखाई देती है।

मरुप्रदेश,जोधपुर की
हरित बारीक,कोमल
दुर्वा विश्वप्रसिद्ध है।

संस्कृत भाषा में यह अनेक
पर्वों (गांठों) के कारण शत
पर्वा, स्वाभाविक तरीके से
उगने के कारण (रुहा),प्रसार
का अंत नहीं होने के कारण
अनम्ता के नाम से भी जानी
जाती है।

रासायनिक तौर पर दुर्वा रस
में क्लोरोफिल के साथ प्रोटीन,
कार्बोहाइड्रेट व आंशिक रूप से
अनेक लवण भी विद्यमान रहते हैं।

इसमें अनेक आरोग्यदायी व
रोगहर गुण हैं लेकिन इनका
उपयोग कम होता जा रहा है।

त्रिदोष नाशक है दूब घास !!

शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा
जो दूब को नहीं जानता होगा।

हाँ यह अलग बात है कि हर
क्षेत्रों में तथा भाषाओँ में यह
अलग अलग नामों से जाना
जाता है।

हिंदी में इसे दूब,दुबडा,
संस्कृत में दुर्वा,सहस्त्रवीर्य,
अनंत,भार्गवी,शतपर्वा,
शतवल्ली,मराठी में पाढरी
दूर्वा,काली दूर्वा,गुजराती में
धोलाध्रो,नीलाध्रो कहा जाता है।

अंग्रेजी में कोचग्रास,क्रिपिंग
साइनोडन,बंगाली में नील
दुर्वा,सादा दुर्वा आदि नामो
से जाना जाता है।

इसके आध्यात्मिक महत्वानुसार
प्रत्येक पूजा में दूब को अनिवार्य
रूप से प्रयोग में लाया जाता है।

इसके औषधीय गुणों के
अनुसार दूब त्रिदोष को
हरने वाली एक ऐसी औषधि
है जो वात कफ पित्त के समस्त
विकारों को नष्ट करते हुए वात-
कफ और पित्त को सम करती है।

दूब सेवन के साथ यदि कपाल
भाति की क्रिया का नियमित
यौगिक अभ्यास किया जाये
तो शरीर के भीतर के त्रिदोष
को नियंत्रित कर देता है।

यह दाह शामक,रक्तदोष,
मूर्छा,अतिसार,अर्श,रक्त
पित्त,प्रदर,गर्भस्राव,गर्भपात,
यौन रोगों,मूत्रकृच्छ इत्यादि में
विशेष लाभकारी है।

यह कान्तिवर्धक,रक्त स्तंभक,
उदर रोग,पीलिया इत्यादि में
अपना चमत्कारी प्रभाव
दिखाता है।

श्वेत दूर्वा विशेषतः वमन,कफ,
पित्त,दाह,आमातिसार,रक्त
पित्त,एवं कास आदि विकारों
में विशेष रूप से प्रयोजनीय है।

सेवन की दृष्टि से दूब की जड़
का 2 चम्मच पेस्ट एक कप
पानी में मिलाकर पीना चाहिए।

यह घास एक बार लगा दी तो
ज़्यादा देखभाल नहीं मांगती
और कठिन से कठिन परिस्थिति
में भी आराम से बढती है।

इसमें कीड़े भी नहीं लगते ..
इसलिए लॉन में कोई अन्य
घास न लगा कर दुर्वा ही
लगाना चाहिए।

इस पर नंगे पैर चलने से नेत्र
ज्योति बढती है और अनेक
विकार शांत हो जाते है।

यह शीतल और पित्त को
शांत करने वाली है।

दूब के रस को हरा रक्त
कहा जाता है।
इसे पीने से एनीमिया
ठीक हो जाता है।

नकसीर में इसका रस नाक
में डालने से लाभ होता है।

दूब के काढ़े से कुल्ले करने
से मूंह के छाले मिट जाते है।

दूब का रस पीने से पित्त जन्य
वमन(उल्टी)ठीक हो जाता है।

दूब का रस दस्त में
लाभकारी है।

यह रक्त स्त्राव,गर्भपात को
रोकता है और गर्भाशय और
गर्भ को शक्ति प्रदान करता है।

कुँए वाली दूब पीसकर मिश्री
के साथ लेने से पथरी में लाभ
होता है।

इसे पीस कर दही में मिलाकर
लेने से बवासीर में लाभ होता
है।

दूब की जड़ का काढा वेदना
नाशक और मूत्रल होता है।

दूब के रस को तेल में पका कर
लगाने से दाद,खुजली और व्रण
मिटते है।

दूब के रस में अतीस के चूर्ण को
मिलाकर दिन में २-३ बार चटाने
से मलेरिया में लाभ होता है।

दूब के रस में बारीक पिसा
नाग केशर और छोटी इलायची
मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे
बच्चों को नस्य दिलाने से वे
तंदुरुस्त होते है,बैठा हुआ तालू
ऊपर चढ़ जाता है।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति
जयति पुण्य भूमि भारत

सदा सर्वदा सुमंगल
वंदेमातरम
ॐ गं गणपतये नमः
जय भवानी
जय श्री राम🙏

Saturday, October 27, 2018

संस्कार

संस्कार:
एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके माँ बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मंझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।
बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।
छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मंझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मंझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरेज की थी।
बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।
आख़िर भाई सब डाक्टर इंजीनियर जो थे।
अब मंझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।
बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।
वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।
माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।
शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।
दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।
चंदू - आज नहीं फिर कभी
दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बीबी का गुलाम ही हो गया?
चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज ।
कल और होगा।
घरवाले नालायक कहते हैं मेरे लिए चलता है।
मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।
इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नियां मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।
मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।
चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।
बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें
मां- अरे चंदू आज रूक जा।
बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।
और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है
तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।
अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?
दोनों भाई हंसकर बोलते हैं
अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।
चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।
ठीक है आप दोनों ऐसा करो।
मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।
दोनों भाई चकितहोकर बोलते हैं ।
और तू?
चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है
मेरे हिस्से में माँ है न......
फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा?
चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।
बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।
बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।
चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।
बहुओं को जलाने की हिम्मत किसी मे नहीं होती मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।
माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।
दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं
आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।

हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला करवा चौथ का पर्व हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। इस त्योहार की ज्यादा धूम भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में देखने को मिलती है।

हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला करवा चौथ का पर्व हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। इस त्योहार की ज्यादा धूम भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में देखने को मिलती है।

हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला करवा चौथ का पर्व हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। इस त्योहार की ज्यादा धूम भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में देखने को मिलती है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह पर्व सौभाग्यवती यानि सुहागिन स्त्रियां मनाती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है।
इस बार यह पर्व 27 अक्टूबर को है। इस दिन महिलाएं चंद्रमा की पूजा कर अपना व्रत खोलती हैं। इस दिन चंद्रमा की ही पूजा क्यों की जाती है, इससे जुड़ी कई कथाएं और किवंदतियां प्रचलित हैं। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने के संबंध में एक मनोवैज्ञानिक कारण है जो श्री राम और चंद्रमा से संबंधित है।
करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा-
रामचरितमानस के लंका कांड के अनुसार, जिस समय भगवान श्रीराम समुद्र पार कर लंका में स्थित सुबेल पर्वत पर उतरे और श्रीराम ने पूर्व दिशा की ओर चमकते हुए चंद्रमा को देखा तो अपने साथियों से पूछा, चंद्रमा में जो कालापन है, वह क्या है?
जिसके बाद सभी ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जवाब दिया। किसी ने कहा चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई देती है तो किसी ने कहा राहु की मार के कारण चंद्रमा में ये कालापन है, तो वहीं कुछ ने कहा कि आकाश की काली छाया उसमें दिखाई देती है, जिसके कारण वो काला प्रतीत होता है।
सबकी बात सुनने के बाद भगवान श्रीराम ने कहा, विष यानि जहर चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है क्योंकि चंद्रमा व विष समुद्र मंथन से निकले थे। इसलिए उसने विष को अपने ह्रदय में स्थान दे रखा है, जिसके कारण चंद्रमा में कालापन दिखाई देता है। अपनी विषयुक्त किरणों को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है।
इस पूरे प्रसंग का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि जो पति-पत्नी किसी न किसी कारण एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं, चंद्रमा की विषयुक्त किरणें उन्हें अधिक कष्ट पहुंचाती हैं। इसीलिए करवा चौथ के दिन महिलाएं चंद्रमा की पूजा कर उससे ये कामना करती हैं कि किसी भी कारण उन्हें अपने प्रियतम से अलग न होना पड़े। यही एक वजह है जिस कारण करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है।

Thursday, October 25, 2018

हाल फिलहाल में सोशल मीडिया पर देखी गई यह सबसे बेहतरीन तस्वीर है।

हाल फिलहाल में सोशल मीडिया पर देखी गई यह सबसे बेहतरीन तस्वीर है।

तस्वीर के मध्य में व्हीलचेयर पर बैठी लड़की का नाम उषा है।
उषा के आसपास स्टेपिंग स्टोन मॉडर्न स्कूल की दूसरी कक्षा के छात्र छात्राएं खड़े मुस्कुरा रहे हैं।

इस तस्वीर के पीछे की कहानी अद्भुत है।

उषा एक दिहाड़ी मजदूर के घर पैदा हुई। जन्म से उषा के कमर से निचला हिस्सा लगभग निष्क्रिय था। कुछ समय बाद पता चला के उषा ना बोल सकती है और ना सुन सकती है। एक रोज़ उषा का अपने पिता के साथ स्कूल में आना हुआ। उषा और उसके पिता स्कूल के प्लेग्राउंड में खड़े थे जहाँ बच्चे गेंद के साथ खेल रहे थे। एक बच्चे ने गेंद फेंकी तो वह उषा के पास आ गिरी। उषा ने गेंद उठाई और फट से बच्चों के पास फेंक दी।

वहीं पर दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा ख्याति खड़ी थी। ख्याति ने उषा को देखा तो उसे अटपटा से लगा। उषा अपने पिता के सहारे बैठी थी और उसकी एक टांग टेढ़ी दिखाई दे रही थी। उत्सुकतावश ख्याति उषा के पास पहुंची और उसे अपने साथ खेलने को कहा। उषा सुन नहीं सकती थी पर साथ खड़े मज़दूर पिता सब सुन रहे थे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक ख्याति से कहा के उषा उनके साथ नहीं खेल सकती क्योंकि वह "उन जैसी" नहीं है। वह दौड़ नहीं सकती। एक दिव्यांग लड़की को देख कर ख्याति के मन में एक अजीब सी उत्सुकता जाग उठी। बच्चों का मन हर एक बात को जानने के लिये उत्सुक होता है। ख्याति ने यह बात अपने दादा से साँझा की। दादा ने विस्तारपूर्वक समझाया के विकलांगता क्या होती है और किस कारणवश होती है।
बच्चे दिल के कोमल होते हैं।

ख्याति ने जब विकलांगता के विषय मे समझा तो उसका दिल पसीज गया। भोले स्वभाव में उसने अपने दादा से कहा के वह उषा को एक स्कूटर ले देगी जिसपर बैठ कर उषा हर जगह आसानी से जा सकेगी।

दादा जी ने कहा के स्कूटर खरीदने के पैसे कहाँ से लाओगी।
......तो भोली भाली बिटिया ने जवाब दिया के उसकी गुल्लक में काफी पैसे जमा हैं। उन्ही से स्कूटर खरीद कर उषा को दे देगी। यह कहने भर की देर थी के दादा जी ने बिटिया को "व्हीलचेयर" की एक तस्वीर दिखाई और कहा के दिव्यांग उषा को यही स्कूटर देना है।

ख्याति तैयार हो गयी। अगली सुबह स्कूल की घँटी बजी तो ख्याति ने अपने सहपाठियों को उषा के विषय में बताया। इसके बाद जो हुआ उसने इस तस्वीर को इतना मार्मिक और खूबसूरत बना दिया के शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

स्टेपिंग स्टोन मॉडर्न स्कूल के दूसरी कक्षा के लगभग सभी बच्चों ने अपनी गुल्लक तोड़ने का निश्चय किया। किसी की गुल्लक से 100 रुपये के सिक्के निकले तो किसी की गुल्लक से 500 रुपये का योगदान मिला।

पैसा इक्कठा कर के क्लास टीचर को सौंप दिया गया और फिर एक दिन उषा और उसके पिता को स्कूल में बुलाया गया। एकत्रित धनराशि से उषा के लिये उसका स्कूटर यानि व्हीलचेयर खरीदी गई थी। उषा जब व्हीलचेयर पर बैठी तो सभी बच्चों ने तालियाँ बजा कर उसका उत्साहवर्धन किया और अपना स्कूटर हासिल कर के उषा के चेहरे पर भी मुस्कान तैर गयी।

"बचपना छोड़ दो" जब बड़े हो जाएं तो यह डायलॉग अक्सर सुनने को मिलता है। सुन कर ऐसा लगता है जैसे हमारे स्वभाव का एक बेहतरीन अंश कोई हमसे छीन रहा हो। यह "बचपना" ही तो है जिसकी वजह से अंतरात्मा में थोड़ी बहुत शुद्धता बची है। यह "बचपना" ही तो है जिसकी वजह से हम कभी कभी बच्चों की तरह खुल कर हंसते हैं। अटखेलियां करते हैं। आज भी माँ की गोद में सर टेक कर सो जाते हैं।

यह जो थोड़ा सा "बचपना" हम सब मे बाकी है यह बड़ा मूल्यवान् है। यह जीवित है तो भावनायें जीवित हैं। संवेदनायें जीवित हैं।

【रचित】