Monday, July 23, 2018

*प्रारब्ध* एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था । धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था । जब भी उसे शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे । धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी कभी आते और देर रात तो नहीं भी आते थे।इस दौरान वे कभी-कभी गंदे बिस्तर पर ही रात बिता दिया करते थे अब और ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा था एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी, तुरन्त एक लड़का आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया । एक रात उनको शक हो जाता है कि, पहले तो बेटों को रात में कई बार आवाज लगाने पर भी नही आते थे। लेकिन ये तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है । एक रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड लेता है और पूछता है कि सच बता तू कौन है ? मेरे बेटे तो ऐसे नही हैं । अभी अंधेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआऔर उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया। वह व्यक्ति रोते हुये कहता है : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना । प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ । व्यक्ति कहता है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है । प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ । ईश्वर कहते है: *प्रारब्ध तीन तरह* के होते है : *मन्द*, *तीव्र*, तथा *तीव्रतम* *मन्द प्रारब्ध* मेरा नाम जपने से कट जाते है । *तीव्र प्रारब्ध* किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है । पर *तीव्रतम प्रारब्ध* भुगतने ही पडते है। लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ । *प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।* *तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर।।*

*प्रारब्ध*  

    एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था । धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था ।

     जब भी उसे शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे ।

    धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी कभी आते और देर रात तो नहीं भी आते थे।इस दौरान वे कभी-कभी गंदे बिस्तर पर ही रात बिता दिया करते थे

    अब और ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा था एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी, तुरन्त एक लड़का आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया ।

    एक रात उनको शक हो जाता है कि, पहले तो बेटों को रात में कई बार आवाज लगाने पर भी नही आते थे। लेकिन ये  तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है ।

    एक रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड लेता है और पूछता है कि सच बता तू कौन है ? मेरे बेटे तो ऐसे नही हैं ।

    अभी अंधेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआऔर उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया।

     वह व्यक्ति रोते हुये कहता है : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना ।

     प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ ।

     व्यक्ति कहता है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है ।

     प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।

ईश्वर कहते है: *प्रारब्ध तीन तरह* के होते है :

*मन्द*,
                    *तीव्र*, तथा
                                            *तीव्रतम*

*मन्द प्रारब्ध* मेरा नाम जपने से कट जाते है । *तीव्र प्रारब्ध* किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है । पर *तीव्रतम प्रारब्ध* भुगतने ही पडते है।

लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ ।

           *प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।*
  *तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर।।*

Thursday, July 19, 2018

एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों एक प्रेरक कथा ... एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया- मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..? इसका क्या कारण है ? राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये .. अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले - महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है.. राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं.. राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।” राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा.. राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे.. राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है... आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा.. वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है.. राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न.. उत्सुकता प्रबल थी.. राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा.. गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही.. जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया.. राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा .. राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो – तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे.. एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे । अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।हमने उसकी चार बाटी सेंकी.. अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये.. अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा – “बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय ... इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले.. तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा आग ...? चलो भागो यहां से ….। वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही.. किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि.. बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ? भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये.. मुझसे भी बाटी मांगी… किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …? अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !.. आपके पास भी आये,दया की याचना की.. दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी । बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले.. तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा । बालक ने कहा “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं... और वो बालक मर गया धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..। राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ-- ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र जातक सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं.. यही है जीवन... "गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता.. तो सोचिये .. गलत कर्मो से जन्नत के दरवाजे कैसे खुलेंगे 🐚🐚🐚

Wednesday, July 18, 2018

*🌷ओ३म्🌷* *🌻धर्म का स्वरूप🌻* *धर्म क्या है ?* जिस विषय में सबकी एक सम्मति हो वह धर्म और उससे विपरीत अधर्म है । जैसे विद्या पढ़ने, ब्रह्मचर्य पालने, सत्यभाषण करने, युवावस्था में विवाह करने, सत्संग-पुरूषार्थ-सत्य-व्यवहार करने में धर्म और अविद्या-ग्रहण, ब्रह्मचर्य का पालन न करने, व्यभिचार करने, कुसंग, आलस्य, असत्य-व्यवहार, छल-कपट, हिंसा, पर-हानि करने आदि में अधर्म हैं । *(सत्यार्थप्रकाश के आधार पर )* महर्षि मनु ने धर्म के जो लक्षण लिखे हैं, वे सार्वभौम हैं ।यथा - *धृतिः क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।* *धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।* मनुस्मृति - ६ । ९२ *धृतिः--* सदा धैर्य रखना । तनिक - तनिक - सी बातों में अधीर न होना । *क्षमा--* निन्दा-स्तुति, मान-अपमान, हानि-लाभ में सहनशील रहना । *दमः--* चञ्चल मन को वश में करके उसे अधर्म की ओर जाने से रोकना । *अस्तेयम्--* चोरी-त्याग । बिना स्वामी की आज्ञा के किसी पदार्थ के लेने की इच्छा भी न करना । *शौचम्--* बाहर और भीतर की पवित्रता । स्नान, वस्त्र-प्रक्षालन आदि से बाहर की और राग-द्वेष से अन्दर की शुद्धता रखना । *इन्द्रीयनिग्रहः--* सभी इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोककर धर्म-मार्ग में चलाना । *धीः--* मादक द्रव्यों के त्याग, सत्संग और योगाभ्यास से बुद्धि को बढ़ाना । *विद्या--* पृथिवी से लेकर परमेश्वर - पर्यन्त पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना विद्या हैं । *सत्यम् --* जो पदार्थ जैसा हैं, उसे वैसा ही जानना, मानना, बोलना और लिखना भी सत्य कहलाता हैं । *अक्रोधः--* क्रोध न करना, सदा शान्त रहना । इस दस लक्षणोंवाले धर्म का पालन सभी को करना चाहिए । *💥 (स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती कृत धर्म-शिक्षा से साभार )*

*🌷ओ३म्🌷*

*🌻धर्म का स्वरूप🌻*

*धर्म क्या है ?*
जिस विषय में सबकी एक सम्मति हो वह धर्म और उससे विपरीत अधर्म है । जैसे विद्या पढ़ने, ब्रह्मचर्य पालने, सत्यभाषण करने, युवावस्था में विवाह करने, सत्संग-पुरूषार्थ-सत्य-व्यवहार करने में धर्म और अविद्या-ग्रहण, ब्रह्मचर्य का पालन न करने, व्यभिचार करने, कुसंग, आलस्य, असत्य-व्यवहार, छल-कपट, हिंसा, पर-हानि करने आदि में अधर्म हैं ।
*(सत्यार्थप्रकाश के आधार पर )*

महर्षि मनु ने धर्म के जो लक्षण लिखे हैं, वे सार्वभौम हैं ।यथा -
*धृतिः क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।*
*धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।*
मनुस्मृति - ६ । ९२
*धृतिः--* सदा धैर्य रखना । तनिक - तनिक - सी बातों में अधीर न होना ।

*क्षमा--* निन्दा-स्तुति, मान-अपमान, हानि-लाभ में सहनशील रहना ।

*दमः--* चञ्चल मन को वश में करके उसे अधर्म की ओर जाने से रोकना ।

*अस्तेयम्--* चोरी-त्याग । बिना स्वामी की आज्ञा के किसी पदार्थ के लेने की इच्छा भी न करना ।

*शौचम्--* बाहर और भीतर की पवित्रता । स्नान, वस्त्र-प्रक्षालन आदि से बाहर की और राग-द्वेष से अन्दर की शुद्धता रखना ।

*इन्द्रीयनिग्रहः--* सभी इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोककर धर्म-मार्ग में चलाना ।

*धीः--* मादक द्रव्यों के त्याग, सत्संग और योगाभ्यास से बुद्धि को बढ़ाना ।

*विद्या--* पृथिवी से लेकर परमेश्वर - पर्यन्त पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना विद्या हैं ।

*सत्यम् --* जो पदार्थ जैसा हैं, उसे वैसा ही जानना, मानना, बोलना और लिखना भी सत्य कहलाता हैं ।

*अक्रोधः--* क्रोध न करना, सदा शान्त रहना ।

इस दस लक्षणोंवाले धर्म का पालन सभी को करना चाहिए ।

*💥 (स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती कृत धर्म-शिक्षा से साभार )*

Sunday, July 15, 2018

#संस्कार - " बहू घर के काम निपटाने के बाद,अम्मा जी और मेरे पैरों की मालिश कर दिया करो " " मम्मी जी मुझसे इतना काम नहीं हो पायेगा , बहुत थक जाती हूँ " अरे.....!! अभी महीना भर हुआ नहीं तुम्हें आये हुए और तुम जवाब देने लगी हमें ....अम्माजी बुजुर्ग हैं , तुम उनके पैर की मालिश करने से मना कर रही हो । "आप कर दिया करें उनकी मालिश ,आप तो अभी एकदम ठीक हैं" शर्म नहीं आती तुम्हें जवाब देते हुए ... यही संस्कार दिए हैं तुम्हारी माँ ने ??? संस्कार !! लेकिन वो आपने माँगा कहाँ था ?? शादी के पाँच दिन पहले आपने जिन सामानों की लिस्ट भिजवाई थी उसमें संस्कार तो कहीं नहीं लिखा था आप लोगों ने .. "आपकी माँग को पूरा करने के लिए जब माँ ने अपने गहने और पापा ने जमीन गिरवी रखी तो मैंने उनके दिए हुए संस्कार भी गिरवी रख दिये " बहू का यह कहते कहते गला भर आया ...और आंखों से आँशुओं की धारा बहने लगी ...

#संस्कार -

" बहू घर के काम निपटाने के बाद,अम्मा जी और मेरे पैरों की मालिश कर दिया करो "

" मम्मी जी मुझसे इतना काम नहीं हो पायेगा , बहुत थक जाती हूँ "

अरे.....!! अभी महीना भर हुआ नहीं तुम्हें आये हुए और तुम जवाब देने लगी हमें ....अम्माजी बुजुर्ग हैं , तुम उनके पैर की मालिश करने से मना कर रही हो ।

"आप कर दिया करें उनकी मालिश ,आप तो अभी एकदम ठीक हैं"

शर्म नहीं आती तुम्हें जवाब देते हुए ... यही संस्कार दिए हैं तुम्हारी माँ ने ???

संस्कार !! लेकिन वो आपने माँगा कहाँ था ??

शादी के पाँच दिन पहले आपने जिन सामानों की लिस्ट भिजवाई थी उसमें संस्कार तो कहीं नहीं लिखा था आप लोगों ने ..

"आपकी माँग को पूरा करने के लिए जब माँ ने अपने गहने और पापा ने जमीन गिरवी रखी तो मैंने उनके दिए हुए संस्कार भी गिरवी रख दिये "
बहू का यह कहते कहते गला भर आया ...और आंखों से आँशुओं की धारा बहने लगी ...

Friday, July 6, 2018

*🔺🌺🌝#सात_काण्ड🌝🌺🔺 🔺🌺🍁🌻🌷🌻🍁🌺🔺 . *रामायण के सात काण्ड - मानव की उन्नति (विकास) के सात सोपान* *🌻1 #बालकाण्ड -* बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल ,कपट , नही होता । विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है , उसी को भगवान प्राप्त होते है। बालक जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकते है। जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। बालक की भाँति अपने मान अपमान को भूलने से जीवन मेँ सरलता आती है।बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बनेगा । जहाँ युद्ध, वैर ,ईर्ष्या नहीँ है , वही अयोध्या है। *🌸2. #अयोध्याकाण्ड -* यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है l जब जीव भक्ति रुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है, तभी मनुष्य निर्विकारी बनता है। भक्ति अर्थात् प्रेम , अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है । राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम आदि ,सब इसी काण्ड मेँ है ।राम की निर्विकारिता इसी मेँ दिखाई देती है । अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार मेँ प्रेम बढता है । उसके घर मेँ लडाई झगडे नहीँ होते । उसका घर अयोध्या बनता है । कलह का मूल कारण धन एवं प्रतिष्ठा है । अयोध्याकाण्ड का फल निर्वैरता है ।सबसे पहले अपने घर की ही सभी प्राणियोँ मेँ भगवद् भाव रखना चाहिए। *🌷3. #अरण्यकाण्ड -* यह निर्वासन प्रदान करता है ।इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी । बिना अरण्यवास (जंगल) के जीवन मेँ दिव्यता नहीँ आती l रामचन्द्र राजा होकर भी सीता के साथ वनवास किया । वनवास मनुष्य हृदय को कोमल बनाता है । तप द्वारा ही कामरुपी रावण का बध होगा । इसमेँ सूपर्णखा (मोह ) एवं शबरी (भक्ति) दोनो ही है। भगवान राम सन्देश देते हैँ कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ । *🍁4. #किष्किन्धाकाण्ड -* जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा तभी जीव की ईश्वर से मैत्री होगी । इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है। जब जीव सुग्रीव की भाँति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा तभी उसे राम मिलेँगे । जिसका कण्ठ सुन्दर है वही सुग्रीव है। कण्ठ की शोभा आभूषण से नही बल्कि राम नाम का जप करने से है। जिसका कण्ठ सुन्दर है , उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी । *🔥5. #सुन्दरकाण्ड -* जब जीव की मैत्री राम से हो जाती है तो वह सुन्दर हो जाता है । इस काण्ड मेँ हनुमान को सीता के दर्शन होते है। सीताजी पराभक्ति है , जिसका जीवन सुन्दर होता है उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है ।संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते हैl ब्रह्मचर्य एवं रामनाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है । संसार सागर को पार करते समय मार्ग मेँ सुरसा बाधा डालने आ जाती है , अच्छे रस ही सुरसा है , नये नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश मे रखना होगा । जहाँ पराभक्ति सीता है वहाँ शोक नही रहता , जहाँ सीता है वहाँ अशोकवन है। *🔺6. #लंकाकाण्ड -* जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसो का संहार होता है काम क्रोधादि ही राक्षस हैँ । जो इन्हेँ मार सकता है , वही काल को भी मार सकता है जिसे काम मारता है उसे काल भी मारता है , लंका शब्द के अक्षरो को इधर उधर करने पर होगा कालं । काल सभी को मारता है l किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैँ । क्योँकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैँ पराभक्ति का दर्शन करते है । *🌺7. #उत्तरकाण्ड -* इस काण्ड मेँ काकभुसुण्डि एवं गरुड संवाद को बार बार पढना चाहिए । इसमेँ सब कुछ है । जब तक राक्षस , काल का विनाश नहीँ होगा तब तक उत्तरकाण्ड मे प्रवेश नही मिलेगा । इसमेँ भक्ति की कथा है । भक्त कौन है ? जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता वही भक्त है । पूर्वार्ध मे जो काम रुपी रावण को मारता है उसी का उत्तरकाण्ड सुन्दर बनता है , वृद्धावस्था मे राज्य करता है । जब जीवन के पूर्वार्ध मे युवावस्था मे काम को मारने का प्रयत्न होगा तभी उत्तरार्ध - उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा । अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए *🌸🍂#जय_राम_जी_की🍂🌸*

*🔺🌺🌝#सात_काण्ड🌝🌺🔺
🔺🌺🍁🌻🌷🌻🍁🌺🔺

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*रामायण के सात काण्ड - मानव की उन्नति (विकास) के सात सोपान*

*🌻1 #बालकाण्ड -*
बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल ,कपट , नही होता ।
विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है , उसी को भगवान प्राप्त होते है। बालक जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकते है। जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। बालक की भाँति अपने मान अपमान को भूलने से जीवन मेँ सरलता आती है।बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बनेगा । जहाँ युद्ध, वैर ,ईर्ष्या नहीँ है , वही अयोध्या है।

*🌸2. #अयोध्याकाण्ड -*
यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है l जब जीव भक्ति रुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है, तभी मनुष्य निर्विकारी बनता है। भक्ति अर्थात् प्रेम , अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है । राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम आदि ,सब इसी काण्ड मेँ है ।राम की निर्विकारिता इसी मेँ दिखाई देती है । अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार मेँ प्रेम बढता है । उसके घर मेँ लडाई झगडे नहीँ होते । उसका घर अयोध्या बनता है । कलह का मूल कारण धन एवं प्रतिष्ठा है । अयोध्याकाण्ड का फल निर्वैरता है ।सबसे पहले अपने घर की ही सभी प्राणियोँ मेँ भगवद् भाव रखना चाहिए।

*🌷3. #अरण्यकाण्ड -*
यह निर्वासन प्रदान करता है ।इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी । बिना अरण्यवास (जंगल) के जीवन मेँ दिव्यता नहीँ आती l रामचन्द्र राजा होकर भी सीता के साथ वनवास किया । वनवास मनुष्य हृदय को कोमल बनाता है । तप द्वारा ही कामरुपी रावण का बध होगा । इसमेँ सूपर्णखा (मोह ) एवं शबरी (भक्ति) दोनो ही है। भगवान राम सन्देश देते हैँ कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ ।

*🍁4. #किष्किन्धाकाण्ड -*
जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा तभी जीव की ईश्वर से मैत्री होगी । इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है। जब जीव सुग्रीव की भाँति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा तभी उसे राम मिलेँगे । जिसका कण्ठ सुन्दर है वही सुग्रीव है। कण्ठ की शोभा आभूषण से नही बल्कि राम नाम का जप करने से है। जिसका कण्ठ सुन्दर है , उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी ।

*🔥5. #सुन्दरकाण्ड -*
जब जीव की मैत्री राम से हो जाती है तो वह सुन्दर हो जाता है । इस काण्ड मेँ हनुमान को सीता के दर्शन होते है। सीताजी पराभक्ति है , जिसका जीवन सुन्दर होता है उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है ।संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते हैl ब्रह्मचर्य एवं रामनाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है । संसार सागर को पार करते समय मार्ग मेँ सुरसा बाधा डालने आ जाती है , अच्छे रस ही सुरसा है , नये नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश मे रखना होगा । जहाँ पराभक्ति सीता है वहाँ शोक नही रहता , जहाँ सीता है वहाँ अशोकवन है।

*🔺6. #लंकाकाण्ड -*
जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसो का संहार होता है काम क्रोधादि ही राक्षस हैँ । जो इन्हेँ मार सकता है , वही काल को भी मार सकता है जिसे काम मारता है उसे काल भी मारता है , लंका शब्द के अक्षरो को इधर उधर करने पर होगा कालं । काल सभी को मारता है l किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैँ । क्योँकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैँ पराभक्ति का दर्शन करते है ।

*🌺7. #उत्तरकाण्ड -*
इस काण्ड मेँ काकभुसुण्डि एवं गरुड संवाद को बार बार पढना चाहिए । इसमेँ सब कुछ है । जब तक राक्षस , काल का विनाश नहीँ होगा तब तक उत्तरकाण्ड मे प्रवेश नही मिलेगा । इसमेँ भक्ति की कथा है । भक्त कौन है ? जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता वही भक्त है । पूर्वार्ध मे जो काम रुपी रावण को मारता है उसी का उत्तरकाण्ड सुन्दर बनता है , वृद्धावस्था मे राज्य करता है । जब जीवन के पूर्वार्ध मे युवावस्था मे काम को मारने का प्रयत्न होगा तभी उत्तरार्ध - उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा । अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए
*🌸🍂#जय_राम_जी_की🍂🌸*

दो सुन्दर प्रसंग एक श्रीकृष्ण की और एक श्री राम की माखन चोरी का.... माखन चोर नटखट श्री कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ने के लिये एक ग्वालिन ने एक अनोखी जुगत भिड़ाई। उसने माखन की मटकी के साथ एक घंटी बाँध दी, कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन-मटकी को हाथ लगायेगा, घंटी बज उठेगी और मैं उसे रंगे हाथों पकड़ लूँगी। बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ दबे पाँव घर में घुसे। श्री दामा की दृष्टि तुरन्त घंटी पर पड़ गई और उन्होंने बाल कृष्ण को संकेत किया। बाल कृष्ण ने सभी को निश्चिंत रहने का संकेत करते हुये, घंटी से फुसफसाते हुये कहा:- "देखो घंटी, हम माखन चुरायेंगे, तुम बिल्कुल मत बजना" घंटी बोली "जैसी आज्ञा प्रभु, नहीं बजूँगी" बाल कृष्ण ने ख़ूब माखन चुराया अपने सखाओं को खिलाया - घंटी नहीं बजी। ख़ूब बंदरों को खिलाया - घंटी नहीं बजी। अंत में ज्यों हीं बाल कृष्ण ने माखन से भरा हाथ अपने मुँह से लगाया , त्यों ही घंटी बज उठी। घंटी की आवाज़ सुन कर ग्वालिन दौड़ी आई। ग्वाल बालों में भगदड़ मच गई। सारे भाग गये बस श्री कृष्ण पकड़ाई में आ गये। बाल कृष्ण बोले - "तनिक ठहर गोपी , तुझे जो सज़ा देनी है वो दे दीजो , पर उससे पहले मैं ज़रा इस घंटी से निबट लूँ...क्यों री घंटी...तू बजी क्यो...मैंने मना किया था न...?" घंटी क्षमा माँगती हुई बोली - "प्रभु आपके सखाओं ने माखन खाया , मैं नहीं बजी...आपने बंदरों को ख़ूब माखन खिलाया , मैं नहीं बजी , किन्तु जैसे ही आपने माखन खाया तब तो मुझे बजना ही था...मुझे आदत पड़ी हुई है प्रभु...मंदिर में जब पुजारी भगवान को भोग लगाते हैं तब घंटियाँ बजाते हैं...इसलिये प्रभु मैं आदतन बज उठी और बजी..." श्री गिरिराज धरण की जय... श्री बाल कृष्ण की जय 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 उस समय का प्रसंग है जब केवट भगवान के चरण धो रहा है. बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान का एक पैर धोता का उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देता है, और जब दूसरा धोने लगता है तो पहला वाला पैर गीला होने से जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है, 🍃केवट दूसरा पैर बाहर रखता है फिर पहले वाले को धोता है, एक-एक पैर को सात-सात बार धोता है. कहता है प्रभु एक पैर कठौती मे रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो. जब भगवान ऐसा करते है तो जरा सोचिये क्या स्थिति होगी , यदि एक पैर कठौती में है दूसरा केवट के हाथो में, भगवान दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले - केवट मै गिर जाऊँगा ? 🍃केवट बोला - चिंता क्यों करते हो सरकार ! दोनों हाथो को मेरे सिर पर रखकर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेगे , जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है,भगवान भी आज वैसे ही खड़े है. 🍃भगवान केवट से बोले - भईया केवट ! मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया. केवट बोला - प्रभु ! क्या कह रहे है ? 🍃भगवान बोले - सच कह रहा हूँ केवट, अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि मै भक्तो को गिरने से बचाता हूँ पर 🍃आज पता चला कि, भक्त भी भगवान को गिरने से बचाता है. 😄🌴🍃🌿🌸 *🌹 प्रभु तू मेरा* *मे तेरा 🌹* *।।। जय राम जी की ।।।* *।।।राधे राधे।।।* 💐🍀🌿🌿🍃 पसंद आये तो लाइक और शेयर कीजिए 🙏

दो सुन्दर प्रसंग एक श्रीकृष्ण की और एक श्री राम की

माखन चोरी का.... 

माखन चोर नटखट श्री कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ने के लिये एक ग्वालिन ने एक अनोखी जुगत भिड़ाई।

उसने माखन की मटकी के साथ एक घंटी बाँध दी, कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन-मटकी को हाथ लगायेगा, घंटी बज उठेगी और मैं उसे रंगे हाथों पकड़ लूँगी।

बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ दबे पाँव घर में घुसे।

श्री दामा की दृष्टि तुरन्त घंटी पर पड़ गई और उन्होंने बाल कृष्ण को संकेत किया।

बाल कृष्ण ने सभी को निश्चिंत रहने का संकेत करते हुये, घंटी से फुसफसाते हुये कहा:-

"देखो घंटी, हम माखन चुरायेंगे, तुम बिल्कुल मत बजना"

घंटी बोली "जैसी आज्ञा प्रभु, नहीं बजूँगी"

बाल कृष्ण ने ख़ूब माखन चुराया अपने सखाओं को खिलाया - घंटी नहीं बजी।

ख़ूब बंदरों को खिलाया - घंटी नहीं बजी।

अंत में ज्यों हीं बाल कृष्ण ने माखन से भरा हाथ अपने मुँह से लगाया , त्यों ही घंटी बज उठी।

घंटी की आवाज़ सुन कर ग्वालिन दौड़ी आई।
ग्वाल बालों में भगदड़ मच गई।
सारे भाग गये बस श्री कृष्ण पकड़ाई में आ गये।

बाल कृष्ण बोले - "तनिक ठहर गोपी , तुझे जो सज़ा देनी है वो दे दीजो , पर उससे पहले मैं ज़रा इस घंटी से निबट लूँ...क्यों री घंटी...तू बजी क्यो...मैंने मना किया था न...?"

घंटी क्षमा माँगती हुई बोली - "प्रभु आपके सखाओं ने माखन खाया , मैं नहीं बजी...आपने बंदरों को ख़ूब माखन खिलाया , मैं नहीं बजी , किन्तु जैसे ही आपने माखन खाया तब तो मुझे बजना ही था...मुझे आदत पड़ी हुई है प्रभु...मंदिर में जब पुजारी  भगवान को भोग लगाते हैं तब घंटियाँ बजाते हैं...इसलिये प्रभु मैं आदतन बज उठी और बजी..."

श्री गिरिराज धरण की जय...
श्री बाल कृष्ण की जय
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

उस समय का प्रसंग है जब
केवट भगवान के चरण धो रहा है.
बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान का एक पैर धोता का उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देता है,
और जब दूसरा धोने लगता है तो
पहला वाला पैर गीला होने से
जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है,
🍃केवट दूसरा पैर बाहर रखता है फिर पहले वाले को धोता है,
एक-एक पैर को सात-सात बार धोता है.
कहता है प्रभु एक पैर कठौती मे रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो.
जब भगवान ऐसा करते है
तो जरा सोचिये क्या स्थिति होगी , यदि एक पैर कठौती में है दूसरा केवट के हाथो में, भगवान दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले - केवट मै गिर जाऊँगा ?
🍃केवट बोला - चिंता क्यों करते हो सरकार !
दोनों हाथो को मेरे सिर पर रखकर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेगे ,
जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है,भगवान भी आज वैसे ही खड़े है.
🍃भगवान केवट से बोले - भईया केवट !
मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया.
केवट बोला - प्रभु ! क्या कह रहे है ?
🍃भगवान बोले - सच कह रहा हूँ केवट,
अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि
मै भक्तो को गिरने से बचाता हूँ पर
🍃आज पता चला कि,
भक्त भी भगवान को गिरने से बचाता है.

😄🌴🍃🌿🌸
*🌹 प्रभु तू मेरा*  
                 *मे तेरा   🌹*
*।।। जय राम जी की ।।।*
*।।।राधे राधे।।।*
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*रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे कटोरा लिए एक भिखारी लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने कटोरे में पड़े सिक्कों को हिलाता रहता और साथ-साथ यह गाना भी गाता जाता -* *गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा -२* *तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा* *गरीबों की सुनो ..."* *कटोरे से पैदा हुई ध्वनि व उसके गीत को सुन आते-जाते मुसाफ़िर उसके कटोरे में सिक्के डाल देते।* *सुना था, इस भिखारी के पुरखे शहर के नामचीन लोग थे! इसकी ऐसी हालत कैसे हुई यह अपने आप में शायद एक अलग कहानी हो!* *आज भी हमेशा की तरह वह अपने कटोरे में पड़ी चिल्हर को हिलाते हुए, 'ग़रीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा....' वाला गीत गा रहा था।* *तभी एक व्यक्ति भिखारी के पास आकर एक पल के लिए ठिठकर रुक गया। उसकी नजर भिखारी के कटोरे पर थी फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाल कुछ सौ-सौ के नोट गिने। भिखारी उस व्यक्ति को इतने सारे नोट गिनता देख उसकी तरफ टकटकी बाँधे देख रहा था कि शायद कोई एक छोटा नोट उसे भी मिल जाए।* *तभी उस व्यक्ति ने भिखारी को संबोधित करते हुए कहा, "अगर मैं तुम्हें हजार रुपये दूं तो क्या तुम अपना कटोरा मुझे दे सकते हो?"* *भिखारी अभी सोच ही रहा था कि वह व्यक्ति बोला, "अच्छा चलो मैं तुम्हें दो हजार देता हूँ!"* *भिखारी ने अचंभित होते हुए अपना कटोरा उस व्यक्ति की ओर बढ़ा दिया और वह व्यक्ति कुछ सौ-सौ के नोट उस भिखारी को थमा उससे कटोरा ले अपने बैग में डाल तेज कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ गया।* *इधर भिखारी भी अपना गीत बंद कर वहां से ये सोच कर अपने रास्ते हो लिया कि कहीं वह व्यक्ति अपना मन न बदल ले और हाथ आया इतना पैसा हाथ से निकल जाए।* *और भिखारी ने इसी डर से फैसला लिया अब वह इस स्टेशन पर कभी नहीं आएगा - कहीं और जाएगा!* *रास्ते भर भिखारी खुश होकर यही सोच रहा था कि 'लोग हर रोज आकर सिक्के डालते थे,* *पर आज दौ हजार में कटोरा! वह कटोरे का क्या करेगा?' भिखारी सोच रहा था?* *उधर दो हजार में कटोरा खरीदने वाला व्यक्ति अब रेलगाड़ी में सवार हो चुका था। उसने धीरे से बैग की ज़िप्प खोल कर कटोरा टटोला - सब सुरक्षित था। वह पीछे छुटते नगर और स्टेशन को देख रहा था। उसने एक बार फिर बैग में हाथ डाल कटोरे का वजन भांपने की कोशिश की। कम से कम आधा किलो का तो होगा!* *उसने जीवन भर धातुओं का काम किया था। भिखारी के हाथ में वह कटोरा देख वह हैरान हो गया था। सोने का कटोरा! .....और लोग डाल रहे थे उसमें एक-दो के सिक्के!* *उसकी सुनार वाली आँख ने धूल में सने उस कटोरे को पहचान लिया था। ना भिखारी को उसकी कीमत पता थी और न सिक्का डालने वालों को पर वह तो जौहरी था, सुनार था।* *भिखारी दो हजार में खुश था और जौहरी कटोरा पाकर! उसने लाखों की कीमत का कटोरा दो हजार में जो खरीद लिया था।* *इसी तरह हम भी अपने अनमोल इंसानी जामे की उपयोगिता भूले बैठे है और उसे एक सामान्य कटोरे की भाँति समझ कर खटका कर कौड़ियां इक्कट्ठे करने में लगे हुए हैं।* *ये इंसानी जन्म ८४ लाख योनियों के बाद मिला है* *इसे ऐसे ही ना गवाएं* *हर समय परमात्मा का नाम जप के अपना जीवन सफल बनाएं*

*रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे कटोरा लिए एक भिखारी लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने कटोरे में पड़े सिक्कों को हिलाता रहता और साथ-साथ यह गाना भी गाता जाता -*
*गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा -२*
*तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा*
*गरीबों की सुनो ..."*

*कटोरे से पैदा हुई ध्वनि व उसके गीत को सुन आते-जाते मुसाफ़िर उसके कटोरे में सिक्के डाल देते।*

*सुना था, इस भिखारी के पुरखे शहर के नामचीन लोग थे! इसकी ऐसी हालत कैसे हुई यह अपने आप में शायद एक अलग कहानी हो!*

*आज भी हमेशा की तरह वह अपने कटोरे में पड़ी चिल्हर को हिलाते हुए, 'ग़रीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा....' वाला गीत गा रहा था।*

*तभी एक व्यक्ति भिखारी के पास आकर एक पल के लिए ठिठकर रुक गया। उसकी नजर भिखारी के कटोरे पर थी फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाल कुछ सौ-सौ के नोट गिने। भिखारी उस व्यक्ति को इतने सारे नोट गिनता देख उसकी तरफ टकटकी बाँधे देख रहा था कि शायद कोई एक छोटा नोट उसे भी मिल जाए।*

*तभी उस व्यक्ति ने भिखारी को संबोधित करते हुए कहा, "अगर मैं तुम्हें हजार रुपये दूं तो क्या तुम अपना कटोरा मुझे दे सकते हो?"*

*भिखारी अभी सोच ही रहा था कि वह व्यक्ति बोला, "अच्छा चलो मैं तुम्हें दो हजार देता हूँ!"*

*भिखारी ने अचंभित होते हुए अपना कटोरा उस व्यक्ति की ओर बढ़ा दिया और वह व्यक्ति कुछ सौ-सौ के नोट उस भिखारी को थमा उससे कटोरा ले अपने बैग में डाल तेज कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ गया।*

*इधर भिखारी भी अपना गीत बंद कर वहां से ये सोच कर अपने रास्ते हो लिया कि कहीं वह व्यक्ति अपना मन न बदल ले और हाथ आया इतना पैसा हाथ से निकल जाए।*
*और भिखारी ने इसी डर से फैसला लिया अब वह इस स्टेशन पर कभी नहीं आएगा - कहीं और जाएगा!*

*रास्ते भर भिखारी खुश होकर  यही सोच रहा था कि 'लोग हर रोज आकर सिक्के डालते थे,*
*पर आज दौ हजार में कटोरा! वह कटोरे का क्या करेगा?' भिखारी सोच रहा था?*

*उधर दो हजार में कटोरा खरीदने वाला व्यक्ति अब रेलगाड़ी में सवार हो चुका था। उसने धीरे से बैग की ज़िप्प खोल कर कटोरा टटोला - सब सुरक्षित था। वह पीछे छुटते नगर और स्टेशन को देख रहा था। उसने एक बार फिर बैग में हाथ डाल कटोरे का वजन भांपने की कोशिश की। कम से कम आधा किलो का तो होगा!*

*उसने जीवन भर धातुओं का काम किया था। भिखारी के हाथ में वह कटोरा देख वह हैरान हो गया था। सोने का कटोरा! .....और लोग डाल रहे थे उसमें एक-दो के सिक्के!*

*उसकी सुनार वाली आँख ने धूल में सने उस कटोरे को पहचान लिया था। ना भिखारी को उसकी कीमत पता थी और न सिक्का डालने वालों को पर वह तो जौहरी था, सुनार था।*

*भिखारी दो हजार में खुश था और जौहरी कटोरा पाकर! उसने लाखों की कीमत का कटोरा दो हजार में जो खरीद लिया था।*

*इसी तरह हम भी अपने अनमोल इंसानी जामे की उपयोगिता भूले बैठे है और उसे एक सामान्य कटोरे की भाँति समझ कर खटका कर कौड़ियां इक्कट्ठे करने में लगे हुए हैं।*

*ये इंसानी जन्म ८४ लाख योनियों के बाद मिला है*
*इसे ऐसे ही ना गवाएं*
*हर समय परमात्मा का नाम जप के अपना जीवन सफल बनाएं*