Friday, May 25, 2018

शास्त्रानुसार, यज्ञोपवीत क्यों और इसके नियम: . . यज्ञोपवीत द्विजत्व का चिन्ह है। कहा भी है- मातुरग्रेऽधिजननम् द्वितीयम् मौञ्जि बन्धनम्। अर्थात्-पहला जन्म माता के उदर से और दूसरा यज्ञोपवीत धारण से होता है। आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणम् कृणुते गर्भमन्त:। त रात्रीस्तिस्र उदरे विभत्ति तं जातंद्रष्टुमभि संयन्ति देवा:।। अथर्व 11/3/5/3 अर्थात्-गर्भ में रहकर माता और पिता के संबंध से मनुष्य का पहला जन्म होता है। दूसरा जन्म विद्या रूपी माता और आचार्य रूप पिता द्वारा गुरुकुल में उपनयन और विद्याभ्यास द्वारा होता है। ‘‘सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र’’ में लिखा है कि यज्ञोपवीत के नौ धागों में नौ देवता निवास करते हैं। (1) ओउमकार (2) अग्नि (3) अनन्त (4) चन्द्र (5) पितृ (6) प्रजापति (7) वायु (8) सूर्य (9) सब देवताओं का समूह। वेद मंत्रों से अभिमंत्रित एवं संस्कारपूर्वक कराये यज्ञोपवीत में 9 शक्तियों का निवास होता है। जिस शरीर पर ऐसी समस्त देवों की सम्मिलित प्रतिमा की स्थापना है, उस शरीर रूपी देवालय को परम श्रेय साधना ही समझना चाहिए। ‘‘सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र’’ में यज्ञोपवीत के संबंध में एक और महत्वपूर्ण उल्लेख है- ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणी कृतम्। कृतो ग्रन्थिस्त्रनेत्रेण गायत्र्याचाभि मन्त्रितम्।। अर्थात्-ब्रह्माजी ने तीन वेदों से तीन धागे का सूत्र बनाया। विष्णु ने ज्ञान, कर्म, उपासना इन तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी ने गायत्री से अभिमंत्रित कर उसे ब्रह्म गाँठ लगा दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार और ग्रंथियों समेत बनकर तैयार हुआ। यज्ञोपवीत के लाभों का वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है- येनेन्द्राय वृहस्पतिवृर्व्यस्त: पर्यद धाद मृतं नेनत्वा। परिदधाम्यायुष्ये दीर्घायुत्वाय वलायि वर्चसे।। पारस्कर गृह सूत्र 2/2/7 ‘‘जिस प्रकार इन्द्र को वृहस्पति ने यज्ञोपवीत दिया था उसी तरह आयु, बल, बुद्धि और सम्पत्ति की वृद्धि के लिए यज्ञोपवीत पहना जाय।’’ देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तत्रपृषयस्तपसे ये निषेदु:। भीमा जन्या ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धां दधति परमे व्योमन्।। ऋग्वेद 10/101/4 अर्थात-तपस्वी ऋषि और देवतागणों ने कहा कि यज्ञोपवीत की शक्ति महान है। यह शक्ति शुद्ध चरित्र और कठिन कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देती है। इस यज्ञोपवीत को धारण करने से जीव-जन भी परम पद को पहुँच जाते हैं। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रति मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज:।। -ब्रह्मोपनिषद् अर्थात- यज्ञोपवीत परम पवित्र है, प्रजापति ईश्वर ने इसे सबके लिए सहज बनाया है। यह आयुवर्धक, स्फूर्तिदायक, बन्धनों से छुड़ाने वाला एवं पवित्रता, बल और तेज देता है। त्रिरस्यता परमा सन्ति सत्या स्यार्हा देवस्य जनि मान्यग्ने:। अनन्ते अन्त: परिवीत आगाच्छुचि: शुक्रो अर्थो रोरुचान:।। -4/1/7 अर्थात- इस यज्ञोपवीत के परम श्रेष्ठ तीन लक्षण है। 1. सत्य व्यवहार की आकांक्षा 2. अग्नि जैसी तेजस्विता 3. दिव्य गुणों से युक्त प्रसन्नता इसके द्वारा भली प्रकार प्राप्त होती है। नौ धागों में नौ गुणों के प्रतीक हैं। 1. अहिंसा 2. सत्य 3. अस्तेय 4. तितिक्षा 5. अपरिग्रह 6. संयम 7. आस्तिकता 8. शान्ति 9. पवित्रता। 1. हृदय से प्रेम 2. वाणी में माधुर्य 3. व्यवहार में सरलता 4. नारी मात्र में मातृत्व की भावना 5. कर्म में कला और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति 6. सबके प्रति उदारता और सेवा भावना 7. गुरुजनों का सम्मान एवं अनुशासन 8. सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय एवं सत्संग 9. स्वच्छता, व्यवस्था और निरालस्यता का स्वभाव। यह भी नौ गुण बताये गये हैं। अभिनव संस्कार पद्धति में श्लोक भी दिये गये हैं। यज्ञोपवीत पहनने का अर्थ है-नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को अपने कन्धों पर परम पवित्र उत्तरदायित्व के रूप में अनुभव करते रहना। अपनी गतिविधियों का सारा ढाँचा इस आदर्शवादिता के अनुरुप ही खड़ा करना। इस उत्तरदायित्व के अनुभव करते रहने की प्रेरणा का यह प्रतीक सत्र धारण किये रहने प्रत्येक हिन्दू का आवश्यक धर्म-कर्तव्य माना गया है। इस लक्ष्य से अवगत कराने के लिए समारोहपूर्वक उपनयन किया जाता है। विधि व्यवस्था बालक जब थोड़ा सदाचार हो जाय और यज्ञोपवीत के आदर्शों को समझने एवं नियमों को पालने योग्य हो जाय तो उसका उपनयन संस्कार कराना चाहिए। साधारणतया 12 से 13 वर्ष की आयु इसके लिए ठीक है। जिनका तब तक न हुआ हो तो वे कभी भी करा सकते हैं। जिन महिलाओं की गोदी में छोटे बच्चे नहीं वे भी उसे धारण कर सकती है। जो पहने उन्हें 1. मल-मूत्र त्यागते समय जनेऊ को कान पर चढ़ाना 2. गायत्री की प्रतिमा यज्ञोपवीत की पूजा प्रतिष्ठा के लिए एक माला (108 बार) गायत्री मंत्र का नित्य जप करना, 3. कण्ठ से बिना बाहर निकाले ही साबुन आदि से उसे धोना, 4. एक भी लड़ टूट जाने पर उसे निकाल कर दूसरा पहनना, 5. घर में जन्म-मरण, सूतक, हो जाने या छ: महीने बीत जाने पर पुराना जनेऊ हटाकर नया पहनना, 6. चाबी आदि कोई वस्तु उसमें न बाँधना-इन नियमों का पालन करना चाहिए। . यज्ञोपवीत संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त :> शास्त्र के अनुसार मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष और मिथुन ये सभी सूर्य मास शुभ माने गए हैं। इनमे से मीन का सौर मास सर्वोत्तम माना गया है। विद्वानों का मत है कि ज्येष्ठ पुत्र का उपनयन सूर्य के वृष राशिस्थ होने पर करना चाहिए (Sun is for Taurus Rashi)। सूर्य के मिथुन राशि(sun of गेमेनिए) में होने पर क्षत्रिय कुमार और वैश्य कुमार का उपनयन करना ठीक रहता है। यज्ञोपवीत संस्कार के लिए शुभ नक्षत्र :> उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य अभिजीत, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, घनिष्ठा और शतभिषा हो तो शुभ माना जाता है। ब्राह्मण कुमार के लिए पुनर्वसु शुभ नहीं माना जाता है। उपनयन संस्कार के लिए शुभ तिथि :> इस संस्कार के लिए शुभ तिथि के रूप मे द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी और द्वादशी तथा कृष्णपक्ष द्वितीया, तृतीया और पंचमी तिथि का नाम लिया जाता है। इसके अलावा रिक्ता तिथियां (चतुर्थ, नवम, चतुर्दशी) व प्रतिपदा, सप्तमी, अष्टमी, त्रयोदशी, पूर्णिमा व अमवस्या तिथि भी इस संस्कार हेतु वर्जित है। उपनयन संस्कार के लिए शुभ वार :> यज्ञोपवीत संस्कार के लिए रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पति, शुक्रवार को उत्तम और शुभ माना जाता है यज्ञोपवीत संस्कार के लिए शुभ लग्न :> उपनयन मुहुर्त के लिए बलवान लग्न शुभ माना जाता है। जिसके केन्द्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम) तथा त्रिकोण (पंचम, नवम) भाव में शुभ ग्रह तथा तृतीय, षष्टम व एकादश में पाप ग्रह स्थित हों तो उपनयन संस्कार के लिए शुभ माना जाता है। लग्नेश, चन्द्रमा, गुरू व शुक्र छठे, आठवें भाव में न हो तथा यदि चन्द्रमा लग्न, स्वराशि या उच्च राशि में हो तो शुभ स्थिति होती है। उपनयन लग्न एवं चन्द्रमा बुध, बृहस्पति या शुक्र नवमांश में होना इस संस्कार हेतु सर्वथा उपयुक्त है। यज्ञोपवीत संस्कार के लिए निषेध (Nishedh): ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि उपनयन संस्कार के लिए जन्म चन्द्र से गोचर में स्थित चतुर्थ, अष्टम, द्वादश वां चन्द्र एवं तृतीय, पंचम एवं सप्तम तारा से बचना चाहिए। चन्द्रमा और तारा की शुद्धि इस संस्कार हेतु बहुत ही जरूरी है।

शास्त्रानुसार, यज्ञोपवीत क्यों और इसके नियम:
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यज्ञोपवीत द्विजत्व का चिन्ह है। कहा भी है-
मातुरग्रेऽधिजननम् द्वितीयम् मौञ्जि बन्धनम्।
अर्थात्-पहला जन्म माता के उदर से और दूसरा यज्ञोपवीत धारण से होता है।
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणम् कृणुते गर्भमन्त:।
त रात्रीस्तिस्र उदरे विभत्ति तं जातंद्रष्टुमभि संयन्ति देवा:।।
अथर्व 11/3/5/3
अर्थात्-गर्भ में रहकर माता और पिता के संबंध से मनुष्य का पहला जन्म होता है। दूसरा जन्म विद्या रूपी माता और आचार्य रूप पिता द्वारा गुरुकुल में उपनयन और विद्याभ्यास द्वारा होता है।
‘‘सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र’’ में लिखा है कि यज्ञोपवीत के नौ धागों में नौ देवता निवास करते हैं।
(1) ओउमकार
(2) अग्नि
(3) अनन्त
(4) चन्द्र
(5) पितृ
(6) प्रजापति
(7) वायु
(8) सूर्य
(9) सब देवताओं का समूह।
वेद मंत्रों से अभिमंत्रित एवं संस्कारपूर्वक कराये यज्ञोपवीत में 9 शक्तियों का निवास होता है। जिस शरीर पर ऐसी समस्त देवों की सम्मिलित प्रतिमा की स्थापना है, उस शरीर रूपी देवालय को परम श्रेय साधना ही समझना चाहिए।
‘‘सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र’’ में यज्ञोपवीत के संबंध में एक और महत्वपूर्ण उल्लेख है-
ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणी कृतम्।
कृतो ग्रन्थिस्त्रनेत्रेण गायत्र्याचाभि मन्त्रितम्।।
अर्थात्-ब्रह्माजी ने तीन वेदों से तीन धागे का सूत्र बनाया। विष्णु ने ज्ञान, कर्म, उपासना इन तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी ने गायत्री से अभिमंत्रित कर उसे ब्रह्म गाँठ लगा दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार और ग्रंथियों समेत बनकर तैयार हुआ।
यज्ञोपवीत के लाभों का वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है-
येनेन्द्राय वृहस्पतिवृर्व्यस्त: पर्यद धाद मृतं नेनत्वा।
परिदधाम्यायुष्ये दीर्घायुत्वाय वलायि वर्चसे।।
पारस्कर गृह सूत्र 2/2/7
‘‘जिस प्रकार इन्द्र को वृहस्पति ने यज्ञोपवीत दिया था उसी तरह आयु, बल, बुद्धि और सम्पत्ति की वृद्धि के लिए यज्ञोपवीत पहना जाय।’’
देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तत्रपृषयस्तपसे ये निषेदु:।
भीमा जन्या ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धां दधति परमे व्योमन्।।
ऋग्वेद 10/101/4
अर्थात-तपस्वी ऋषि और देवतागणों ने कहा कि यज्ञोपवीत की शक्ति महान है। यह शक्ति शुद्ध चरित्र और कठिन कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देती है। इस यज्ञोपवीत को धारण करने से जीव-जन भी परम पद को पहुँच जाते हैं।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रति मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज:।।
-ब्रह्मोपनिषद्
अर्थात- यज्ञोपवीत परम पवित्र है, प्रजापति ईश्वर ने इसे सबके लिए सहज बनाया है। यह आयुवर्धक, स्फूर्तिदायक, बन्धनों से छुड़ाने वाला एवं पवित्रता, बल और तेज देता है।
त्रिरस्यता परमा सन्ति सत्या स्यार्हा देवस्य जनि मान्यग्ने:।
अनन्ते अन्त: परिवीत आगाच्छुचि: शुक्रो अर्थो रोरुचान:।।
-4/1/7
अर्थात- इस यज्ञोपवीत के परम श्रेष्ठ तीन लक्षण है। 1. सत्य व्यवहार की आकांक्षा
2. अग्नि जैसी तेजस्विता
3. दिव्य गुणों से युक्त प्रसन्नता इसके द्वारा भली प्रकार प्राप्त होती है।
नौ धागों में नौ गुणों के प्रतीक हैं।
1. अहिंसा
2. सत्य
3. अस्तेय
4. तितिक्षा
5. अपरिग्रह
6. संयम
7. आस्तिकता
8. शान्ति
9. पवित्रता।
1. हृदय से प्रेम
2. वाणी में माधुर्य
3. व्यवहार में सरलता
4. नारी मात्र में मातृत्व की भावना
5. कर्म में कला और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति
6. सबके प्रति उदारता और सेवा भावना
7. गुरुजनों का सम्मान एवं अनुशासन
8. सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय एवं सत्संग
9. स्वच्छता, व्यवस्था और निरालस्यता का स्वभाव।
यह भी नौ गुण बताये गये हैं। अभिनव संस्कार पद्धति में श्लोक भी दिये गये हैं।
यज्ञोपवीत पहनने का अर्थ है-नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को अपने कन्धों पर परम पवित्र उत्तरदायित्व के रूप में अनुभव करते रहना। अपनी गतिविधियों का सारा ढाँचा इस आदर्शवादिता के अनुरुप ही खड़ा करना। इस उत्तरदायित्व के अनुभव करते रहने की प्रेरणा का यह प्रतीक सत्र धारण किये रहने प्रत्येक हिन्दू का आवश्यक धर्म-कर्तव्य माना गया है। इस लक्ष्य से अवगत कराने के लिए समारोहपूर्वक उपनयन किया जाता है।
विधि व्यवस्था
बालक जब थोड़ा सदाचार हो जाय और यज्ञोपवीत के आदर्शों को समझने एवं नियमों को पालने योग्य हो जाय तो उसका उपनयन संस्कार कराना चाहिए। साधारणतया 12 से 13 वर्ष की आयु इसके लिए ठीक है। जिनका तब तक न हुआ हो तो वे कभी भी करा सकते हैं। जिन महिलाओं की गोदी में छोटे बच्चे नहीं वे भी उसे धारण कर सकती है। जो पहने उन्हें
1. मल-मूत्र त्यागते समय जनेऊ को कान पर चढ़ाना
2. गायत्री की प्रतिमा यज्ञोपवीत की पूजा प्रतिष्ठा के लिए एक माला (108 बार) गायत्री मंत्र का नित्य जप करना,
3. कण्ठ से बिना बाहर निकाले ही साबुन आदि से उसे धोना,
4. एक भी लड़ टूट जाने पर उसे निकाल कर दूसरा पहनना,
5. घर में जन्म-मरण, सूतक, हो जाने या छ: महीने बीत जाने पर पुराना जनेऊ हटाकर नया पहनना,
6. चाबी आदि कोई वस्तु उसमें न बाँधना-इन नियमों का पालन करना चाहिए।
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यज्ञोपवीत संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त :>

शास्त्र के अनुसार मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष और मिथुन ये सभी सूर्य मास शुभ माने गए हैं। इनमे से मीन का सौर मास सर्वोत्तम माना गया है। विद्वानों का मत है कि ज्येष्ठ पुत्र का उपनयन सूर्य के वृष राशिस्थ होने पर करना चाहिए (Sun is for Taurus Rashi)। सूर्य के मिथुन राशि(sun of गेमेनिए) में होने पर क्षत्रिय कुमार और वैश्य कुमार का उपनयन करना ठीक रहता है।

यज्ञोपवीत संस्कार के लिए शुभ नक्षत्र :>

उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य अभिजीत, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, घनिष्ठा और शतभिषा हो तो शुभ माना जाता है। ब्राह्मण कुमार के लिए पुनर्वसु शुभ नहीं माना जाता है।

उपनयन संस्कार के लिए शुभ तिथि :>

इस संस्कार के लिए शुभ तिथि के रूप मे द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी और द्वादशी तथा कृष्णपक्ष द्वितीया, तृतीया और पंचमी तिथि का नाम लिया जाता है। इसके अलावा रिक्ता तिथियां (चतुर्थ, नवम, चतुर्दशी) व प्रतिपदा, सप्तमी, अष्टमी, त्रयोदशी, पूर्णिमा व अमवस्या तिथि भी इस संस्कार हेतु वर्जित है।

उपनयन संस्कार के लिए शुभ वार :>

यज्ञोपवीत संस्कार के लिए रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पति, शुक्रवार को उत्तम और शुभ माना जाता है

यज्ञोपवीत संस्कार के लिए शुभ लग्न :>

उपनयन मुहुर्त

के लिए बलवान लग्न शुभ माना जाता है। जिसके केन्द्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम) तथा त्रिकोण (पंचम, नवम) भाव में शुभ ग्रह तथा तृतीय, षष्टम व एकादश में पाप ग्रह स्थित हों तो उपनयन संस्कार के लिए शुभ माना जाता है। लग्नेश, चन्द्रमा, गुरू व शुक्र छठे, आठवें भाव में न हो तथा यदि चन्द्रमा लग्न, स्वराशि या उच्च राशि में हो तो शुभ स्थिति होती है। उपनयन लग्न एवं
चन्द्रमा बुध, बृहस्पति या शुक्र नवमांश में होना इस संस्कार हेतु सर्वथा उपयुक्त है।

यज्ञोपवीत संस्कार के लिए निषेध (Nishedh):
ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि उपनयन संस्कार के लिए जन्म चन्द्र से गोचर में स्थित चतुर्थ, अष्टम, द्वादश वां चन्द्र एवं तृतीय, पंचम एवं सप्तम तारा से बचना चाहिए। चन्द्रमा और तारा की शुद्धि इस संस्कार हेतु बहुत ही जरूरी है।

दधिची ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था ! उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग ! जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता ! सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था ! और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था ! परन्तु... वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था ! इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था ! ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था ... जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था ! इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से ! लेकिन ...... दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था ?????? क्या उनका सन्देश यही था कि... उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और दुश्मन को भाई-भौजाई बना ले....?? धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि.. '' हे हिन्दू वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !' बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है ! राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए बस एक ही मार्ग है ! हथियार उठाओ ..राष्ट्र और धर्म के शत्रुओं से युद्ध करो ! जय महाकाल.

दधिची ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था !
उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग !

जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था !

परन्तु... वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !
इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !

ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था ... जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !
इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था!
इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था !
और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !
लेकिन ......

दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था ??????
क्या उनका सन्देश यही था कि...

उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और दुश्मन को भाई-भौजाई बना ले....??

धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि..

'' हे हिन्दू वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !'

बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है !
राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए बस एक ही मार्ग है !

हथियार उठाओ ..राष्ट्र और धर्म के शत्रुओं से युद्ध करो !

जय महाकाल.

पिता के सच्चे पुत्र श्रीगणेश भगवान शिव को माता पार्वती से मिलने का समय बहुत कम मिलता था अधिक समय वो ध्यान में रहते थे और कभी देवकार्य के लिए अभियानों में। भगवान श्रीगणेश इस बात को भलीभांति समझते थे सो जब भी शिव और पार्वती साथ होते तो वो किसी को पार्वती माता के महल में जाने ही नहीं देते थे जब तक कि माता या पिता आज्ञा नहीं देते थे। एक बार ऐसे समय वहां परशुराम पहुंच गए हमारे लाडले भगवान श्रीगणेश ने उनको साफ कह दिया कि वो न तो अंदर जाएंगे न परशुराम को जाने देंगे। इस बात पर वाद-विवाद शुरू हो गया जब ये बढ़ गया तो श्रीगणेश ने परशुराम को सूंड में लपेटकर फेंक दिया। परशुराम पूरे पाताल का भ्रमण करने निकल गये जब गति कम हुई तो वो वापस वहां पहुंच गये। पुन: विवाद होने लगा श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया अब वो भूमंडल का भ्रमण करने निकल गये गति कम होने पर वो वापस पहुंच गये।श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया और वो अब ब्रम्हांड में चले गये वहां से भी जब वो वापस आ गये तो वो अत्यंत क्रोधित हो गये और अपने आराध्य शिव का नाम लेकर परशु फेंका। श्रीगणेश परशु को नष्ट कर सकते थे पर पिता नाम सुनकर उनके नाम का मान रखने के लिए श्रीगणेश ने उसे दांत पर झेल लिया और उनका दांत टूट गया। इस कथा से पता चलता है हमारे श्रीगणेश कितने विनम्र और पिता के नाम का आदर करने वाले थे।

पिता के सच्चे पुत्र श्रीगणेश
भगवान शिव को माता पार्वती से मिलने का समय बहुत कम मिलता था अधिक समय वो ध्यान में रहते थे और कभी देवकार्य के लिए अभियानों में। भगवान श्रीगणेश इस बात को भलीभांति समझते थे सो जब भी शिव और पार्वती साथ होते तो वो किसी को पार्वती माता के महल में जाने ही नहीं देते थे जब तक कि माता या पिता आज्ञा नहीं देते थे। एक बार ऐसे समय वहां परशुराम पहुंच गए हमारे लाडले भगवान श्रीगणेश ने उनको साफ कह दिया कि वो न तो अंदर जाएंगे न परशुराम को जाने देंगे। इस बात पर वाद-विवाद शुरू हो गया जब ये बढ़ गया तो श्रीगणेश ने परशुराम को सूंड में लपेटकर फेंक दिया। परशुराम पूरे पाताल का भ्रमण करने निकल गये जब गति कम हुई तो वो वापस वहां पहुंच गये। पुन: विवाद होने लगा श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया अब वो भूमंडल का भ्रमण करने निकल गये गति कम होने पर वो वापस पहुंच गये।श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया और वो अब ब्रम्हांड में चले गये वहां से भी जब वो वापस आ गये तो वो अत्यंत क्रोधित हो गये और अपने आराध्य शिव का नाम लेकर परशु फेंका। श्रीगणेश परशु को नष्ट कर सकते थे पर पिता नाम सुनकर उनके नाम का मान रखने के लिए श्रीगणेश ने उसे दांत पर झेल लिया और उनका दांत टूट गया। इस कथा से पता चलता है हमारे श्रीगणेश कितने विनम्र और पिता के नाम का आदर करने वाले थे।

तृतीय केदार बाबा तुंगनाथ तुंगनाथ दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे। तुगंनाथ पंचकेदारों में तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है। यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं। व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए। कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है। पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चन्द्रशिला चोटी के शीर्ष से, नंददेवी, पंच चली, बंदरपुंछ, केदारनाथ, चौखंबा और नीलेकंठ के हिमाचल पर्वत के हिमालय पर्वत के पेंटस्क्रेज़ के दृश्य, और एक तरफ गढ़वाल घाटी का साक्षी हो सकता है। ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इस दौरान भगवान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है। जय देवभूमि जय उत्तराखंड

तृतीय केदार

बाबा तुंगनाथ

तुंगनाथ दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है

देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे।
तुगंनाथ पंचकेदारों में तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है।  यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है।  कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं।

व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए।
कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है।

कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है।

पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चन्द्रशिला चोटी के शीर्ष से, नंददेवी, पंच चली, बंदरपुंछ, केदारनाथ, चौखंबा और नीलेकंठ के हिमाचल पर्वत के हिमालय पर्वत के पेंटस्क्रेज़ के दृश्य, और एक तरफ गढ़वाल घाटी का साक्षी हो सकता है।

ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इस दौरान भगवान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है।

जय देवभूमि जय उत्तराखंड

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं? कृष्ण का उत्तर कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। कृष्ण का उत्तर बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े। कृष्ण का उत्तर मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया। कृष्ण का उत्तर तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया। कृष्ण का उत्तर अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा। कृष्ण का उत्तर अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। कृष्ण का उत्तर किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं?

कृष्ण का उत्तर

कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा।

कृष्ण का उत्तर

बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े।

कृष्ण का उत्तर

मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया।

कृष्ण का उत्तर

तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया।

कृष्ण का उत्तर

अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा।

कृष्ण का उत्तर

अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है।

कृष्ण का उत्तर

किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं? कृष्ण का उत्तर कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। कृष्ण का उत्तर बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े। कृष्ण का उत्तर मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया। कृष्ण का उत्तर तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया। कृष्ण का उत्तर अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा। कृष्ण का उत्तर अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। कृष्ण का उत्तर किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं?

कृष्ण का उत्तर

कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा।

कृष्ण का उत्तर

बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े।

कृष्ण का उत्तर

मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया।

कृष्ण का उत्तर

तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया।

कृष्ण का उत्तर

अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा।

कृष्ण का उत्तर

अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है।

कृष्ण का उत्तर

किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!