Thursday, October 11, 2018

गरबा और नवरात्रि का नाता

गरबा और नवरात्रि का नाता
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शारदीय नवरात्री यानि मां दुर्गा के आगमन की खुशियां. नवरात्री आते ही चारो ओर हर्षोल्लास सा व्याप्त हो जाता है. डांडिया और गरबा की धूम नज़र आती है. हर उम्र के लोग डांडिया और गरबे का आनंद लेते हैं. बेहद ही खूबसूरत और पारंपरिक अंदाज में सजे लोग इस नृत्य को बेहद ही खूबसूरती से अंजाम देते हैं.
लेकिन क्या कभी आप लोगो के मन में यह विचार नहीं आया कि शारदीय नवरात्री के दौरान ही गरबे की इतनी धूम क्यों होती है. तो चलिए आज जानते हैं कि आखिर नवरात्री और गरबा के बीच कनेक्शन क्या है

भारत में त्योहारों का अपना खासा महत्त्व है. त्यौहार किसी भी जाति या मज़हब के हों लेकिन हर त्यौहार को किसी न किसी परम्परा या रिवाज़ से जोड़ दिया जाता है.

क्या है गरबे की मान्यता
अगर देखा जाये तो नवरात्रि की नौ रातों में मां को प्रसन्न करने के लिए नृत्य का सहारा लिया जाता है. यूं तो वर्षों से ही हिन्दू मान्यताओं में नृत्य को भक्ति एवं साधना का एक मार्ग माना गया है. इसलिए यह मान्यता प्रचलित है कि गरबा के जरिए भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं. लेकिन यहां हम गरबा एवं नवरात्रि का महत्व कुछ गहराई से जानने की कोशिश करेंगे.

क्या है गरबा का अर्थ
गरबा का संस्कृत नाम गर्भ-द्वीप है. गरबा के आरंभ में देवी के निकट सछिद्र कच्चे घट(छेद वाला कच्ची मिटटी का घड़ा) को फूलों से सजा कर उसमें दीपक रखा जाता है. इस दीप को ही दीपगर्भ या गर्भ दीप कहा जाता है. गर्भ दीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है.

नाम बदला पर रीति रिवाज़ वही
जैसे-जैसे गर्भ द्वीप ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों तक पांव पसारे, इसका नाम परिवर्तित होता चला गया और अंत में इसे गरबा नाम दे दिया गया और तभी से सब लोग इस नृत्य को गरबा के नाम से ही जानते हैं. लेकिन नाम भले ही बदल गया लेकिन गर्भ द्वीप के जो रीति-रिवाज़ सर्वप्रथम किए जाते थे, वह आज भी उसी रूप में किए जाते हैं. जैसे कि गर्भ दीप के ऊपर एक नारियल रखा जाता है. नवरात्रि की पहली रात गरबा की स्थापना कर उसमें ज्योति प्रज्वलित की जाती है. इसके बाद महिलाएं इसके चारों ओर ताली बजाते हुए फेरे लगाती हैं. गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा या डांडिया और मंजीरा आदि का इस्तेमाल ताल देने के लिए किया जाता है. महिलाएं समूह में मिलकर नृत्य करती हैं. इस दौरान देवी के गीत गाए जाते हैं.

क्या है तीन ताली का रहस्य
आपने देखा होगा महिलाएं जब भी गरबा करती है तो तीन ताली का प्रयोग करती हैं. जी हां… एक नहीं, दो नहीं, तीन ताली का. क्या आप जानते हैं यह तीन ताली का रहस्य क्या है. यह पूरा ब्रह्मांड ब्रह्मा, विष्णु, महेश के आसपास ही घूमता है. ऐसा माना जाता है कि तीन तालियों के माध्यम से इन तीन देवों की कलाओं को एकत्र कर शक्ति का आह्वान किया जाता है.

क्या है ताली का अर्थ
पहली ताली ब्रह्मा अर्थात इच्छा से संबंधित है. ब्रह्मा की इच्छा तरंगों को ब्रह्मांड के अंतर्गत जागृत किया जाता है. यह मनुष्य की भावनाओं और उसकी इच्छा का समर्थन करती है. दूसरी ताली के माध्यम से विष्णु रूपी कार्य तरंगें प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को शक्ति प्रदान करती हैं. जबकि तीसरी ताली शिव रूपी ज्ञान तरंगों के माध्यम से मनुष्य की इच्छा पूर्ति कर उसे फल प्रदान करती है. ताली की आवाज से तेज निर्मित होता है और इस तेज की सहायता से शक्ति स्वरूप मां अंबा जागृत होती है. ताली बजाकर इसी तेज रूपी मां अंबा की आराधना की जाती है.

भारत में कैसे हुआ गरबे का चलन
क्या आप जानते हैं कि गरबे का इतिहास लगभग 70 दशक पुराना है. यह बात गुलाम रह चुके भारत से भी पहले की है. कहते हैं कि भोपाल में आजादी से पहले नवाबों का राज हुआ करता था, उस दौरान गुजरात के अलावा और कहीं भी गरबा आयोजित नहीं होता था. यह नृत्य केवल इसी राज्य की शान था और अन्य किसी जगह पर यदि गरबा होता भी था तो केवल मनोरंजन के लिए और वह भी गुजरातियों द्वारा ही.
आजादी के बाद जब गुजराती समुदायों का अपने प्रदेश से बाहर निकलना शुरू हुआ तब उनके साथ यह परंपरा भी अन्य प्रदेशों में पहुंच गई. मध्यप्रदेश में 70 के दशक में गरबा की आमद हुई. इसके बाद 80 के दशक तक तो जैसे गरबा ने धीरे-धीरे अन्य राज्यों एवं कस्बों में अपनी जगह बना ली.

गीतों में भी हुआ परिवर्तन
आजादी से पहले गरबा नृत्य में केवल शक्ति स्वरूपा मां अंबा को समर्पित गीत ही नहीं बल्कि देश भक्ति से ओतप्रोत और साम्राज्यवाद विरोधी गीत भी शामिल किए जाते थे. आज का गरबा नृत्य पूरी तरह पारंपरिक रूप लिए हुए है जिसमें राजनीति का स्वरूप बिल्कुल न्यूनतम या कहें ना के बराबर है. आप इसके व्यवसायिक स्वरूप को भी देख सकते हैं.

आज के दौर में गरबा को भारत के विश्व विख्यात नृत्यों में से एक माना जाता है. अब यह कोई आम नृत्य नहीं रहा, विश्व भर में इस नृत्य का प्रचार किया जाता है. ना केवल त्यौहारों के दौरान, वरन् समय-समय पर यह नृत्य भारतीय साहित्य को दर्शाता रहता है.
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जय माता दी

*संस्कार* ही *अपराध* रोक सकते हैं *सरकार* नहीं !!

आने वाले 10/15 साल में एक पीढी,संसार छोड़ कर जाने वाली है,
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कड़वा है,लेकिन सत्य है।

इस पीढ़ी के लोग बिलकुल अलग ही हैं...
रात को जल्दी सोने वाले, सुबह जल्दी जागने वाले,भोर में घूमने निकलने वाले।

आंगन और पौधों को पानी देने वाले, देवपूजा के लिए फूल तोड़ने वाले, पूजा अर्चना करने वाले, प्रतिदिन मंदिर जाने वाले।

रास्ते में मिलने वालों से बात करने वाले, उनका सुख दु:ख पूछने वाले, दोनो हाथ जोड कर प्रणाम करने वाले, पूजा होये बगैर अन्नग्रहण न करने वाले।

उनका अजीब सा संसार......
तीज त्यौहार, मेहमान शिष्टाचार, अन्न, धान्य, सब्जी, भाजी की चिंता तीर्थयात्रा, रीति रिवाज, सनातन धर्म के इर्द गिर्द घूमने वाले।*

पुराने फोन पे ही मोहित, फोन नंबर की डायरियां मेंटेन करने वाले, रॉन्ग नम्बर से भी बात कर लेने वाले, समाचार पत्र को दिन भर में  दो-तीन बार पढ़ने वाले।

हमेशा एकादशी याद रखने वाले, अमावस्या और पुरमासी याद रखने वाले लोग, भगवान पर प्रचंड विश्वास रखनेवाले, समाज का डर पालने वाले, पुरानी चप्पल, बनियान, चश्मे वाले।

गर्मियों में अचार पापड़ बनाने वाले, घर का कुटा हुआ मसाला इस्तेमाल करने वाले और हमेशा देशी टमाटर, बैंगन, मेथी, साग भाजी ढूंढने वाले।

नज़र उतारने वाले, सब्जी वाले से 1-2 रूपये के लिए, झिक झिक करने वाले लोग।*

क्या आप जानते हैं.....

ये सभी लोग धीरे धीरे, हमारा साथ छोड़ के जा रहे हैं।

क्या आपके घर में भी ऐसा कोई है?  यदि हाँ, तो उनका बेहद ख्याल रखें।*

अन्यथा एक महत्वपूर्ण सीख, उनके साथ ही चली जायेगी.....वो है, *संतोषी जीवन, सादगीपूर्ण जीवन, प्रेरणा देने वाला जीवन, मिलावट और बनावट रहित जीवन, धर्म सम्मत मार्ग पर चलने वाला जीवन और सबकी फिक्र करने वाला आत्मीय जीवन।

आपके परिवार मैं जो भी बडे  हौं उनको मान सन्मान और अपनापन समय तथा प्यार दीजिये ।।

              *संस्कार* ही
       *अपराध* रोक सकते हैं                                                                                        
           *सरकार* नहीं !!
                                        
                   🌞
                 *प्रणाम*

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एक स्थानीय कॉलेज में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने एक बयान में कहा – “उसने पहले कभी किसी छात्र को फेल नहीं किया, पर हाल ही में उसने एक पूरी की पूरी क्लास को फेल कर दिया है l”
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क्योंकि उस क्लास ने दृढ़ता पूर्वक यह कहा था कि “समाजवाद सफल होगा और न कोई गरीब होगा और न कोई धनी होगा” सबको सामान करने वाला एक महान सिद्धांत !
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तब प्रोफेसर ने कहा – अच्छा ठीक है ! आओ हम क्लास में समाजवाद के अनुरूप एक प्रयोग करते हैं  “सफलता पाने वाले सभी छात्रों के विभिन्न ग्रेड (अंकों) का औसत निकाला जाएगा और सबको वही एक ग्रेड दी जायेगी ”
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पहली परीक्षा के बाद, सभी ग्रेडों का औसत निकाला गया और प्रत्येक छात्र को B ग्रेड प्राप्त हुआl
जिन छात्रों ने कठिन परिश्रम किया था वे परेशान हो गए और जिन्होनें कम ही पढ़ाई की थी वे खुश हुए l
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दूसरी परीक्षा के लिए कम पढ़ने वाले छात्रों ने पहले से भी और कम पढ़ाई की और जिहोनें कठिन परिश्रम किया था उन्होंने यह तय किया कि वे भी मुफ्त की ग्रेड प्राप्त करेंगे और उन्होंने भी कम पढ़ाई की l
दूसरी परीक्षा की ग्रेड D थी l
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इसलिए कोई खुश नहीं था l
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जब तीसरी परीक्षा हुई तो ग्रेड F हो गई l
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जैसे-जैसे परीक्षाएँ आगे बढ़ने लगीं स्कोर कभी ऊपर नहीं उठा, बल्कि आपसी कलह, आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज और एक-दूसरे से नाराजगी के परिणाम स्वरूप कोई भी नहीं पढ़ता था क्योंकि कोई भी छात्र अंपने परिश्रम से दूसरे को लाभ नहीं पहुंचाना चाहता था l
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अंत में सभी आश्चर्यजनक रूप से फेल हो गए और प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि इसी तरह “समाजवाद” भी अंततोगत्वा फेल हो जाएगा क्योंकि ईनाम जब बहुत बड़ा होता है तो सफल होने के लिए किया जाने वाला उद्यम भी बहुत बड़ा होगा l
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परन्तु जब सरकार मेहनत के सारे लाभ आपसे छीन लेगी तो कोई भी न तो सफल होना चाहेगा और न ही सफल होने की कोशिश करेगा l
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निम्नलिखित पाँच सर्वश्रेष्ठ उक्तियाँ इस प्रयोग पर लागू होती हैं -
1. आप समृद्ध व्यक्ति को उसकी समृद्धि से बेदखल करके गरीब को समृद्ध बनाने का क़ानून नहीं बना सकते।
2. जो व्यक्ति बिना कार्य किए कुछ प्राप्त करता है, अवश्य ही परिश्रम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ईनाम को छीन कर उसे दिया जाता है।
3. सरकार तब तक किसी को कोई वस्तु नहीं दे सकती जब तक वह उस वस्तु को किसी अन्य से छीन न ले।
4. आप सम्पदा को बाँट कर उसकी वृद्धि नहीं कर सकते।
5. जब किसी राष्ट्र की आधी आबादी यह समझ लेती है कि उसे कोई काम नहीं करना है, क्योंकि बाकी आधी आबादी उसकी देख-भाल जो कर रही है और बाकी आधी आबादी यह सोच कर कुछ अच्छा कार्य नहीं कर रही कि उसके कर्म का फल किसी दूसरे को मिल रहा है – तो वहीँ उस राष्ट्र के अंत की शुरुआत हो जाती है।
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Wednesday, October 10, 2018

राजा विक्रमादित्य के नवरत्न

राजा विक्रमादित्य के नवरत्न

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-
नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-
जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-
ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु -
इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट -
विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर -
जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास -
ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर -
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि-
कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-
1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि

Tuesday, October 9, 2018

एक गरीब एक दिन एक व्यापारी जो श्याम बाबा का परम भक्त था  उसके पास अपनी जमीन बेचने गया, बोला सेढजी मेरी 2 एकड़ जमीन आप रख लो.

जय श्री श्याम

एक गरीब एक दिन एक व्यापारी जो श्याम बाबा का परम भक्त था  उसके पास अपनी जमीन बेचने गया, बोला सेढजी मेरी 2 एकड़ जमीन आप रख लो.
व्यापारी बोला, क्या कीमत है ?

गरीब बोला, 50 हजार रुपये.

व्यापारी थोड़ी देर सोच कर बोला, वो ही खेत जिसमें ट्यूबवेल लगा है ?

गरीब: जी. आप मुझे 50 हजार से कुछ कम भी देंगे, तो जमीन आपको दे दूँगा.

व्यापारी ने आँखें बंद कीं, 5 मिनट सोच कर बोला: नहीं, मैं उसकी कीमत 2 लाख रुपये दूँगा.

गरीब: पर मैं तो 50 हजार मांग रहा हूँ, आप 2 लाख क्यों देना चाहते हैं ?

व्यापारी बोला, तुम जमीन क्यों बेच रहे हो ?

गरीब बोला, बेटी की शादी करना है इसीलिए मज़बूरी में बेचना है. पर आप 2 लाख क्यों दे रहे हैं ?

व्यापारी बोला, मुझे जमीन खरीदनी है, किसी की मजबूरी नहीं. अगर आपकी जमीन की कीमत मुझे मालूम है तो मुझे आपकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना, मेरा बाबा श्याम  कभी खुश नहीं होगा.
 
ऐसी जमीन या कोई भी साधन, जो किसी की मजबूरियों को देख के खरीदा जाये वो जिंदगी में सुख नहीं देता, आने वाली पीढ़ी मिट जाती है.

व्यापारी ने कहा: मेरे मित्र, तुम खुशी खुशी, अपनी बेटी की शादी की तैयारी करो, 50 हजार की व्यवस्था हम गांव वाले मिलकर कर लेंगे, तेरी जमीन भी तेरी ही रहेगी.
 
मेरे बाबा श्याम जी ने सदा ही हारे का साथ निभाया है तो मै किसी की भी मजबूरी का क्यु फायदा ऊढाऊ ,देने वाला श्याम है मैरा क्या है

गरीब हाथ जोड़कर नीर भरी आँखों के साथ दुआयें देता चला गया।

ऐसा जीवन हम भी बना सकते हैं.

बस किसी की मजबूरी न खरीदें, किसी के दर्द, मजबूरी को समझ कर, सहयोग करना ही सच्चा तीर्थ है, एक सच्चे  श्याम भक्तकी निशानी है. 
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

नवरात्री का व्रत एवं पूजन कैसे करे

नवरात्री का व्रत एवं पूजन कैसे करे
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कब और कैसे करें नवरात्री उद्यापन ..???

हम सभी मां भगवती के पावन पर्व नवरात्र महोत्सव को सदियों से मानते आ रहे है। नवरात्रों के दौरान भारत की धरती मां अंबे के जयकारों से गूंज उठती है। स्त्रियां इस दौरान अपने परिवार सहित इन पावन नवरात्रों के दिन मां शक्ति की पूजा-आराधना करती हैं। वैसे तो नवरात्र साल में चार होते हैं, पर इनमें आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक (शारदीय नवरात्र) और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से रामनवमी तक (वसंत नवरात्र) को ही प्रमुख माना गया है। दो गुप्त नवरात्र होते हैं, जिनका प्रचलन कुछ खास नहीं है। ये गुप्त नवरात्र क्रमश: आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं। ये चारों नवरात्र हमारे चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक बन सकते हैं। अक्सर गृहस्थ जीवन की व्यस्त दिनचर्या में दो सर्वमान्य नवरात्र ही हमें महत्वपूर्ण लगते हैं।
कुंवारी कन्याओं के नाम के आगे "कुमारी" और विवाहित महिलाओं के नाम में "देवी" शब्द जोड़कर हमारी वैदिक संस्कृति ने स्पष्ट किया था कि प्रत्येक नारी देदीप्यमान ज्योतिर्मय सत्ता है। तभी तो अष्टमी और नवमी को घर-घर में देवी की पूजा सिर्फ कन्या के रूप में होती है। वह देवी ही हमें मां के रूप में जन्म देती है। पत्नी के रूप में सुख और पुत्री बनकर आनंद का प्रसाद बांटती है।
धरती पर जब देवी स्वरूप धारण कर उतरती है, तो वह प्रकृति में सबसे निराला, कोमल तथा बेजोड़ स्वरूप होता है। चरणों में कुंकुम लगाए और नूपुर झंकार की मधुर ध्वनि सुनाती देवी का धरती पर साक्षात अवतरण है-नारी। स्त्री में तेज और दीप्ति की प्रमुखता है। इसी से हमारे यहां नारी के नाम में "देवी" शब्द जोड़ा जाता है। आजकल नई पीढ़ी की महिलाएं अपने नाम के आगे "देवी" शब्द लगाना भले ही पसंद न करती हो, पर है यह बड़ा ही अर्थ-गंभीर और महिमामय शब्द। देवी स्वयं कहती है कि "पृथ्वी पर सारी çस्त्रयों में जो भी सौभाग्य, सौंदर्य है, वो पूरी तरह से मेरा ही है।" तभी तो अष्टमी और नवमी को हम कन्याओं के पग पखारते हैं, उन्हें दक्षिणा देते हैं, लेकि नवही लक्ष्मी और सरस्वती-स्वरूपिणी कन्या जब हमारे घर कोख में उतरती है तो अवतार लेने से पहले हम उसे नष्ट कर डालते हैं! क्या यही है दुर्गा पूजा और हमारी श्रद्धा का सत्य?

सृष्टि की जननी----
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना तथा जीवन शक्ति संसार में जहां कहीं भी दिखाई देती है, वहां देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वस्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत में लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। देवी सारी सृष्टि को उत्पन्न तथा नाश करने वाली परम शक्ति है। देवी ही पुण्यात्माओं की समृद्धि और पापाचारियों की दरिद्रता है। जगन्माता दुर्गा सुकृति मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में दुर्बुद्धिरूपी अलक्ष्मी, विद्वानों के ह्वदय में बुद्धि और विद्या, सज्जनों में श्रद्धा और भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा तथा मर्यादा के रूप में निवास करती है। माकंüडेय पुराण कहता है कि "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। संसाररूपी महासागर को पार कराने वाली नौका तुम हो। भगवान विष्णु के ह्वदय में निरंतर निवास करने वाली माता लक्ष्मी तथा शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माता गौरी भी तुम ही हो।"

नवरात्र के इन पावन नौ दिनों के दौरान कैसे भगवती की आराधना और पूजा-पाठ करें, आइये जाने---

शास्त्रनुसार मां भगवती स्वयं कहती हैं:
शरदकाले माहपूजा क्रियते या च वार्षिकी।

तस्यां ममैतन्माहात्मयं श्रुत्वा भक्ति समन्वित:॥

सर्वबाधाविनिमरूक्तो धनधान्य सुतान्वित:।

मनुष्यो मत्प्रसादने भविष्यति न संशय:॥

अर्थात् शारदीय और वसंत नवरात्रों में जो मेरी महापूजा की जाती है, उसमें श्रद्धाभक्ति के साथ श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए या सुनना

चाहिए। ऐसा करने पर निसंदेह मानव सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर सुख व समृद्घ जीवन जीने लगता है।
देवी आराधना का आधार-----

शरद और वसंत ऋतु में सभी प्राणी ज्यादा बीमार होते हैं, ऐसे में नियमपूर्वक फलाहार और मन, वचन, कर्म से शुद्ध आचरण करने से स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्राप्त होता है। भारतीय गृहस्थ जीवन के लिए वैसे भी शक्ति पूजन, शक्ति संवर्धन व शक्ति संचय को उपयोगी माना गया है। ‘स्त्रियां समस्ता:, सकला जगत्सु’ के अनुसार विश्व की सभी स्त्रियों को जगदंबा का रूप समझते हुए वीर-वीरांगनाओं के चरित्र से बल और शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से भी नवरात्रों के दौरान देवी की पूजा की जाती है, जिससे वैवाहिक जीवन के चार शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोहादि पर विजय पाई जा सके। पांच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी) तथा चार अंत:करण जैसे मन, बुद्घि, चित व अहंकार कुल नौ तत्व ही प्रकृति विकार के मुख्य परिणाम हैं। हर महिला जिसे गृहस्थ जीवन को सुखी बनाना है, उसे इनका महत्व जानना चाहिए। अनेक स्थानों पर कहा गया है-
दैत्यनाशार्थवचनो दकार: परिकीर्तित:।
उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेदसम्मत:॥
रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचक:।
भयशत्रुघ्नवचनश्चाकार: परिकीर्तित:॥
अर्थात् द-दैत्यनाश, उ-विघ्ननाश, र-रोगनाश, ग-पापनाश, आ-भय और शत्रुनाश का तात्पर्य है। अत: ‘ओम दुं दुर्गायै नम:’ भी एक प्रभावशाली मन्त्र है। मां से शक्ति प्राप्त कर हमें जिनका नाश करना है वे राक्षस कौन हैं? दुर्ग यानी हमारे तन-मन में छुपे तौर पर रहने वाले शोक, रोग, भव बन्धन, भय, आशंका आदि मनोविकार, शरीर के सामान्य क्रियाकलापों को प्रभावित करने वाले विकार या कीटाणु, जाने अनजाने होने वाले पाप, सब तरह के गुप्त प्रकट शत्रु ही दैत्य हैं।
रोग, शोक, महामारी, भय सामने हो, अपने शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो, रोग होने की आशंका हो या रोग आ चुका हो, तो देवी की शरण में जाना चाहिए।
साधकों की भाषा में यही दुर्गा देवी के नौ रूप हैं। यही आद्यशक्ति तीन रूपों में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के रूप में प्रसिद्ध हैं और सत, रज, तम की अधिष्ठात्री यही तीनों हैं। ये तीनों एक नारी के रूप में शक्तियां है। इन्हीं तीनों स्वरूपों, महाशक्तियों की आराधना करने से हमें बल, बुद्धि व सौभाग्य की प्राप्ति होती है। समस्त देवता भी भगवती की आराधना करते हैं। वे आदिशक्ति महालक्ष्मी के रूप में विराजमान होकर हर जगह पूजे जाते हैं। मां रजोगुण रूप में संसार का निर्माण करती हैं, सात्विक रूप में पालन करती हैं और समय की आवश्यकतानुसार तामसी रूप में संहार करती हैं।
भगवती की आराधना एवं उपासना से विशेष रूप से महिलाओं के अस्तित्व में दुर्गा का संचार होता है। इन नौ दिनों में मां से वरदान स्वरूप सहनशीलता, अस्थिर मन को स्थिरता, विवेक, आत्मबल, आत्मशक्ति की प्राप्ति कर सकते हैं। शक्ति साधना के समय मन, कर्म, वचन से श्रद्धापूर्वक मां की आराधना करने से सुख की प्राप्ति होती है। साधना के समय कई ऐसी स्थितियां सहज ही पैदा होती है, जो मन को भटकाती हैं। मां के स्वरूपों के प्रति विश्वास व प्रेम जागृत रहने से वातावरण में भी असुरी शक्तियों का नाश व दिव्य शक्तियों का संचार होने लगता है। नवरात्र के नौ दिन पावन दिन हैं। स्त्रियों को अपने भीतर छिपी शक्तियों को पहचानने के लिए यह उपयुक्त मौका है। महिलाएं तो शक्ति का भंडार हैं। केवल जरूरत है उन्हें अपने भीतर की संचित शक्तियों को पहचानने और उन्हें सही तरीके से संचालित करने की।
दुर्गासप्तशती के हर अध्याय में मां के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। दुर्गासप्तशती को ध्यानपूर्वक पढ़ने से मां अंबे की महिमा का बखूबी ज्ञान हो जाता है। दुर्गासप्तशती के तेरह अध्याय मां के स्वरूपों के माध्यम से भक्तों की मुश्किलों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जीवन की किसी भी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में नवरात्र के नौ दिन बहुत ही पावन माने गए हैं।
नवरात्र में देवी माँ के व्रत रखे जाते हैं । स्थान–स्थान पर देवी माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती हैं । घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर दुर्गा सप्तशती पाठ आदि होते हैं भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक बार 9-9 दिन ही ये विशिष्ट पूजाएं की जाती हैं। इस काल को नवरात्र कहा जाता है। वर्ष में दो बार भगवती भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इनमें एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं और दूसरे श्राद्धपक्ष के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक।
इस व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कराएं। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए।
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शक्ति एक, रूप अनेक---
हमें मानना होगा देवी किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं, वह तो केवल नारी में विराजमान है। वह देवी ही हमारेे घर में मां, पत्नी और बेटी के रूप में मौजूद है। हम घर में इन स्वरूपों का आदर करें और उनसे सच्चरित्र तथा शक्ति का आशीर्वाद मांगें। आज से शरत्काल के पवित्र आश्विन मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में घर-घर में "दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोùस्तुते" की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगी है।

ये मंत्र वे हैं, जिन्हें शताब्दियों से हमारी संस्कृति में भगवती से वर प्राप्ति के लिए जपा जाता है। दुर्गा पूजा, शारदीय नवरात्र और महाशक्तिअनुष्ठान-तीन नाम पर त्योहार एक। नवरात्र अर्थात जौ में उग आए नन्हे-नन्हे अंकुरों तथा नौ दिनों तक घर-आंगन में आनंद प्रसाद बांटती कन्यारूपिणी शक्ति का पूजन-अर्चन-वंदन। नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं। दो बार प्रत्यक्ष और दो बार गु# रूप में, लेकिन इनमें प्रत्यक्ष रूप में आने वाले शारदीय नवरात्र सबसे ज्यादा प्रशस्त हैं। दुर्गास#शती में देवी स्वयं कहती हैं कि "शारदीय नवरात्र में जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति सहित मेरी पूजा करेगा, वह सभी बाधाओं से मुक्तहोकर धन, धान्य और संतान को प्राप्त करेगा।"
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कैसे करें देवी की पूजा...????
नवरात्र के दिनों में श्रद्घापूर्वक मां का दरबार सजाया जाता है। कई घरों में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है। घर परिवार की शुभता के लिए मंगल कलश स्थापित करके एक मिट्टी के बर्तन में जौ बोने का विधान है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा का पूजन, पाठ और हवन किया जाता है। सुबह और शाम उनकी आरती उतारी जाती है। मां को लाल चुनरिया, लाल फूल चढ़ाए जाते हैं। नवरात्र के दौरान सुबह और शाम भक्तिपूर्वक दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।
व्यस्तता के कारण आप प्रतिदिन एक अध्याय भी पढ़ सकती हैं। यदि व्रत संकल्प लेकर नौ दिनों का व्रत रखा है, तो भोजन में अन्न और नमक न लें। नवरात्र के दौरान सिर्फ फलाहार ही करें। कई लोग नवरात्र के दौरान सिर्फ पानी पीकर और दिन भर में एक जोड़ा लौंग खाकर ही रहते हैं।
नवरात्र का व्रत श्क्ति उपासना के सभी व्रतों में सर्वोच्च और श्रेष्ठ है। यह संपूर्ण मनोकामनाओं को पूरा करने वाला और मानसिक शांति देने वाला व्रत है। नवरात्र के आठवें दिन दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। कुछ लोग नवमी के दिन उद्यापन करते हैं। उद्यापन में सही विधि से पूजा करें। हवन आदि करके मां भगवती को सामर्थ्यनुसार लाल चुनरी, श्रृंगार का सामान, माला और फल आदि चढ़ाकर सौभाग्य का वरदान प्राप्त करें। पूरी, हलवा, चने का भोग लगाकर नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन करवाएं और उन्हें सामथ्र्यनुसार उपहार भी दें। दक्षिणा देना भी न भूलें।
श्रद्धानुसार एक बालक को भी भोजन कराएं और दक्षिणा-दान दें। अष्टमी व नवमी की संध्या को भक्तिपूर्वक भजन, पूजन, मां भगवती की आरती करना न भूलें।
देवी भागवत का कथन है कि दुख, दरिद्रता, कष्ट का निवारण, विजय, सामने खड़ी मुसीबत, रोग से रक्षा के लिए दुर्गा की विधि विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए।
ऐसे करें देवी मां की पूजा-अर्चना
प्राय: धार्मिक अनुष्ठानों में शुद्धता, दिशा और स्थान का खास ध्यान रखा जाता है। मां दुर्गा की पूजा करते समय उत्तर-पूर्व के स्थान का चुनाव करें।
हरियाली (जौ) बोने के लिए शुद्ध छनी हुई मिट्टी लें। माटी के साफ बर्तन में या धरती पर बोएं।
मां की प्रतिमा के दाहिनी ओर हरियाली और बांईओर कलश स्थापित करें।
अखण्ड ज्योति के लिए शुद्घ घी का प्रयोग करें।
मां को लाल चंदन, लाल फूल, लाल चुनरी एवं श्रृंगार की वस्तुएं भेंट करें।
सुबह-शाम मां का दुर्गासप्तशती पाठ, दुर्गा स्तोत्र, दुर्गा स्तुति एवं आरती करके आशीर्वाद प्राप्त करें।
व्रत विधान के अनुसार नौ दिन या कुछ लोग प्रथम व अन्तिम दिन फलाहारी व्रत रख सकते हैं।
अष्टमी के दिन नौ कुंवारी कंन्याओं (9 साल तक की उम्र की अति उत्तम मानी गई है) को मीठा भोजन कराके सामर्थ्यनुसार वस्त्र, वस्तुएं, दक्षिणा भेंट करें।
उद्यापन के बाद एक बालक और अपने गुरूजन को भी भोजन कराके वस्त्र, दक्षिणा देकर अपने सुखमय जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करें।
नौवें दिन मां सिद्घिदात्री की आरती करें। इनकी पूजा-अर्चना करने से पारिवारिक संपन्नता, उन्नति, पूर्णता और श्रेष्ठता की प्राप्ति होती है।
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नवरात्र क्या है....????
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र'
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संस्कृति का पर्व....??
नवरात्र जैसा सांस्कृतिक पर्व साधना और संयम के मनोभावों को प्रकट करने का पर्व-काल है। इन्हीं नौ दिनों में भगवान श्रीराम ने अत्याचारी रावण को मारने के लिए किष्किंधा में प्रवर्षण पर्वत पर "शक्ति पूजा" की थी। अधर्म के थपेड़े खा रहे पांडवों को महाभारत के धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने इन्हीं नौ दिनों में "देवी पूजा" करने का उपदेश दिया था। धर्मिक इतिहास की ओर नजर डालें तो नवरात्र का उल्लेख वैदिक काल से है। इसी कारण घर-घर में दुर्गा-पूजा उत्सव की तरह मनाई जाती है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर लय हो जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, पर देवी की असली प्रतिमा तो "घट" है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दाईं ओर नव-यवांकुर (जौ के अंकुर) और सामने हवनकुंड! नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र और गंध आदि से षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल तथा खीर। पूजन तथा हवन के बाद "दुर्गास#शती" का पाठ।
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नारी में नवदुर्गा-----
कूर्मपुराण में धरती की स्त्री का पूरा जीवन आकाश में रहने वाली नवदुर्गा की मूर्ति मे स्पष्ट रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री", कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" तथा विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल और पवित्र होने से "चंद्रघंटा" कहलाती है। नए जीव को जन्म देने हेतु गर्भधारण करने से "कूष्मांडा" और संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कंदमाता" के रूप में होती है। संयम और साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" और पतिव्रता होने के कारण अपनी और पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से "कालरात्रि" कहलाती है। कालीपुराण के अनुसार सारे संसार का उपकार करने से "महागौरी" तथा धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले पूरे परिवार और सारे संसार को सिद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद देती नारी "सिद्धिदात्री" के रूप में जानी जाती है।
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नौ दिन या रात...????
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीज़ों से भी सम्बंध है, जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-
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कुट्टू (शैलान्न)
दूध-दही
चौलाई (चंद्रघंटा)
पेठा (कूष्माण्डा)
श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
हरी तरकारी (कात्यायनी)
काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
साबूदाना (महागौरी)
आंवला(सिद्धीदात्री)
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क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।
अष्टमी या नवमी..????
यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। वैसे अष्टमी, नवमी और दशहरे के चार दिन बाद की चौदस, इन तीनों की महत्ता "दुर्गासप्तशती" में कही गई है।
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प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी। तृतीयं चंद्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचम स्कन्द मातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तितता:। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्माणैव महात्मना।। देवी मंत्र की आराधना के स्वर गूंजते रहते हें ।
'के हरि वाहन राजत, खड़ग खपर धारी। सुर नर मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी।। कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर समराजत ज्योती।।' श्री अम्बे जी की इस आरती से अनुष्ठान व्रत का विधि विधान से समापन व विसर्जन वैदिक व पारंपरिक ढंग से होता हें । 'या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै नमो नम:' देवी सूक्त क मंत्र सभी देवी मंदिरों में सुने जा सकते हें ।
कब और कैसे करे नवरात्री उद्यापन..????

----नवरात्र के अंतिम दिन नौ दिन का नवरात्र व्रत धारण करने वाले श्रद्धालुओं को मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजन-हवन कर उद्यापन करना चाहिए.। घरों में कलश की स्थापना कर विधान के साथ व्रत धर्म का पालन करने वालों को नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन ग्रहण करवाकर और द्रव्य, वस्त्र प्रदान करने के बाद पारण करना चाहिए ।
-----देवी मंदिरों में भी नवरात्र के दौरान चलते रहे श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ का समापन किया जाता हें । कई स्थानों पर भंडारे का आयोजन भी किया गया। ------इस दिन श्रद्धालुओं भी मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार के साथ हवन कर और नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन ग्रहण करवाते हें ।
-----नवरात्र व्रत धारण करने वालों के लिए यह विधान है कि नौ देवियों स्वरूप नौ कन्याओं को भोजन ग्रहण कराने और दान-दक्षिणा के बाद ही व्रत पूरा माना जाता है।
------नौ दिनों तक नवरात्र व्रत धारण करने वाले श्रद्धालुओं ने हवन-पूजन के बाद नौ कन्यायों को भोजन ग्रहण कराया और खुद पारण किया।
-------उद्यापन के बाद एक बालक और अपने गुरूजन को भी भोजन कराके वस्त्र, दक्षिणा देकर अपने सुखमय जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करें।
------व्रतधारियों को कुंवारी कन्याओं को भोजन करवाकर अपने व्रत का उद्यापन संपन्न करना चाहिए लोग कुंवारी कन्याओं को भोजन और वस्त्र अर्पित करके अपने व्रत का उद्यापन कर सकते हैं।
केसे करें कन्या पूजन..???
----अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन कन्या पूजन किया जा सकता है। अतः श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करना चाहिये।
----सर्वप्रथम माँ जगदम्बा के सभी नौ स्वरूपों का स्मरण करते हुए घर में प्रवेश करते ही कन्याओं के पाँव धोएं।
----इसके बाद उन्हें उचित आसन पर बैठाकर उनके हाथ में मौली बांधे और माथे पर बिंदी लगाएं।
----उनकी थाली में हलवा-पूरी और चने परोसे।
-----अब अपनी पूजा की थाली जिसमें दो पूरी और हलवा-चने रखे हुए हैं, के चारों ओर हलवा और चना भी रखें। बीच में आटे से बने एक दीपक को शुद्ध घी से जलाएं।
----कन्या पूजन के बाद सभी कन्याओं को अपनी थाली में से यही प्रसाद खाने को दें।
----अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।
-----जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।

जय माता दी