Wednesday, November 14, 2018

🌻 *ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ❓*🌻

[

🌻 *ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ❓*🌻

💗 रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

💗 ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है।

💗 *“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।*
*(ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।*)*

🍥 सिख धर्म में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--"अमृत वेला", जिसके द्वारा इस समय का महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईवर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है।

🍥 ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।

📒 पौराणिक महत्व -- वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

📚 *शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है--*

🍥 वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।
ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥
🔮 अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे।

🌹🌹 *ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति* 🌹🌹

🍥 ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।

💎 *इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि*💎

🍏 आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

🌻ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

🌻ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें।

📚वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।

🌻प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - ऋग्वेद-1/125/1
अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।
यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा। सुवाति सविता भग:॥ - सामवेद-35

🍥 अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है।
उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे।

📒 अथर्ववेद- 7/16/२
अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।

🔮 व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

🌻🍥 *जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या :-*-🍥🌻

🌹प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है ।

🌹प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।

🍥 प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है।

🍥 दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।

💎 दोपहर 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।

💎 दोपहर 3 से 5 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।

💗 शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।

💗 रात्री 7 से 9 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।

💗 रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।

💎🍥 रात्री 11 से 1 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।

💗💎 रात्री 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।

🔮🔮🔮🔮 *नोट :-*🔮🔮🔮🔮

🧘‍♂🧘‍♂ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।

🌎 पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।

🍏 शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।

🔮🍥 आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा। इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।

*सब सुखी और निरोगी हों !!*

💎💎💎💎💎💎💎💎💎💎

Friday, November 2, 2018

हनुमानजी में अतुलित बल है ।इसका मापदंड क्या है?

हनुमानजी में अतुलित बल है ।इसका मापदंड क्या है?

.

पुराने समय में बल की माप हाथियों की शक्ति से की जाती थी ।आजकल तो लोगों में उतना बल ही नहीं है,
.
इसलिए आजकल घोड़े की शक्ति (Horse Power- अश्व शक्ति )से बल की माप को दर्शाया जाता है ।
.
कहते हैं कि दुःशासन में दस हजार हाथियों का बल था फिर भी वह द्रौपदी की साड़ी खींचते खींचते हताश हो गया था ।
.
हनुमानजी के बल के विषय में आप ऐसे समझ सकते हैं --
.
.
10000 हाथी = एक दिग्गज
10000 दिग्गज = एक ऐरावत
10000 ऐरावत = एक इन्द्र
10000 इन्द्र =
.
हनुमान जी की सबसे छोटी कनिष्ठा उंगली का बल।

अब आप समझ सकते हैं कि हनुमानजी में कितना बल है ।

इसीलिए
.
तुलसीदास जी भी कहते हैं --
.
.
(अतुलितबलधामम् *****।)
.
.
हनुमानजी की विशेषता देखिए
.
इतने बलशाली होकर भी उनमें कोई अभिमान नहीं है ।वे कहते हैं कि मुझमें कोई बल नहीं है ।

समुद्र लाँघने के समय सब वानरों ने अपने अपने बल का बखान किया।किसी ने पूछा कि हनुमानजी आप कैसे चुप हैं? आपने अपने बल के बारे में कुछ नहीं कहा ।
.
हनुमानजी बोले --मुझमें कोई बल ही नहीं है, जो मैं बखान करूँ ।कहा कि आप तो अतुलितबलधामम् कहे जाते हैं । हनुमानजी बोले - हाँ ! सही है ।धाम का अर्थ है,
.
घर या मकान ।तो मुझमें जो बल है, वह मेरा नहीं है, क्योंकि मकान में जो होता है,
.
बह मकान का नही होता, मकान मालिक का होता है, जो उस घर में रहता होता है, उसी का होता है ।
.
तो आपके अंदर कौन रहता है ।हनुमानजी बोले- हमारे हृदय में तो प्रभु राम जी रहते हैं,
.
इसीलिए बल भी उन्हीं का है।किसी ने कहा --इसका प्रमाण? बोले प्रमाण भी है ।
.
जब इन्द्र पुत्र जयंत कौआ बनकर सीता जी के चरणों कोे चोंच के द्वारा घायल कर गया था ।तब राम जी ने सींक का बाण उसके पीछे लगा दिया था ।
.
वह पूरे ब्रह्माण्ड में शरण माँगता फिरा।किसी ने शरण नहीं दी।
.
.
.
(काहूँ बैठन कहा न ओही।
राखि को सकै राम कर द्रोही।।)
.
.
.
जो भगवान राम से द्रोह करे, उसे कौन बचाबे।नारद जी को उस पर दया आ गयी।
.
उन्होंने उसे तुरंत श्री राम जी के पास भेज दिया।उसने जाकर प्रार्थना की और चरण पकड़ लिए ।
.
.
.
(आतुर सभय गहेसि पद जाई।
त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ।।
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई।
मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।)
.
प्रभु !! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए ।आपके अतुलित बल और अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य )को मैं मंदबुद्धि जान नहीं पाया था ।तो अतुलित बल राम जी का है और राम जी ही मेरे हृदय में निवास करते हैं,
.
इसलिए बल तो उन्हीं का है।मैं तो केवल उनके बल का धाम हूँ । कितनी निरभिमानता?
.
महावीर होकर भी कहते हैं कि यह तो भगवान का बल है।
.
इसीलिए उनका नाम हनुमान है, कोई मान (अभिमान) ही नहीं ।

जय जय सियाराम
जय हनुमान

कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

रक्षा सूत्र -

.
कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

आपने देखा होगा कि लोग पूजा-पाठ और शुभ अवसरों पर कलाई में मौली यानी कलावा बांधते हैं। आपने सोचा है कि इसके पीछे क्या कारण हो सकता है।

अगर आप यह मानते है कि यह धार्मिक कारणों से होता है तो आप आधी-अधूरी जानकारी रखते हैं। असल में कलावा बांधने के कई पीछे ऐसे वैज्ञानिक कारण हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

कलावा बांधने की परंपरा ऐसे शुरु हुई

वैज्ञानिक करणों पर बात करने से पहले आइये बात करते हैं इसके कुछ धार्मिक पहलुओं पर। शास्त्रों के अनुसार कलावा यानी मौली बांधने की परंपरा की शुरुआत देवी लक्ष्मी और राजा बलि ने की थी।

कलावा को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, माना जाता है कि कलाई पर इसे बांधने से जीवन पर आने वाले संकट से रक्षा होती है।

इसका कारण यह है कि कलावा बांधने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव की कृपा प्राप्त होती है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की अनुकूलता का भी लाभ मिलता है।

गंभीर रोगों से रक्षा करता है कलावा ........

शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती है।

कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। इससे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का सामंजस्य बना रहता है।

माना जाता है कि कलावा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाव होता है।

कब कैसे धारण करें कलावा .......

शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

पर्व त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। Prasad Davrani

भगवान गणेश की प्रिय दुर्वा की महिमा

भगवान गणेश की
प्रिय दुर्वा की महिमा
.
महालक्ष्मी की छोटी
बहन है दुर्वा !!
.
पौराणिक संदर्भों से ज्ञान होता
है कि क्षीर सागर से उत्पन्न होने
के कारण भगवान विष्णु को यह
अत्यंत प्रिय रही और क्षीर सागर
से जन्म लेने के कारण लक्ष्मी
की छोटी बहन कहलाई।

विष्च्यवादि सर्व देवानां,
दुर्वे त्वं प्रीतिदायदा।
क्षीरसागर सम्भूते,
वंशवृद्धिकारी भव।।

दुर्वा यानी दूब जैसा कोई अन्य
पदार्थ,इस धरा पर हो ही नहीं
सकता,जो देव मनुष्य व पशु
तीनों को ही प्रिय है।

नन्ही दूब के आचमन से देवता,
दूब आच्‍छादित मैदानों पर
भ्रमण से मनुष्य और भोजन
के रूप में पशु इसको पाकर
प्रसन्न रहते हैं।

खेल के मैदान,मंदिर,बाग-बगीचे
में उगी नन्ही दूब का मखमली
हरा गलीचा सबको अपनी ओर
आकर्षित करता है।

सबके पांव से रगड़ खाती,
विपरी‍त परिस्थितियों में भी
जीवित रहती,देवताओं को
प्रिय व मानव के लिए
मंगलकारी व आरोग्य
प्रदायक है।

हरी कोमल दूब का महत्व :

अनेक युगों से हरी कोमल दूब
का मैदान सर्वप्रिय और उद्यानों
का आवश्यक अंग रहा है।

अथर्ववेद तथा कौटिल्य
अर्थशास्त्र में हरी व कोमल
दूब का संदर्भ मिलता है।

पुराणों में भी नंदन वन
का वर्णन मिलता है।

वाटिकाओं में समतल व ऊंची-
नीची घुमावदार भूमि पर कोमल
हरी दूब लगी हुई है,जिस पर
कुलांचे मारते हिरण घास चर
रहे हैं और गाय बड़े चाव से
घास खाकर जुगाली कर रही है।

सम्राट विक्रमादित्य और
अशोक के काल में भी हरित
घास मैदानों की बहुलता थी।

मुगलकाल से पूर्व व
पश्चात उद्यान कला
अत्यंत वि‍कसित थी।

हरे घास के मैदानों पर विभिन्न
प्रकार के घुमावदार बेलबूटों
युक्त कटाव के उभार उपवनों
शोभा बढ़ाते थे।

कश्मीर,मैसूर के वृंदावन
गार्डन के ‍हरित घास के
उपवन,हैदराबाद में फिल्म
सिटी के बगीचों की हरित
आभा की झलक से मन
पुलकित हो जाता है।

पौराणिक संदर्भों से ज्ञान होता
है कि क्षीर सागर से उत्पन्न होने
के कारण भगवान विष्णु को यह
अत्यंत प्रिय रही और क्षीर सागर
से जन्म लेने के कारण लक्ष्मी
की छोटी बहन कहलाई।

विष्च्यवादि सर्व देवानां,
दुर्वे त्वं प्रीतिदायदा।
क्षीरसागर सम्भूते,
वंशवृद्धिकारी भव।।

गौरीपूजन,गणेश पूजन में दुर्वा
दल से आचमन अ‍त्यंत शुभ
माना गया है।

जहां रत्नभूषित,झिलमिल
करती इंद्रधनुषी छटा बिखेरे
लक्ष्मी रहती है वहीं हरित वस्त्रों
मे लिपटी सुकुमार कन्या के
अक्षय रूप से कौन आकर्षित
न होगा ?

बलवर्धक दुर्वा कालनेमि
राक्षस का प्राकृतिक
भोजन थी।
.
.
इसके सेवन से वह अति
बलशाली हो गया था।

महर्षि दुर्वासा को भी
दुर्वा रस अत्यंत प्रिय था।

तुलसीदास ने इसे अन्य
मांगलिक पदार्थों के
समकक्ष माना है।

दधि दुर्वा रोचन फल-फूला।
नव तुलसीदल मंगल मूला।।

वा‍ल्मीकि ऋषि ने भी भगवान
राम के वर्ण की तुलना दुर्वा से
कर इसको कितना सम्मान
दिया है-

रामदुर्वा दल श्यामे,
पद्याक्षं पीतवाससा।

यह पौधा जमीन पर रेंगता,
चलने में बाधा नहीं पहुंचाता,
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीवित रहता हुआ विनम्रता
व दृढ़ता का पाठ पढ़ाता है।

प्रखर सूर्य किरणों में यह ऊपर
से सूख जाती है लेकिन मूल में
प्राण रहते हैं और जरा-सी जल

की बूंदों से पुन: हरी हो जाती है।

कहा जाता है कि इसकी जड़ें
पाताल लोक तक जाती हैं और
अमृत खींचती हैं।

विनम्रता,दृढ़ता,अमरत्व,सर्व
मंगलकारी होने के कारण ही
प्रत्येक युग में नन्हीं दूब के
विशाल गुणों से कोई-न-कोई
संत अवश्य प्रभावित रहा है,
तब ही गुरुनानक ने इसके
जीवन का अनुसरण करने
की प्रेरणा दी है-

नानक नन्हों हो रहो,
जैसे नन्हीं दूब।
और घास जल जाएगी,
दूब खूब की खूब।

महाराणा प्रताप के दुर्दिनों
में भी घास उनके परिवार
का सहारा बनी।

जिस प्रकार यह स्वयं बढ़ती है
उसी प्रकार यह वंश वृद्धि की
भी संकेतक है।

आज भी राजस्थान में अनेक
परिवारों में पुत्र जन्म की सूचना
दूर-देश के संबंधियों नाना,दादा,
मामा को भेजनी होती है तो
संदेशवाहक कुछ न कहकर
केवल दुर्वा दल के ही दर्शन
कराते हैं।

इसका अर्थ यही है कि
पुत्र जन्म हुआ है।

इस कृत्य को
'हरी दिखाना' कहते हैं।

अगर डाक द्वारा सूचना
भेजनी हो तो लिफाफे में
दो-तीन तिनके दूब के डाल
दिए जाते हैं,जो कि शुभ सूचना
के प्रतीक होते हैं।

विवाह में वरमाला में भी
दुर्वा दल का उपयोग शुभ
माना जाता है।

आजकल इसका उपयोग
नहीं किया जाता है।

नटखट जड़ोंवाली घास :

दूब का पौधा एक बार लगाने
के बाद उस जगह से नष्ट करना
मुश्किल है।

यह नन्ही नटखट अपनी जड़ें
(गांठें)जमीन में रोपती पसरती
ही जाती है।

विश्व के अलग-अलग देशों
में इसकी अनेक प्रजातियां
उपलब्‍ध हैं।

भारत में प्राय: तीन वर्णों
की दूब दिखाई देती है-
--श्याम हरित,हर‍ित व श्वेत।

श्याम हरित दूब दक्षिण
भारत में दिखाई देती है।

हर‍ित उत्तरी भारत व
राजस्थान,गुजरात में
दिखाई देती है।

मरुप्रदेश,जोधपुर की
हरित बारीक,कोमल
दुर्वा विश्वप्रसिद्ध है।

संस्कृत भाषा में यह अनेक
पर्वों (गांठों) के कारण शत
पर्वा, स्वाभाविक तरीके से
उगने के कारण (रुहा),प्रसार
का अंत नहीं होने के कारण
अनम्ता के नाम से भी जानी
जाती है।

रासायनिक तौर पर दुर्वा रस
में क्लोरोफिल के साथ प्रोटीन,
कार्बोहाइड्रेट व आंशिक रूप से
अनेक लवण भी विद्यमान रहते हैं।

इसमें अनेक आरोग्यदायी व
रोगहर गुण हैं लेकिन इनका
उपयोग कम होता जा रहा है।

त्रिदोष नाशक है दूब घास !!

शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा
जो दूब को नहीं जानता होगा।

हाँ यह अलग बात है कि हर
क्षेत्रों में तथा भाषाओँ में यह
अलग अलग नामों से जाना
जाता है।

हिंदी में इसे दूब,दुबडा,
संस्कृत में दुर्वा,सहस्त्रवीर्य,
अनंत,भार्गवी,शतपर्वा,
शतवल्ली,मराठी में पाढरी
दूर्वा,काली दूर्वा,गुजराती में
धोलाध्रो,नीलाध्रो कहा जाता है।

अंग्रेजी में कोचग्रास,क्रिपिंग
साइनोडन,बंगाली में नील
दुर्वा,सादा दुर्वा आदि नामो
से जाना जाता है।

इसके आध्यात्मिक महत्वानुसार
प्रत्येक पूजा में दूब को अनिवार्य
रूप से प्रयोग में लाया जाता है।

इसके औषधीय गुणों के
अनुसार दूब त्रिदोष को
हरने वाली एक ऐसी औषधि
है जो वात कफ पित्त के समस्त
विकारों को नष्ट करते हुए वात-
कफ और पित्त को सम करती है।

दूब सेवन के साथ यदि कपाल
भाति की क्रिया का नियमित
यौगिक अभ्यास किया जाये
तो शरीर के भीतर के त्रिदोष
को नियंत्रित कर देता है।

यह दाह शामक,रक्तदोष,
मूर्छा,अतिसार,अर्श,रक्त
पित्त,प्रदर,गर्भस्राव,गर्भपात,
यौन रोगों,मूत्रकृच्छ इत्यादि में
विशेष लाभकारी है।

यह कान्तिवर्धक,रक्त स्तंभक,
उदर रोग,पीलिया इत्यादि में
अपना चमत्कारी प्रभाव
दिखाता है।

श्वेत दूर्वा विशेषतः वमन,कफ,
पित्त,दाह,आमातिसार,रक्त
पित्त,एवं कास आदि विकारों
में विशेष रूप से प्रयोजनीय है।

सेवन की दृष्टि से दूब की जड़
का 2 चम्मच पेस्ट एक कप
पानी में मिलाकर पीना चाहिए।

यह घास एक बार लगा दी तो
ज़्यादा देखभाल नहीं मांगती
और कठिन से कठिन परिस्थिति
में भी आराम से बढती है।

इसमें कीड़े भी नहीं लगते ..
इसलिए लॉन में कोई अन्य
घास न लगा कर दुर्वा ही
लगाना चाहिए।

इस पर नंगे पैर चलने से नेत्र
ज्योति बढती है और अनेक
विकार शांत हो जाते है।

यह शीतल और पित्त को
शांत करने वाली है।

दूब के रस को हरा रक्त
कहा जाता है।
इसे पीने से एनीमिया
ठीक हो जाता है।

नकसीर में इसका रस नाक
में डालने से लाभ होता है।

दूब के काढ़े से कुल्ले करने
से मूंह के छाले मिट जाते है।

दूब का रस पीने से पित्त जन्य
वमन(उल्टी)ठीक हो जाता है।

दूब का रस दस्त में
लाभकारी है।

यह रक्त स्त्राव,गर्भपात को
रोकता है और गर्भाशय और
गर्भ को शक्ति प्रदान करता है।

कुँए वाली दूब पीसकर मिश्री
के साथ लेने से पथरी में लाभ
होता है।

इसे पीस कर दही में मिलाकर
लेने से बवासीर में लाभ होता
है।

दूब की जड़ का काढा वेदना
नाशक और मूत्रल होता है।

दूब के रस को तेल में पका कर
लगाने से दाद,खुजली और व्रण
मिटते है।

दूब के रस में अतीस के चूर्ण को
मिलाकर दिन में २-३ बार चटाने
से मलेरिया में लाभ होता है।

दूब के रस में बारीक पिसा
नाग केशर और छोटी इलायची
मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे
बच्चों को नस्य दिलाने से वे
तंदुरुस्त होते है,बैठा हुआ तालू
ऊपर चढ़ जाता है।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति
जयति पुण्य भूमि भारत

सदा सर्वदा सुमंगल
वंदेमातरम
ॐ गं गणपतये नमः
जय भवानी
जय श्री राम🙏