श्रीकृष्ण का जीवन परिचय और संक्षिप्त इतिहास
●अथ श्री कृष्ण कथा●
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प्राचीन भारत के इतिहास में अगर प्रथम वैदिक इंद्र के बाद कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके शौर्य, बाहुबल, सूझबूझ तथा राजनैतिक-सैन्य अभियानों की सफलता तत्कालीन विश्व में अभूतपूर्व थी तो वो व्यक्ति एक ही इन्सान है
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"वासुदेव कृष्ण"
**************
लगभग 3500 वर्ष पहले...
मनु पुत्रों (मानवों) पर दशकों तक नियंत्रण के पश्चात अदिति पुत्रों (आदित्यों) का प्रभुत्व धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है।
मानव अब खुद शक्तिशाली थे। मानव राजाओं के पास कई-कई लाख की सेनाएं थी। वे अब पूर्व की भांति यज्ञकर्म में रुचि दिखाते हुए आदित्यों का सम्मान करना बंद कर रहे थे। वर्ण व्यवस्था का लोप हो रहा था। इस कथित "अधर्म" के कारण देव जाति व्यथित थी। शक्ति-संतुलन और आदित्यों का वर्चस्व पुनर्स्थापित करने के लिए एक भीषण युद्ध समय की पुकार थी।
पर देवजाति स्वयं पतन की ओर उन्मुख थी। तत्कालीन इंद्र अपने पूर्वज इन्द्रों की शौर्य परंपरा के वहन में असफल साबित हो रहे थे। देवताओं के रक्षक विष्णु के वंशज अपना अलग नगर "वैकुंठ" बसाकर देवताओं का रक्षण बन्द कर चुके थे।
रुद्रों का वंश भी इस समय पूरी तरह देवताओं के विरोधी और सौतेले भाइयों "दैत्यों और दानवों" का पक्षधर हो चुका था। देवताओं को इस समय तलाश थी किसी साधन की जिसके कंधे पर बंदूक रखकर युद्ध के द्वारा शक्तिसंतुलन के अपने मंसूबों को परवान चढ़ाया जा सके और देवताओं की तलाश जल्द ही पूरी हुई।
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भादप्रद माह के कृष्ण पक्ष में यदुकुल वंशी "वसुदेव" के यहाँ "कृष्ण" का जन्म हुआ।
कृष्ण से पूर्व की संतानों को उनका मामा कंस किसी ज्योतिषी की सनक के कारण मरवा चुका था। वसुदेव अपने मित्र नन्द और महल के अपने वफादार नौकरों की सहायता से कृष्ण तथा दूसरी पत्नी से उत्पन्न कृष्ण के सौतेले भाई बलराम को गोकुल भिजवाने में कामयाब रहे थे, जहाँ कृष्ण बलराम के साथ बड़े होने लगे
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कृष्ण नामक उस बालक में कुछ तो खास था जो उन्हें अपने हमउम्र बालकों से अलग बनाता था। कृष्ण बचपन मे लात मारकर बैलगाड़ी पलट देते थे तो कभी हंसी-हंसी में अदम्य बाहुबल का प्रदर्शन कर पेड़ उखाड़ लेते थे। किसी प्राकृतिक घटना के कारण आयी बाढ़ में जब समस्त ब्रज जीवन की आस छोड़ चुका था तो कृष्ण चमत्कारिक पुरुषार्थ करके गोवर्धन पर्वत में गुफाएं बनाकर (अथवा पहले से मौजूद गुफाओं को खोजकर) और ब्रजवासियों को शरण देकर उनकी जीवन रक्षा करते हैं। एक हाथ मारकर मस्तक खील-खील कर देने की मार्शल आर्ट जैसी विद्या का प्रयोग भी सर्वप्रथम कृष्ण द्वारा ही मिलता है।
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कृष्ण की इन लीलाओं पर इंद्र अपनी नजर बनाए हुए थे। इंद्र समझ गए थे कि यही वो व्यक्ति है जो युद्ध द्वारा शक्तिसंतुलन से आदित्यों का वर्चस्व दोबारा स्थापित करने के उनके मंसूबों में सहायक हो सकता है और कृष्ण का गायों के प्रति विशेष अनुराग देखते हुए, कृष्ण को इंद्र "गौ अधिपति" घोषित करके दोस्ती की शुरुआत भी कर देते हैं तथा महाभारत के युद्ध मे भी यथासम्भव कृष्ण पक्ष की भरपूर सहायता करते हैं।
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कंस के बुलावे पर मथुरा गए कृष्ण कुछ ही क्षणों में विश्वप्रसिद्ध पहलवानों "चाणूर और मुष्टिक" का वध करके जनता का दिल जीत लेते हैं और अपने माता-पिता को बंदी बना कर रखने वाले कंस के बाल पकड़ कर घसीट-घसीट कर कंस के प्राण हर लेते हैं। कृष्ण की सफलता और नायकत्व की यात्रा का यह प्रथम सफल अध्याय था।
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अंतिम वर्षों को छोड़कर कृष्ण कभी भी द्वारिका में 6 माह से अधिक नही रहे। इस दौरान कृष्ण ने अनेक सैन्य अभियानों का संचालन किया पर कभी स्वयं राज्य की लालसा नही की। जरासंध का वध करने के बाद उनके पुत्र सहदेव को गद्दी पर बैठाया तो महाभारत के पश्चात युधिष्ठिर को आर्यावर्त का राज्य सौंप दिया।
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इंद्र के अनुरोध पर अगवा की गई देव-ऋषि कन्याओं को छुड़ाने के लिए कृष्ण नरकासुर को युद्ध मे परास्त करते हैं तो नरकासुर के हरम से छुड़ाई गई 16000 से अधिक महिलाओं और बच्चोँ को समाज द्वारा तिरस्कृत देखने पर खुद को उन महिलाओं का पति घोषित कर उन नाजायज बच्चों को पिता का नाम प्रदान करते हैं।
कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की प्रेयसी उषा के पिता बाणासुर द्वारा अनिरुद्ध को बंदी बना लेने के कारण कृष्ण अकेले ही रुद्रों द्वारा संरक्षित बाणासुर के खिलाफ युद्ध करते हैं और महादेव तक को परास्त कर देते हैं।
ये कृष्ण का अपनों के प्रति विशेष अनुराग ही था कि नरकासुर को परास्त करने के बाद वे देवलोक जाकर पूर्व में देवताओं के संरक्षक रहे इंद्र के छोटे भाई विष्णु के रिक्त पद पर बैठकर "अगला विष्णु" होने का यश प्राप्त करते हैं तो सम्मान प्राप्त करने के कुछ देर बाद देवलोक में टहलते हुए अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा द्वारा देवलोक के उपवन के सबसे खूबसूरत वृक्ष को अपने राज्य में ले जाने की इच्छा प्रकट करने पर समस्त देवलोक से लड़ने के लिए उद्यत हो जाते हैं और कुछ समय पहले सम्मान देने वाले इंद्र को परास्त करके अपनी पत्नी की अनैतिक इच्छा पूरी करते हैं।
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कृष्ण के जीवन का सबसे रोचक पहलूँ यही है कि कृष्ण लकीर के फकीर नही थे। कभी अपनी सुविधा के लिए तो कभी समाज की भलाई के लिए वे धर्म और आचरण के नये मानक स्थापित करते रहते थे।
कहाँ तो वे एक तरफ युद्ध के मैदान में अर्जुन को धर्म का उपदेश देकर गीता का विराट ज्ञान विश्व के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो वहीं युद्ध मे अपने पक्ष की बेहतरी के लिए स्वयं सबसे बड़े अधर्मी बन जाते हैं।
जहां जरासंध के कोप के भय से एक समय मे भारत की राजनीति में अलग-थलग कर दिए गए यदुकुल को वे तत्कालीन समय की सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिशाली सभ्यता के रूप में स्थापित करते हैं तो अपने समय का यह सर्वश्रेष्ठ नायक समय की पुकार के अनुसार कालयवन को पीठ दिखाकर रणछोड़ की उपाधि भी अर्जित कर लेता है।
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अफसोस विजेताओं का इतिहास जितना स्वर्णिम होता है, अंत उतना ही दुखद !!
अंतिम समय में यादवों की शराब पीने और झगड़ा करने की आदतों के कारण यदुकुल में कलह बढ़ती गई और एक दिन जब नदी किनारे शराब पीकर उन्मुक्त यादवों ने कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न को ही मार डाला तो कृष्ण के सब्र का बांध टूट पड़ा और उन्होंने काल का रूप धारण कर समस्त यादव यौद्धाओं का संहार स्वयं ही कर डाला।
और दुःखी मन से एक पेड़ के नीचे बैठने के दौरान एक बहेलिए के भूलवश चलाये तीर का शिकार होकर अंतिम गति को प्राप्त हुए।
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कृष्ण के वंशज अपनी जिम्मेदारी नही निभा पाए। देव जाति का पतन हो गया। नेतृत्वविहीन समाज पंडावाद और मिथ्या कर्मकांडो में फंस कर अधोगति को प्राप्त होता रहा पर समाज को नयी दिशा देने वाले नायक कृष्ण लौट कर नही आये।
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युग बीते... बुद्ध आये ! महावीर आये !
फिर विदेशी आक्रांताओं द्वारा रक्तपात-नरसंहार-लूटखसोट का एक दौर शुरू हुआ।
पर "जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं जन्म लेता हूँ" का उद्घोष करने वाले कृष्ण.. नही आये !!!
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औरतों की अस्मिता को तार-तार किया गया।
इस चट्टान के टुकड़े की कुछ गज जमीन पर अपने साम्राज्य और मजहब का परचम बुलंद करने के लिए नवजात शिशुओं को तलवार की नोक पर उछाला गया।
और इंसानी मूर्खता की भेंट चढ़े जलते नगरों की ज्वालाओं को निहारता असहाय मन "कृष्ण आएंगे" का सुमिरन कर अपने दुःखों के हरण के लिए सैकड़ों वर्षों तक किसी ईश्वरीय फरिश्ते का इंतजार करता रहा।
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कृष्ण ना तब आये थे
और ना अब आएंगे।
कृष्ण तो जा चुके !!!
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कृष्ण स्वयं कहते थे कि,
जब अपने सामर्थ्य को पहचान मनुष्य संकल्प कर उठ खड़ा होता है
तब... समस्त प्रकृति मनुष्य के प्रयोजन सिद्धि में सहयोग करने लगती है।
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अवतार, पैग़म्बर, फरिश्तों की जरूरत तो मुर्दा कौमों को होती है।
एक जिंदा कौम में तो कृष्ण घर-घर में जन्म लेते हैं।
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अर्थात...
हे पार्थ !!
जब जब धर्म की हानि होगी
तब तब कृष्ण का जन्म नही होगा
.
स्वर्ग जाने की इच्छा जिसकी है।
मरना भी तो उसी का अनिवार्य है।
****************************
कृष्ण जन्म उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं !!
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1: पोस्ट शेयर करने के लिए इजाजत की जरूरत नही है।
2: यह मेरी तीन साल पुरानी पोस्ट का संशोधित संस्करण है।
3: पोस्टों में दिए गए समस्त तथ्यों का स्त्रोत हरिवंश है। तथ्यों को मानवीय विवेक अनुसार प्रस्तुत किया गया है।
#झकझकिया
Friday, September 14, 2018
श्रीकृष्ण का जीवन परिचय और संक्षिप्त इतिहास ●अथ श्री कृष्ण कथा● .
Sunday, September 2, 2018
जब जब धर्म की हानि होगी तब तब कृष्ण का जन्म नही होगा .
श्रीकृष्ण का जीवन परिचय और संक्षिप्त इतिहास
●अथ श्री कृष्ण कथा●
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प्राचीन भारत के इतिहास में अगर प्रथम वैदिक इंद्र के बाद कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके शौर्य, बाहुबल, सूझबूझ तथा राजनैतिक-सैन्य अभियानों की सफलता तत्कालीन विश्व में अभूतपूर्व थी तो वो व्यक्ति एक ही इन्सान है
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"वासुदेव कृष्ण"
**************
लगभग 3500 वर्ष पहले...
मनु पुत्रों (मानवों) पर दशकों तक नियंत्रण के पश्चात अदिति पुत्रों (आदित्यों) का प्रभुत्व धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है।
मानव अब खुद शक्तिशाली थे। मानव राजाओं के पास कई-कई लाख की सेनाएं थी। वे अब पूर्व की भांति यज्ञकर्म में रुचि दिखाते हुए आदित्यों का सम्मान करना बंद कर रहे थे। वर्ण व्यवस्था का लोप हो रहा था। इस कथित "अधर्म" के कारण देव जाति व्यथित थी। शक्ति-संतुलन और आदित्यों का वर्चस्व पुनर्स्थापित करने के लिए एक भीषण युद्ध समय की पुकार थी।
पर देवजाति स्वयं पतन की ओर उन्मुख थी। तत्कालीन इंद्र अपने पूर्वज इन्द्रों की शौर्य परंपरा के वहन में असफल साबित हो रहे थे। देवताओं के रक्षक विष्णु के वंशज अपना अलग नगर "वैकुंठ" बसाकर देवताओं का रक्षण बन्द कर चुके थे।
रुद्रों का वंश भी इस समय पूरी तरह देवताओं के विरोधी और सौतेले भाइयों "दैत्यों और दानवों" का पक्षधर हो चुका था। देवताओं को इस समय तलाश थी किसी साधन की जिसके कंधे पर बंदूक रखकर युद्ध के द्वारा शक्तिसंतुलन के अपने मंसूबों को परवान चढ़ाया जा सके और देवताओं की तलाश जल्द ही पूरी हुई।
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भादप्रद माह के कृष्ण पक्ष में यदुकुल वंशी "वसुदेव" के यहाँ "कृष्ण" का जन्म हुआ।
कृष्ण से पूर्व की संतानों को उनका मामा कंस किसी ज्योतिषी की सनक के कारण मरवा चुका था। वसुदेव अपने मित्र नन्द और महल के अपने वफादार नौकरों की सहायता से कृष्ण तथा दूसरी पत्नी से उत्पन्न कृष्ण के सौतेले भाई बलराम को गोकुल भिजवाने में कामयाब रहे थे, जहाँ कृष्ण बलराम के साथ बड़े होने लगे
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कृष्ण नामक उस बालक में कुछ तो खास था जो उन्हें अपने हमउम्र बालकों से अलग बनाता था। कृष्ण बचपन मे लात मारकर बैलगाड़ी पलट देते थे तो कभी हंसी-हंसी में अदम्य बाहुबल का प्रदर्शन कर पेड़ उखाड़ लेते थे। किसी प्राकृतिक घटना के कारण आयी बाढ़ में जब समस्त ब्रज जीवन की आस छोड़ चुका था तो कृष्ण चमत्कारिक पुरुषार्थ करके गोवर्धन पर्वत में गुफाएं बनाकर (अथवा पहले से मौजूद गुफाओं को खोजकर) और ब्रजवासियों को शरण देकर उनकी जीवन रक्षा करते हैं। एक हाथ मारकर मस्तक खील-खील कर देने की मार्शल आर्ट जैसी विद्या का प्रयोग भी सर्वप्रथम कृष्ण द्वारा ही मिलता है।
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कृष्ण की इन लीलाओं पर इंद्र अपनी नजर बनाए हुए थे। इंद्र समझ गए थे कि यही वो व्यक्ति है जो युद्ध द्वारा शक्तिसंतुलन से आदित्यों का वर्चस्व दोबारा स्थापित करने के उनके मंसूबों में सहायक हो सकता है और कृष्ण का गायों के प्रति विशेष अनुराग देखते हुए, कृष्ण को इंद्र "गौ अधिपति" घोषित करके दोस्ती की शुरुआत भी कर देते हैं तथा महाभारत के युद्ध मे भी यथासम्भव कृष्ण पक्ष की भरपूर सहायता करते हैं।
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कंस के बुलावे पर मथुरा गए कृष्ण कुछ ही क्षणों में विश्वप्रसिद्ध पहलवानों "चाणूर और मुष्टिक" का वध करके जनता का दिल जीत लेते हैं और अपने माता-पिता को बंदी बना कर रखने वाले कंस के बाल पकड़ कर घसीट-घसीट कर कंस के प्राण हर लेते हैं। कृष्ण की सफलता और नायकत्व की यात्रा का यह प्रथम सफल अध्याय था।
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अंतिम वर्षों को छोड़कर कृष्ण कभी भी द्वारिका में 6 माह से अधिक नही रहे। इस दौरान कृष्ण ने अनेक सैन्य अभियानों का संचालन किया पर कभी स्वयं राज्य की लालसा नही की। जरासंध का वध करने के बाद उनके पुत्र सहदेव को गद्दी पर बैठाया तो महाभारत के पश्चात युधिष्ठिर को आर्यावर्त का राज्य सौंप दिया।
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इंद्र के अनुरोध पर अगवा की गई देव-ऋषि कन्याओं को छुड़ाने के लिए कृष्ण नरकासुर को युद्ध मे परास्त करते हैं तो नरकासुर के हरम से छुड़ाई गई 16000 से अधिक महिलाओं और बच्चोँ को समाज द्वारा तिरस्कृत देखने पर खुद को उन महिलाओं का पति घोषित कर उन नाजायज बच्चों को पिता का नाम प्रदान करते हैं।
कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की प्रेयसी उषा के पिता बाणासुर द्वारा अनिरुद्ध को बंदी बना लेने के कारण कृष्ण अकेले ही रुद्रों द्वारा संरक्षित बाणासुर के खिलाफ युद्ध करते हैं और महादेव तक को परास्त कर देते हैं।
ये कृष्ण का अपनों के प्रति विशेष अनुराग ही था कि नरकासुर को परास्त करने के बाद वे देवलोक जाकर पूर्व में देवताओं के संरक्षक रहे इंद्र के छोटे भाई विष्णु के रिक्त पद पर बैठकर "अगला विष्णु" होने का यश प्राप्त करते हैं तो सम्मान प्राप्त करने के कुछ देर बाद देवलोक में टहलते हुए अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा द्वारा देवलोक के उपवन के सबसे खूबसूरत वृक्ष को अपने राज्य में ले जाने की इच्छा प्रकट करने पर समस्त देवलोक से लड़ने के लिए उद्यत हो जाते हैं और कुछ समय पहले सम्मान देने वाले इंद्र को परास्त करके अपनी पत्नी की अनैतिक इच्छा पूरी करते हैं।
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कृष्ण के जीवन का सबसे रोचक पहलूँ यही है कि कृष्ण लकीर के फकीर नही थे। कभी अपनी सुविधा के लिए तो कभी समाज की भलाई के लिए वे धर्म और आचरण के नये मानक स्थापित करते रहते थे।
कहाँ तो वे एक तरफ युद्ध के मैदान में अर्जुन को धर्म का उपदेश देकर गीता का विराट ज्ञान विश्व के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो वहीं युद्ध मे अपने पक्ष की बेहतरी के लिए स्वयं सबसे बड़े अधर्मी बन जाते हैं।
जहां जरासंध के कोप के भय से एक समय मे भारत की राजनीति में अलग-थलग कर दिए गए यदुकुल को वे तत्कालीन समय की सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिशाली सभ्यता के रूप में स्थापित करते हैं तो अपने समय का यह सर्वश्रेष्ठ नायक समय की पुकार के अनुसार कालयवन को पीठ दिखाकर रणछोड़ की उपाधि भी अर्जित कर लेता है।
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अफसोस विजेताओं का इतिहास जितना स्वर्णिम होता है, अंत उतना ही दुखद !!
अंतिम समय में यादवों की शराब पीने और झगड़ा करने की आदतों के कारण यदुकुल में कलह बढ़ती गई और एक दिन जब नदी किनारे शराब पीकर उन्मुक्त यादवों ने कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न को ही मार डाला तो कृष्ण के सब्र का बांध टूट पड़ा और उन्होंने काल का रूप धारण कर समस्त यादव यौद्धाओं का संहार स्वयं ही कर डाला।
और दुःखी मन से एक पेड़ के नीचे बैठने के दौरान एक बहेलिए के भूलवश चलाये तीर का शिकार होकर अंतिम गति को प्राप्त हुए।
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कृष्ण के वंशज अपनी जिम्मेदारी नही निभा पाए। देव जाति का पतन हो गया। नेतृत्वविहीन समाज पंडावाद और मिथ्या कर्मकांडो में फंस कर अधोगति को प्राप्त होता रहा पर समाज को नयी दिशा देने वाले नायक कृष्ण लौट कर नही आये।
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युग बीते... बुद्ध आये ! महावीर आये !
फिर विदेशी आक्रांताओं द्वारा रक्तपात-नरसंहार-लूटखसोट का एक दौर शुरू हुआ।
पर "जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं जन्म लेता हूँ" का उद्घोष करने वाले कृष्ण.. नही आये !!!
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औरतों की अस्मिता को तार-तार किया गया।
इस चट्टान के टुकड़े की कुछ गज जमीन पर अपने साम्राज्य और मजहब का परचम बुलंद करने के लिए नवजात शिशुओं को तलवार की नोक पर उछाला गया।
और इंसानी मूर्खता की भेंट चढ़े जलते नगरों की ज्वालाओं को निहारता असहाय मन "कृष्ण आएंगे" का सुमिरन कर अपने दुःखों के हरण के लिए सैकड़ों वर्षों तक किसी ईश्वरीय फरिश्ते का इंतजार करता रहा।
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कृष्ण ना तब आये थे
और ना अब आएंगे।
कृष्ण तो जा चुके !!!
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कृष्ण स्वयं कहते थे कि,
जब अपने सामर्थ्य को पहचान मनुष्य संकल्प कर उठ खड़ा होता है
तब... समस्त प्रकृति मनुष्य के प्रयोजन सिद्धि में सहयोग करने लगती है।
.
अवतार, पैग़म्बर, फरिश्तों की जरूरत तो मुर्दा कौमों को होती है।
एक जिंदा कौम में तो कृष्ण घर-घर में जन्म लेते हैं।
.
अर्थात...
हे पार्थ !!
जब जब धर्म की हानि होगी
तब तब कृष्ण का जन्म नही होगा
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स्वर्ग जाने की इच्छा जिसकी है।
मरना भी तो उसी का अनिवार्य है।
****************************
कृष्ण जन्म उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं !!
.
1: पोस्ट शेयर करने के लिए इजाजत की जरूरत नही है।
2: यह मेरी तीन साल पुरानी पोस्ट का संशोधित संस्करण है।
3: पोस्टों में दिए गए समस्त तथ्यों का स्त्रोत हरिवंश है। तथ्यों को मानवीय विवेक अनुसार प्रस्तुत किया गया है।
#झकझकिया
Sunday, July 29, 2018
आज आपको एक ऐसे कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ,, जिसका विवरण संसार के किसी भी पुस्तक में आपको नही मिलेगा,, और ये कथा सत प्रतिशत सत्य कथा है,, जय श्री राम, जय श्री राम,, कथा का आरंभ तब का है ,, जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,, की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,, उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,, और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,, सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,, और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,, बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,, उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,, जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,, रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,, अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,, और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,, अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,, हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,, अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,, एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,, और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो,, है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,, जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,, इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,, संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,, बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,, और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,, ( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,, हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो, फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,, अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,, इससे तुम्हे क्या मिलेगा,, तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,, क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,, उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,, इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,, और राम नाम का जाप कर,, इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,, और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,, इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,, जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,, और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,, जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,, और जिस राम की तू बात कर रहा है, वो है कौन, और केवल तू ही जानता है राम के बारे में, मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना, और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,, हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,, उनकी महिमा अपरंपार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,, बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,, मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,, बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,, हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,, तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,, पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,, बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,, हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,, बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,, अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,, तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,, हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,, ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,, मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,, और युद्ध के लिए न जाओ, हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,, बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,, परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,, और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,, जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,, अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,, तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,, पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,, केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,, बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,, युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,, हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,, उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,, और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,, पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,, हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,, बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,, ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,, उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,, बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,, बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे, उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया, बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,, उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,, बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,, तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ, बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,, वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,, सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,, कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है, हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,, फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ, मुझे कुछ समझ नही आया,, ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,, बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,, ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,, पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,, ब्रम्हा जो बोले- हे बाली, मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,, पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,, सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,, इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,, और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,, ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,, क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,, ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,, मुझे क्षमा करें,, और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया,, तो बोलो, पवनपुत्र हनुमान की जय, जय श्री राम जय श्री राम,, 🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹 कृपया ये कथा जन जन तक पहुचाएं, और पुण्य के भागी बने,, जय श्री राम जय हनुमान,
एक दिन चित्रगुप्त ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की – “प्रभु, ये ‘करवा चौथ के व्रत से सात जनम तक एक ही पति’ मिलने वाली योजना बंद कर दीजाए !” ब्रह्माजी – “क्यों ?” चित्रगुप्त – “प्रभु, मैनेज करना कठिन होता जा रहा है … औरत सातों जनम वही पति मांगती हैं लेकिन पुरुष हर बार दूसरी औरत मांगता है … बहुत दिक्कत हो रही है समझाने में !” ब्रह्माजी – “लेकिन यह स्कीम आदिकाल से चली आ रही है इसे बंद नहीं किया जा सकता !” तभी नारद मुनि आ गए. उन्होंने सुझाव दिया कि पृथ्वी पर narendra modi नाम के एक महान विचारक रहते हैं. उनसे जाकर सलाह ली जाये. चित्रगुप्त modi ke पास गए. modi ने एक पल में समस्या का समाधान कर दिया – “जो भी औरत सातों जनम वही पति डिमांड करे … उसे दे दो. लेकिन शर्त ये लगा दो कि यदि पति वही चाहिए तो “सास” भी वही मिलेगी !!!” " डिमांड बंद .." पत्नियाँshocked मोदी rocked 😂 भेजो फटाफट एकदम नया है।......😀😀😀😀😀
*भारत की संस्कृति को पहचाने !* *ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाये.!* *खासकर अपने बच्चो को बताए क्यों कि ये बात उन्हें कोई नहीं बताएगा...* *⌛दो पक्ष⌛* १-कृष्ण पक्ष , २-शुक्ल पक्ष❗ *🙏तीन ऋण🙏* १-देवऋण , २-पितृऋण, ३-ऋषिऋण❗ *🏉चार युग🏉* १-सतयुग , २-त्रेतायुग , ३-द्वापरयुग , ४-कलियुग❗ *🌷चार धाम🌷* १-द्वारिका , २-बद्रीनाथ , ३-जगन्नाथपुरी , ४-रामेश्वरमधाम❗ *🕹चार पीठ🕹* १-शारदा पीठ *(द्वारिका)* २-ज्योतिष पीठ *(जोशीमठ बद्रिधाम*) ३-गोवर्धन पीठ *(जगन्नाथपुरी),* ४-शृंगेरीपीठ❗ *⌛चार वेद⌛* १-ऋग्वेद , २-अथर्ववेद ,३-यजुर्वेद , ४-सामवेद! *🍁चार आश्रम🍁* १-ब्रह्मचर्य , २-गृहस्थ , ३-वानप्रस्थ , ४-संन्यास❗ *🏉चार अंतःकरण🏉* १-मन , २-बुद्धि , ३-चित्त , ४-अहंकार❗ *🍁पञ्च गव्य🍁* १-गाय का घी , २-दूध , दही ,३-गोमूत्र , ४-गोबर❗ *🙏पञ्च देव🙏* १-गणेश , २-विष्णु , ३-शिव , ४-देवी ,५-सूर्य *🕹पंच तत्त्व🕹* १-पृथ्वी ,२-जल , ३-अग्नि(तेज) , ४-वायु , ५-आकाश❗ *⌛छह (षट्दर्शन) दर्शन⌛* १-वैशेषिक , २-न्याय ,३-सांख्य , ४-योग , ५-पूर्व मिसांसा , ६-उत्तर मिसांसा❗ *🌷 सप्त ऋषि🌷* १-विश्वामित्र ,२-जमदाग्नि ,३-भरद्वाज , ४-गौतम , ५-अत्री , ६-वशिष्ठ और कश्यप❗ *🍁सप्त पुरी🍁* १-अयोध्यापुरी ,२-मथुरापुरी , ३-मायापुरी *(हरिद्वार)*, ४-काशीपुरी , ५-कांचीपुरी *(शिन कांची-विष्णु कांची),* ६-अवंतिकापुरी और ७-द्वारिकापुरी❗ *⌛आठ योग⌛* १-यम , २-नियम , ३-आसन ,४-प्राणायाम , ५-प्रत्याहार , ६-धारणा , ७-ध्यान, एवं ८-समािध❗ *🙏आठ लक्ष्मी🙏* १-आग्घ , २-विद्या , ३-सौभाग्य ,४-अमृत , ५-काम , ६-सत्य , ७-भोग ,एवं ८-योग लक्ष्मी❗ *🌹नव दुर्गा 🌹* १-शैल पुत्री , २-ब्रह्मचारिणी ,३-चंद्रघंटा , ४-कुष्मांडा , ५-स्कंदमाता , ६-कात्यायिनी ,७-कालरात्रि, ८-महागौरी एवं ९-सिद्धिदात्री❗ *🍫 दस दिशाएं🍫* १,पूर्व , २-पश्चिम , ३-उत्तर , ४-दक्षिण ,५-ईशान , ६-नैऋत्य , ७-वायव्य , ८-अग्नि ९-आकाश, एवं १०-पाताल,❗ *🏉मुख्य ११ अवतार🏉* १-मत्स्य , २-कश्यप , ३-वराह , ४-नरसिंह , ५-वामन , ६-परशुराम ,७-श्री राम , ८-कृष्ण , -बलराम , १०-बुद्ध एवं ११-कल्कि❗ *🍁बारह मास🍁* १-चैत्र , २-वैशाख , ३-ज्येष्ठ ,४-अषाढ , ५-श्रावण , ६-भाद्रपद , ७-अश्विन , ८-कार्तिक ,९-मार्गशीर्ष , १०-पौष , ११-माघ , १२-फागुन❗ *⌛ बारह राशी ⌛* १-मेष , २-वृषभ , ३-मिथुन , ४-कर्क , ५-सिंह , ६-कन्या , ७-तुला , ८-वृश्चिक , ८-धनु , १०-मकर , ११-कुंभ , १२-मीन ❗ *🙏बारह ज्योतिर्लिंग🙏* १-सोमनाथ ,२-मल्लिकार्जुन ,३-महाकाल , ४-ओमकारेश्वर , ५-बैजनाथ , ६-रामेश्वरम ,७-विश्वनाथ , ८-त्र्यंबकेश्वर , ९-केदारनाथ , १०-घुष्मेश्वर, ११-भीमाशंकर ,१२-नागेश्वर! *💥पंद्रह तिथियाँ💥* १-प्रतिपदा ,२-द्वितीय ,३-तृतीय ,४-चतुर्थी , ५-पंचमी , ६-षष्ठी , ७-सप्तमी , ८-अष्टमी , ९-नवमी ,१०-दशमी , ११-एकादशी , १२-द्वादशी , १३-त्रयोदशी , १४-चतुर्दशी , १५-पूर्णिमा, अमावास्या❗ *🕹स्मृतियां🕹* १-मनु , २-विष्णु , ३-अत्री , ४-हारीत ,५-याज्ञवल्क्य ,७-उशना , ७-अंगीरा , ८-यम , ९-आपस्तम्ब , १०-सर्वत ,१०-कात्यायन , १२-ब्रहस्पति , १३-पराशर , १४-व्यास , १५-शांख्य , १६-लिखित , १७-दक्ष , १८-शातातप , १९-वशिष्ठ❗💍💎🇮🇳💲🌹 *इस पोस्ट को अधिकाधिक शेयर करें जिससे सबको हमारी संस्कृति का ज्ञान हो❗*
क्या है महामृत्युंजय जाप ???
क्या है महामृत्युंजय जाप ???
सावन के महीने में महामृत्युंजय करने से समस्त नवग्रह की शांति हो जाती है भविष्य में आने वाली सभी समस्या का समाधान हो जाता है जिनके घर महामृत्युंजय की पूजा होती है उस घर में भगवान शिव का वास होता है इस कारण उस घर में भूत-प्रेत कभी नहीं आते दुख दरिद्र कभी नहीं आते भगवान शिव की कृपा से घर में शांति बनी रहती है !!
**** घर का कोई सदस्य किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त है और समझती इलाज कराने के बाद में भी स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है तो भगवान मृत्युंजय का जाप घर में कराना चाहिए
***जिन घर में आर्थिक तंगी चल रही है प्रयास करने के बाद में भी नौकरी नहीं लग पा रही जॉब के लिए परेशान हो रहै है वह व्यक्ति कहीं मृत्युंजय का जाप करा ले तो उसके घर में धन धान्य की वृद्धि होगी
*रुद्राभिषेक- विधान-एक सम्पूर्ण जानकारी-*
रूद्र अर्थात भूत भावन शिव का अभिषेक
शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।
शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- *रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:* यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं।
हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं।
रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि
*सर्वदेवात्मको रुद्र:*
*सर्वे देवा: शिवात्मका:*
अर्थात् :- सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।
हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है।
साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं।
किसी खास मनोरथ कीपूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है।
*रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-*
• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
• असाध्य रोगों एवं बाधा दोष एवं ऐसी बीमारी जो पकड़ में नही आ रही हो को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।एवं बाधा शान्ति होती है।
• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।
• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्रा रुद्राभिषेक करें।
• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जातीहै।
• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है। एवं उसका मारण होता है।
• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है। लक्ष्मी प्रप्ति होती है।
• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है।
परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है।
विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत सेभी अभिषेक किया जाता है।
तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है।
इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत हीउत्तम फल देता है।
किन्तु यदि पारद के शिवलिंग काअभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है।
रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। विद्वानों ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की गयी है। पुराणों में तो इससे सम्बंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है
रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था। जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया।
भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।
*रुद्राभिषेक करने की विशेष तिथियां-*
कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।
किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथिमें रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार मेंआनंद-मंगल होता है।
कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है।अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।
ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है।
वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं।
रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है।
संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक करने या करवाने से प्राप्त नहीं हो सकता है