Tuesday, October 9, 2018

नवरात्री का व्रत एवं पूजन कैसे करे

नवरात्री का व्रत एवं पूजन कैसे करे
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कब और कैसे करें नवरात्री उद्यापन ..???

हम सभी मां भगवती के पावन पर्व नवरात्र महोत्सव को सदियों से मानते आ रहे है। नवरात्रों के दौरान भारत की धरती मां अंबे के जयकारों से गूंज उठती है। स्त्रियां इस दौरान अपने परिवार सहित इन पावन नवरात्रों के दिन मां शक्ति की पूजा-आराधना करती हैं। वैसे तो नवरात्र साल में चार होते हैं, पर इनमें आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक (शारदीय नवरात्र) और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से रामनवमी तक (वसंत नवरात्र) को ही प्रमुख माना गया है। दो गुप्त नवरात्र होते हैं, जिनका प्रचलन कुछ खास नहीं है। ये गुप्त नवरात्र क्रमश: आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं। ये चारों नवरात्र हमारे चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक बन सकते हैं। अक्सर गृहस्थ जीवन की व्यस्त दिनचर्या में दो सर्वमान्य नवरात्र ही हमें महत्वपूर्ण लगते हैं।
कुंवारी कन्याओं के नाम के आगे "कुमारी" और विवाहित महिलाओं के नाम में "देवी" शब्द जोड़कर हमारी वैदिक संस्कृति ने स्पष्ट किया था कि प्रत्येक नारी देदीप्यमान ज्योतिर्मय सत्ता है। तभी तो अष्टमी और नवमी को घर-घर में देवी की पूजा सिर्फ कन्या के रूप में होती है। वह देवी ही हमें मां के रूप में जन्म देती है। पत्नी के रूप में सुख और पुत्री बनकर आनंद का प्रसाद बांटती है।
धरती पर जब देवी स्वरूप धारण कर उतरती है, तो वह प्रकृति में सबसे निराला, कोमल तथा बेजोड़ स्वरूप होता है। चरणों में कुंकुम लगाए और नूपुर झंकार की मधुर ध्वनि सुनाती देवी का धरती पर साक्षात अवतरण है-नारी। स्त्री में तेज और दीप्ति की प्रमुखता है। इसी से हमारे यहां नारी के नाम में "देवी" शब्द जोड़ा जाता है। आजकल नई पीढ़ी की महिलाएं अपने नाम के आगे "देवी" शब्द लगाना भले ही पसंद न करती हो, पर है यह बड़ा ही अर्थ-गंभीर और महिमामय शब्द। देवी स्वयं कहती है कि "पृथ्वी पर सारी çस्त्रयों में जो भी सौभाग्य, सौंदर्य है, वो पूरी तरह से मेरा ही है।" तभी तो अष्टमी और नवमी को हम कन्याओं के पग पखारते हैं, उन्हें दक्षिणा देते हैं, लेकि नवही लक्ष्मी और सरस्वती-स्वरूपिणी कन्या जब हमारे घर कोख में उतरती है तो अवतार लेने से पहले हम उसे नष्ट कर डालते हैं! क्या यही है दुर्गा पूजा और हमारी श्रद्धा का सत्य?

सृष्टि की जननी----
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना तथा जीवन शक्ति संसार में जहां कहीं भी दिखाई देती है, वहां देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वस्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत में लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। देवी सारी सृष्टि को उत्पन्न तथा नाश करने वाली परम शक्ति है। देवी ही पुण्यात्माओं की समृद्धि और पापाचारियों की दरिद्रता है। जगन्माता दुर्गा सुकृति मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में दुर्बुद्धिरूपी अलक्ष्मी, विद्वानों के ह्वदय में बुद्धि और विद्या, सज्जनों में श्रद्धा और भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा तथा मर्यादा के रूप में निवास करती है। माकंüडेय पुराण कहता है कि "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। संसाररूपी महासागर को पार कराने वाली नौका तुम हो। भगवान विष्णु के ह्वदय में निरंतर निवास करने वाली माता लक्ष्मी तथा शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माता गौरी भी तुम ही हो।"

नवरात्र के इन पावन नौ दिनों के दौरान कैसे भगवती की आराधना और पूजा-पाठ करें, आइये जाने---

शास्त्रनुसार मां भगवती स्वयं कहती हैं:
शरदकाले माहपूजा क्रियते या च वार्षिकी।

तस्यां ममैतन्माहात्मयं श्रुत्वा भक्ति समन्वित:॥

सर्वबाधाविनिमरूक्तो धनधान्य सुतान्वित:।

मनुष्यो मत्प्रसादने भविष्यति न संशय:॥

अर्थात् शारदीय और वसंत नवरात्रों में जो मेरी महापूजा की जाती है, उसमें श्रद्धाभक्ति के साथ श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए या सुनना

चाहिए। ऐसा करने पर निसंदेह मानव सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर सुख व समृद्घ जीवन जीने लगता है।
देवी आराधना का आधार-----

शरद और वसंत ऋतु में सभी प्राणी ज्यादा बीमार होते हैं, ऐसे में नियमपूर्वक फलाहार और मन, वचन, कर्म से शुद्ध आचरण करने से स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्राप्त होता है। भारतीय गृहस्थ जीवन के लिए वैसे भी शक्ति पूजन, शक्ति संवर्धन व शक्ति संचय को उपयोगी माना गया है। ‘स्त्रियां समस्ता:, सकला जगत्सु’ के अनुसार विश्व की सभी स्त्रियों को जगदंबा का रूप समझते हुए वीर-वीरांगनाओं के चरित्र से बल और शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से भी नवरात्रों के दौरान देवी की पूजा की जाती है, जिससे वैवाहिक जीवन के चार शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोहादि पर विजय पाई जा सके। पांच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी) तथा चार अंत:करण जैसे मन, बुद्घि, चित व अहंकार कुल नौ तत्व ही प्रकृति विकार के मुख्य परिणाम हैं। हर महिला जिसे गृहस्थ जीवन को सुखी बनाना है, उसे इनका महत्व जानना चाहिए। अनेक स्थानों पर कहा गया है-
दैत्यनाशार्थवचनो दकार: परिकीर्तित:।
उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेदसम्मत:॥
रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचक:।
भयशत्रुघ्नवचनश्चाकार: परिकीर्तित:॥
अर्थात् द-दैत्यनाश, उ-विघ्ननाश, र-रोगनाश, ग-पापनाश, आ-भय और शत्रुनाश का तात्पर्य है। अत: ‘ओम दुं दुर्गायै नम:’ भी एक प्रभावशाली मन्त्र है। मां से शक्ति प्राप्त कर हमें जिनका नाश करना है वे राक्षस कौन हैं? दुर्ग यानी हमारे तन-मन में छुपे तौर पर रहने वाले शोक, रोग, भव बन्धन, भय, आशंका आदि मनोविकार, शरीर के सामान्य क्रियाकलापों को प्रभावित करने वाले विकार या कीटाणु, जाने अनजाने होने वाले पाप, सब तरह के गुप्त प्रकट शत्रु ही दैत्य हैं।
रोग, शोक, महामारी, भय सामने हो, अपने शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो, रोग होने की आशंका हो या रोग आ चुका हो, तो देवी की शरण में जाना चाहिए।
साधकों की भाषा में यही दुर्गा देवी के नौ रूप हैं। यही आद्यशक्ति तीन रूपों में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के रूप में प्रसिद्ध हैं और सत, रज, तम की अधिष्ठात्री यही तीनों हैं। ये तीनों एक नारी के रूप में शक्तियां है। इन्हीं तीनों स्वरूपों, महाशक्तियों की आराधना करने से हमें बल, बुद्धि व सौभाग्य की प्राप्ति होती है। समस्त देवता भी भगवती की आराधना करते हैं। वे आदिशक्ति महालक्ष्मी के रूप में विराजमान होकर हर जगह पूजे जाते हैं। मां रजोगुण रूप में संसार का निर्माण करती हैं, सात्विक रूप में पालन करती हैं और समय की आवश्यकतानुसार तामसी रूप में संहार करती हैं।
भगवती की आराधना एवं उपासना से विशेष रूप से महिलाओं के अस्तित्व में दुर्गा का संचार होता है। इन नौ दिनों में मां से वरदान स्वरूप सहनशीलता, अस्थिर मन को स्थिरता, विवेक, आत्मबल, आत्मशक्ति की प्राप्ति कर सकते हैं। शक्ति साधना के समय मन, कर्म, वचन से श्रद्धापूर्वक मां की आराधना करने से सुख की प्राप्ति होती है। साधना के समय कई ऐसी स्थितियां सहज ही पैदा होती है, जो मन को भटकाती हैं। मां के स्वरूपों के प्रति विश्वास व प्रेम जागृत रहने से वातावरण में भी असुरी शक्तियों का नाश व दिव्य शक्तियों का संचार होने लगता है। नवरात्र के नौ दिन पावन दिन हैं। स्त्रियों को अपने भीतर छिपी शक्तियों को पहचानने के लिए यह उपयुक्त मौका है। महिलाएं तो शक्ति का भंडार हैं। केवल जरूरत है उन्हें अपने भीतर की संचित शक्तियों को पहचानने और उन्हें सही तरीके से संचालित करने की।
दुर्गासप्तशती के हर अध्याय में मां के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। दुर्गासप्तशती को ध्यानपूर्वक पढ़ने से मां अंबे की महिमा का बखूबी ज्ञान हो जाता है। दुर्गासप्तशती के तेरह अध्याय मां के स्वरूपों के माध्यम से भक्तों की मुश्किलों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जीवन की किसी भी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में नवरात्र के नौ दिन बहुत ही पावन माने गए हैं।
नवरात्र में देवी माँ के व्रत रखे जाते हैं । स्थान–स्थान पर देवी माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती हैं । घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर दुर्गा सप्तशती पाठ आदि होते हैं भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक बार 9-9 दिन ही ये विशिष्ट पूजाएं की जाती हैं। इस काल को नवरात्र कहा जाता है। वर्ष में दो बार भगवती भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इनमें एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं और दूसरे श्राद्धपक्ष के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक।
इस व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कराएं। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए।
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शक्ति एक, रूप अनेक---
हमें मानना होगा देवी किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं, वह तो केवल नारी में विराजमान है। वह देवी ही हमारेे घर में मां, पत्नी और बेटी के रूप में मौजूद है। हम घर में इन स्वरूपों का आदर करें और उनसे सच्चरित्र तथा शक्ति का आशीर्वाद मांगें। आज से शरत्काल के पवित्र आश्विन मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में घर-घर में "दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोùस्तुते" की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगी है।

ये मंत्र वे हैं, जिन्हें शताब्दियों से हमारी संस्कृति में भगवती से वर प्राप्ति के लिए जपा जाता है। दुर्गा पूजा, शारदीय नवरात्र और महाशक्तिअनुष्ठान-तीन नाम पर त्योहार एक। नवरात्र अर्थात जौ में उग आए नन्हे-नन्हे अंकुरों तथा नौ दिनों तक घर-आंगन में आनंद प्रसाद बांटती कन्यारूपिणी शक्ति का पूजन-अर्चन-वंदन। नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं। दो बार प्रत्यक्ष और दो बार गु# रूप में, लेकिन इनमें प्रत्यक्ष रूप में आने वाले शारदीय नवरात्र सबसे ज्यादा प्रशस्त हैं। दुर्गास#शती में देवी स्वयं कहती हैं कि "शारदीय नवरात्र में जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति सहित मेरी पूजा करेगा, वह सभी बाधाओं से मुक्तहोकर धन, धान्य और संतान को प्राप्त करेगा।"
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कैसे करें देवी की पूजा...????
नवरात्र के दिनों में श्रद्घापूर्वक मां का दरबार सजाया जाता है। कई घरों में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है। घर परिवार की शुभता के लिए मंगल कलश स्थापित करके एक मिट्टी के बर्तन में जौ बोने का विधान है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा का पूजन, पाठ और हवन किया जाता है। सुबह और शाम उनकी आरती उतारी जाती है। मां को लाल चुनरिया, लाल फूल चढ़ाए जाते हैं। नवरात्र के दौरान सुबह और शाम भक्तिपूर्वक दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।
व्यस्तता के कारण आप प्रतिदिन एक अध्याय भी पढ़ सकती हैं। यदि व्रत संकल्प लेकर नौ दिनों का व्रत रखा है, तो भोजन में अन्न और नमक न लें। नवरात्र के दौरान सिर्फ फलाहार ही करें। कई लोग नवरात्र के दौरान सिर्फ पानी पीकर और दिन भर में एक जोड़ा लौंग खाकर ही रहते हैं।
नवरात्र का व्रत श्क्ति उपासना के सभी व्रतों में सर्वोच्च और श्रेष्ठ है। यह संपूर्ण मनोकामनाओं को पूरा करने वाला और मानसिक शांति देने वाला व्रत है। नवरात्र के आठवें दिन दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। कुछ लोग नवमी के दिन उद्यापन करते हैं। उद्यापन में सही विधि से पूजा करें। हवन आदि करके मां भगवती को सामर्थ्यनुसार लाल चुनरी, श्रृंगार का सामान, माला और फल आदि चढ़ाकर सौभाग्य का वरदान प्राप्त करें। पूरी, हलवा, चने का भोग लगाकर नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन करवाएं और उन्हें सामथ्र्यनुसार उपहार भी दें। दक्षिणा देना भी न भूलें।
श्रद्धानुसार एक बालक को भी भोजन कराएं और दक्षिणा-दान दें। अष्टमी व नवमी की संध्या को भक्तिपूर्वक भजन, पूजन, मां भगवती की आरती करना न भूलें।
देवी भागवत का कथन है कि दुख, दरिद्रता, कष्ट का निवारण, विजय, सामने खड़ी मुसीबत, रोग से रक्षा के लिए दुर्गा की विधि विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए।
ऐसे करें देवी मां की पूजा-अर्चना
प्राय: धार्मिक अनुष्ठानों में शुद्धता, दिशा और स्थान का खास ध्यान रखा जाता है। मां दुर्गा की पूजा करते समय उत्तर-पूर्व के स्थान का चुनाव करें।
हरियाली (जौ) बोने के लिए शुद्ध छनी हुई मिट्टी लें। माटी के साफ बर्तन में या धरती पर बोएं।
मां की प्रतिमा के दाहिनी ओर हरियाली और बांईओर कलश स्थापित करें।
अखण्ड ज्योति के लिए शुद्घ घी का प्रयोग करें।
मां को लाल चंदन, लाल फूल, लाल चुनरी एवं श्रृंगार की वस्तुएं भेंट करें।
सुबह-शाम मां का दुर्गासप्तशती पाठ, दुर्गा स्तोत्र, दुर्गा स्तुति एवं आरती करके आशीर्वाद प्राप्त करें।
व्रत विधान के अनुसार नौ दिन या कुछ लोग प्रथम व अन्तिम दिन फलाहारी व्रत रख सकते हैं।
अष्टमी के दिन नौ कुंवारी कंन्याओं (9 साल तक की उम्र की अति उत्तम मानी गई है) को मीठा भोजन कराके सामर्थ्यनुसार वस्त्र, वस्तुएं, दक्षिणा भेंट करें।
उद्यापन के बाद एक बालक और अपने गुरूजन को भी भोजन कराके वस्त्र, दक्षिणा देकर अपने सुखमय जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करें।
नौवें दिन मां सिद्घिदात्री की आरती करें। इनकी पूजा-अर्चना करने से पारिवारिक संपन्नता, उन्नति, पूर्णता और श्रेष्ठता की प्राप्ति होती है।
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नवरात्र क्या है....????
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र'
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संस्कृति का पर्व....??
नवरात्र जैसा सांस्कृतिक पर्व साधना और संयम के मनोभावों को प्रकट करने का पर्व-काल है। इन्हीं नौ दिनों में भगवान श्रीराम ने अत्याचारी रावण को मारने के लिए किष्किंधा में प्रवर्षण पर्वत पर "शक्ति पूजा" की थी। अधर्म के थपेड़े खा रहे पांडवों को महाभारत के धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने इन्हीं नौ दिनों में "देवी पूजा" करने का उपदेश दिया था। धर्मिक इतिहास की ओर नजर डालें तो नवरात्र का उल्लेख वैदिक काल से है। इसी कारण घर-घर में दुर्गा-पूजा उत्सव की तरह मनाई जाती है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर लय हो जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, पर देवी की असली प्रतिमा तो "घट" है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दाईं ओर नव-यवांकुर (जौ के अंकुर) और सामने हवनकुंड! नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र और गंध आदि से षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल तथा खीर। पूजन तथा हवन के बाद "दुर्गास#शती" का पाठ।
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नारी में नवदुर्गा-----
कूर्मपुराण में धरती की स्त्री का पूरा जीवन आकाश में रहने वाली नवदुर्गा की मूर्ति मे स्पष्ट रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री", कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" तथा विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल और पवित्र होने से "चंद्रघंटा" कहलाती है। नए जीव को जन्म देने हेतु गर्भधारण करने से "कूष्मांडा" और संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कंदमाता" के रूप में होती है। संयम और साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" और पतिव्रता होने के कारण अपनी और पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से "कालरात्रि" कहलाती है। कालीपुराण के अनुसार सारे संसार का उपकार करने से "महागौरी" तथा धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले पूरे परिवार और सारे संसार को सिद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद देती नारी "सिद्धिदात्री" के रूप में जानी जाती है।
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नौ दिन या रात...????
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीज़ों से भी सम्बंध है, जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-
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कुट्टू (शैलान्न)
दूध-दही
चौलाई (चंद्रघंटा)
पेठा (कूष्माण्डा)
श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
हरी तरकारी (कात्यायनी)
काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
साबूदाना (महागौरी)
आंवला(सिद्धीदात्री)
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क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।
अष्टमी या नवमी..????
यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। वैसे अष्टमी, नवमी और दशहरे के चार दिन बाद की चौदस, इन तीनों की महत्ता "दुर्गासप्तशती" में कही गई है।
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प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी। तृतीयं चंद्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचम स्कन्द मातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तितता:। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्माणैव महात्मना।। देवी मंत्र की आराधना के स्वर गूंजते रहते हें ।
'के हरि वाहन राजत, खड़ग खपर धारी। सुर नर मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी।। कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर समराजत ज्योती।।' श्री अम्बे जी की इस आरती से अनुष्ठान व्रत का विधि विधान से समापन व विसर्जन वैदिक व पारंपरिक ढंग से होता हें । 'या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै नमो नम:' देवी सूक्त क मंत्र सभी देवी मंदिरों में सुने जा सकते हें ।
कब और कैसे करे नवरात्री उद्यापन..????

----नवरात्र के अंतिम दिन नौ दिन का नवरात्र व्रत धारण करने वाले श्रद्धालुओं को मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजन-हवन कर उद्यापन करना चाहिए.। घरों में कलश की स्थापना कर विधान के साथ व्रत धर्म का पालन करने वालों को नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन ग्रहण करवाकर और द्रव्य, वस्त्र प्रदान करने के बाद पारण करना चाहिए ।
-----देवी मंदिरों में भी नवरात्र के दौरान चलते रहे श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ का समापन किया जाता हें । कई स्थानों पर भंडारे का आयोजन भी किया गया। ------इस दिन श्रद्धालुओं भी मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार के साथ हवन कर और नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन ग्रहण करवाते हें ।
-----नवरात्र व्रत धारण करने वालों के लिए यह विधान है कि नौ देवियों स्वरूप नौ कन्याओं को भोजन ग्रहण कराने और दान-दक्षिणा के बाद ही व्रत पूरा माना जाता है।
------नौ दिनों तक नवरात्र व्रत धारण करने वाले श्रद्धालुओं ने हवन-पूजन के बाद नौ कन्यायों को भोजन ग्रहण कराया और खुद पारण किया।
-------उद्यापन के बाद एक बालक और अपने गुरूजन को भी भोजन कराके वस्त्र, दक्षिणा देकर अपने सुखमय जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करें।
------व्रतधारियों को कुंवारी कन्याओं को भोजन करवाकर अपने व्रत का उद्यापन संपन्न करना चाहिए लोग कुंवारी कन्याओं को भोजन और वस्त्र अर्पित करके अपने व्रत का उद्यापन कर सकते हैं।
केसे करें कन्या पूजन..???
----अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन कन्या पूजन किया जा सकता है। अतः श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करना चाहिये।
----सर्वप्रथम माँ जगदम्बा के सभी नौ स्वरूपों का स्मरण करते हुए घर में प्रवेश करते ही कन्याओं के पाँव धोएं।
----इसके बाद उन्हें उचित आसन पर बैठाकर उनके हाथ में मौली बांधे और माथे पर बिंदी लगाएं।
----उनकी थाली में हलवा-पूरी और चने परोसे।
-----अब अपनी पूजा की थाली जिसमें दो पूरी और हलवा-चने रखे हुए हैं, के चारों ओर हलवा और चना भी रखें। बीच में आटे से बने एक दीपक को शुद्ध घी से जलाएं।
----कन्या पूजन के बाद सभी कन्याओं को अपनी थाली में से यही प्रसाद खाने को दें।
----अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।
-----जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।

जय माता दी

Monday, October 8, 2018

------ दाने दाने पर लिखा है ------ ------ खाने वाले का नाम ------

------ दाने दाने पर लिखा है ------
------ खाने वाले का नाम ------

एक बार श्री गुरू नानक देव जी अपने दोनों शिष्यों बाला और मरदाना के साथ किसी गांव में से गुजर रहे थे।

चलते-चलते रास्ते में एक मकई का खेत आया।
बाला स्वाभाविक रूप से बहुत कम बोलते थे,
मगर जो मरदाना थे वे बाल की खाल उधेढ़ कर रख देते थे,
अर्थात बात की गहराई तक जाते थे।

मकई का खेत देख कर मरदाने ने श्री गुरू नानक देव जी से सवाल किया- बाबा जी! इस मकई के खेत में जितने भी दाने हैं,
क्या वे सब पहले से निर्धारित कर दिये गए हैं कि कौन इसका हकदार है और ये किसके मुंह में जायेंगे?

इस पर श्री गुरू नानक देव जी कहा- बिल्कुल! इस संसार में कहीं भी और कोई भी खाने योग्य वनस्पति पर मोहर पहले से ही लग गई है।
और जिसके नाम की मोहर होगी वही जीव उसका ग्रास करेगा।

श्री गुरू नानक देव जी की इस बात ने मरदाने के मन के अन्दर कई सवाल खड़े कर दिए।
मरदाने ने मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकाल कर अपनी हथेली पर रख लिया।
और फिर श्री गुरू नानक देव जी से पूछने लगा- बाबा जी! कृपा करके आप मुझे बताएं,
कि इस दाने पर किसका नाम लिखा है?

इस पर श्री गुरू नानक देव जी ने मुस्करा कर कहा- इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा है।

मरदाने ने उनके सामने बड़ी ऐ चालाकी दिखाते हुए मकई का वो दाना अपने मुंह मे डाल लिया,
और फिर श्री गुरू नानक देव जी से कहने लगा- बाबा जी! कुदरत का ये नियम तो बड़ी ही आसानी से टूट गया।

पर परमात्मा की करनी देखिये।
मरदाने ने जैसे ही वो दाना निगला,
वो दाना सीधे जाकर मरदाने की श्वास नली में फंस गया।

अब मरदाने की हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो‌ गई।
मरदाने ने श्री गुरू नानक देव जी को कहा- बाबा जी! कुछ कीजिये।
नहीं तो मैं मर जाऊंगा।

श्री गुरू नानक देव जी ने कहा- बेटा! मैं क्या करूं?
अब तो कोई वैद्य या हकीम ही इसको निकाल सकता है।
चलो! पास के गांव में चलते हैं और वहां किसी हकीम को दिखाते हैं।

मरदाने को लेकर वे पास के एक गांव में चले गए।
वहां एक हकीम से मिले।
उस हकीम ने मरदाने की नाक में नसवार डाल दी।
नसवार बहुत तेज थी और नसवार सूंघते ही मरदाने को छींकें आनी शुरू हो गईं।
फिर छींकने से मकई का वो दाना गले से निकलकर बाहर गिर गया।
और जैसे ही दाना बाहर गिरा,
पास ही खड़ी एक मुर्गी ने झट से वो दाना खा लिया।

ये देखकर मरदाने ने श्री गुरू नानक देव जी से‌ क्षमा मांगी और कहा- बाबा जी! मुझे माफ कर दीजिए जो मैंने आपकी बात पर शक किया।

श्री गुरू नानक देव जी ने मुस्कुराते हुए मरदाने को गले से लगा लिया।

------ तात्पर्य ------
हमें हमेशा ही अपने गुरु/सत्गुरू पर पूरा विश्वास होना चाहिए,
और कभी भी उन पर रत्ती भर भी शक नहीं करना चाहिए।

गुरु/सत्गुरू, परमात्मा के भेजे हुए वो जीव हैं,
जो कि हम भटके हुए इंसानों को इस जनम-मरण के बंधनों से छुटकारा दिलाकर,
और सदा-सदा के लिए सीधे ही परमात्मा के पास भेजने का तरीका बताते हैं।

क्योंकी इस कलयुग में गुरु/सत्गुरू के अलावा तो‌ और कोई भी हमारा साथ दे ही नहीं सकता है।

Friday, October 5, 2018

" जय जय श्री राधे"

प्रेम से भरी ओढ़नी
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वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी।
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दूध बेच कर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी।
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ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती,
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वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी, सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।
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लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती।
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फिर लौटकर अपने प्रभु की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती।
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कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं।
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एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवन क्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।
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दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने दूध वापस कर दिया,
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पंजीरी को खूब डाँटा फटकारा और मंदिर में उस का प्रवेश निषेध कर दिया।
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पंजीरी पर तो आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची-ठाकुर; मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करो, पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है,
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ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो ? और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष ? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास तक पहुँची।
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लेकिन प्रभु, तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की, प्रेम से दूध पीते रहे, फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला।
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और मुझे ज़्यादा दुख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले।
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ठाकुर, यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी,
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यहीं प्राण त्याग दूंगी। भूखी प्यासी, रोते रोते शाम हो गई।
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तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया- माई ओ माई, उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक सुदर्शन किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है।
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कौन हो बेटा...???
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मैया, बृजवासी ही हूँ, मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा।
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पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है।
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ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया है।
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बड़ी दूर से आए हो क्या ? क्या खाओगे ? अभी जल्दी से बना दूँगी।
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अरे मैया, इस समय क्या रसोई बनाओगी, थोड़ा सा दूध दे दो वही पी कर सो जाउँगा।
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दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं, फिर अपने आप को सँभालते हुए बोली-
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बेटा, दूध तो है पर सवेरे का है, जरा ठहरो अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ।
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अरे नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूँ, दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है,
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अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना।
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डबडबायी आँखों से बोली... थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है।
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अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या ? जल्दी से दूध छान कर दे दो वरना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा।
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पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है, दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया।
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दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा।
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मैया, कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी,
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अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है, अब मैं सो रहा हूँ, इतना कहकर वो वहीं सो गया।
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पंजीरी को फ़ुरसत हो गई तो दिन भर की थकान, दुख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।
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जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती। जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी।
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दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया।
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ठाकुर जी बोले, मैया, मुझे भूखा मारेगी क्या ? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी।
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खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है।
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मैंने तो आज तेरे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख,
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मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ, मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।
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गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो।
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पंजीरी हड़बड़ाकर उठी, देखा  कि बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।
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सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया।
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झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।
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थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजीरी ने देखा कि ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।
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इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया की प्रभु एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं।
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उसने सोचा कि प्रभु ने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था।
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लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोली,
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गुसाईं जी, देखो तो लाला को, पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।
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कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया।
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गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए।
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भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला, माई, मुझे क्षमा कर दो।
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पंजीरी बोली.. गुसाई जी, देखी तुमने लाला की चतुराई, अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।
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भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।”
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ठाकुर धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ..!!
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" जय जय श्री राधे"

क्या आप जानते हैं कि.... हमारे हिन्दू सनातन धर्म में ...... बच्चों के मुंडन की परंपरा क्यों बनाई गई है .....???????

क्या आप जानते हैं कि.... हमारे हिन्दू सनातन धर्म में ...... बच्चों के मुंडन की परंपरा क्यों बनाई गई है .....???????

और सिर्फ .... बच्चे ही क्यों.... जन्म से लेकर मृत्यु तक के हमारे सोलह संस्कारों में भी....... मुंडन को हमारे हिन्दू धर्म में अनिवार्य माना गया है...!

यहाँ तक कि..... हम हिन्दू सनातन धर्मियों में..... बच्चों का मुंडन जितना अनिवार्य है ..... उतना ही अनिवार्य ..... किसी नजदीकी रिश्तेदार की मृत्यु के समय भी है ...!

और, इस तरह से...... मुंडन करवाना हम हिन्दुओं की एक पहचान है...!!

लेकिन, हम से अधिकतर हिन्दू ......... बिना कुछ जाने समझे .... इसे सिर्फ इसीलिए करते हैं क्योंकि.... हम बचपन से ही ऐसा देखते आये हैं....

और, चूँकि हमारे बाप-दादा भी ऐसा किया करते थे..... इसीलिए, हमलोग भी बस इसे एक ""आध्यात्मिक परंपरा"" के तौर पर इसे निभा देते हैं...!

लेकिन... यह जानकर हर किसी को बेहद हैरानी होगी कि.... मुंडन का आध्यात्म से कुछ लेना-देना नहीं है.....

बल्कि... यह एक शुद्ध विज्ञान है.... और, मुंडन संस्कार सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा है।

दरअसल.... जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तो....... वो माँ के प्लीजेंटल फ्लूइड तैरता रहता है ....
तथा, बच्चे के जन्म लेने के बाद ... उसके शरीर में प्लीजेंटल फ्लूइड में मौजूद रसायन ... एवं , कीटाणु, बैक्टीरिया और जीवाणु लगे होते हैं......
जो, साधारण तरह से धोने पर शरीर से तो निकल जाते हैं..... परन्तु, बाल होने के कारण .... सर से नहीं निकल पाते हैं....!

इसीलिए, उसे पूरी तरह से साफ़ करने के लिए..... उस बाल को निकलना जरुरी होता है....

अतः... एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है....... ताकि, बच्चे को भविष्य में इन्फेक्शन का कोई खतरा ना रहे....

यही कारण है कि...... जन्म के एक से पांच साल के भीतर बच्चे का मुंडन कराया जाता है...!

और, लगभग .....कुछ ऐसा ही कारण मृत्यु के समय मुंडन का भी होता है....!

जब पार्थिव देह को जलाया जाता है..... तो , उसमें से भी कुछ ऐसे ही जीवाणु हमारे शरीर पर चिपक जाते हैं........!

इसीलिए, पार्थिव देह जलाने के बाद ......नदी में स्नान और धूप में बैठने की भी परंपरा है....
क्योंकि.... आज हम सभी इस बात से अवगत हैं कि..... सूर्य की रोशनी में ..... बहुत सारे बैक्टीरिया और वाइरस जीवित नहीं रह पाते हैं...!

तदोपरांत.... सिर में चिपके इन जीवाणुओं को पूरी तरह निकालने के लिए ही ........ मुंडन कराया जाता है...... ( यहाँ तक कि दाढ़ी और मूंछें तक निकाल दी जाती है )

यहाँ कुछ मनहूस सेक्यूलर .... आदतन ये बोल सकते हैं कि.....

अगर मुंडन का यही कारण है तो..... मुंडन तुरंत क्यों नहीं करवा दिया जाता है....?????

तो उन कूढ़मगजों के लिए.... इतना ही समझा देना पर्याप्त है कि.....

नवजात शिशु के स्किन ..... काफी कोमल होते हैं.....
और, तुरंत ही उस पर ब्लेड चलाने से .... इन्फेक्शन का खतरा घटने के बजाए और, बढ़ ही जाएगा.... इसीलिए, लगभग ६ महीने साल भर तक इंतजार किया जाता है ताकि..... वो नवजात शिशु बाहरी आवो-हवा का आदि हो जाए....!

उसी तरह.... किसी की मृत्यु के बाद भी तुरत मुंडन नहीं करवा कर..... कुछ दिन बाद मुंडन इसीलिए करवा जाता है ....
ताकि, उस दौरान घर की पूरी तरह साफ़-सफाई की जा सके.... अन्यथा, मुंडन के बाद भी साफ़-सफाई करने से स्थिति वही रह जाएगी....!

अंत में इतना ही कहूँगा कि..... हम हिन्दुओं को गर्व करना चाहिए कि.... जो बातें हम आज के आधुनिकतम तकनीक के बाद भी ठीक से समझ नहीं पाते हैं....

उस जीवाणु -विषाणु , और बैक्टीरिया -वाइरस एवं उससे होने वाले दुष्प्रभावों को..... हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि हजारों-लाखों लाख पहले ही जान गए थे....!

परन्तु.... चूँकि.... हर किसी को बारी-बारी ....विज्ञान की इतनी गूढ़ बातें ..... समझानी संभव नहीं थी....

इसलिए, हमारे पूर्वजों ने इसे एक परंपरा का रूप दे दिया...... ताकि, उनके आने वाले वंशज .... सदियों तक उनके इन अमूल्य खोज का लाभ उठाते रहें....

जैसे कि... हमलोग अभी उठा रहे हैं....!

जय महाकाल...!!!