Friday, May 25, 2018

दधिची ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था ! उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग ! जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता ! सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था ! और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था ! परन्तु... वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था ! इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था ! ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था ... जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था ! इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से ! लेकिन ...... दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था ?????? क्या उनका सन्देश यही था कि... उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और दुश्मन को भाई-भौजाई बना ले....?? धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि.. '' हे हिन्दू वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !' बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है ! राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए बस एक ही मार्ग है ! हथियार उठाओ ..राष्ट्र और धर्म के शत्रुओं से युद्ध करो ! जय महाकाल.

दधिची ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था !
उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग !

जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था !

परन्तु... वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !
इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !

ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था ... जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !
इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था!
इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था !
और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !
लेकिन ......

दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था ??????
क्या उनका सन्देश यही था कि...

उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और दुश्मन को भाई-भौजाई बना ले....??

धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि..

'' हे हिन्दू वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !'

बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है !
राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए बस एक ही मार्ग है !

हथियार उठाओ ..राष्ट्र और धर्म के शत्रुओं से युद्ध करो !

जय महाकाल.

पिता के सच्चे पुत्र श्रीगणेश भगवान शिव को माता पार्वती से मिलने का समय बहुत कम मिलता था अधिक समय वो ध्यान में रहते थे और कभी देवकार्य के लिए अभियानों में। भगवान श्रीगणेश इस बात को भलीभांति समझते थे सो जब भी शिव और पार्वती साथ होते तो वो किसी को पार्वती माता के महल में जाने ही नहीं देते थे जब तक कि माता या पिता आज्ञा नहीं देते थे। एक बार ऐसे समय वहां परशुराम पहुंच गए हमारे लाडले भगवान श्रीगणेश ने उनको साफ कह दिया कि वो न तो अंदर जाएंगे न परशुराम को जाने देंगे। इस बात पर वाद-विवाद शुरू हो गया जब ये बढ़ गया तो श्रीगणेश ने परशुराम को सूंड में लपेटकर फेंक दिया। परशुराम पूरे पाताल का भ्रमण करने निकल गये जब गति कम हुई तो वो वापस वहां पहुंच गये। पुन: विवाद होने लगा श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया अब वो भूमंडल का भ्रमण करने निकल गये गति कम होने पर वो वापस पहुंच गये।श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया और वो अब ब्रम्हांड में चले गये वहां से भी जब वो वापस आ गये तो वो अत्यंत क्रोधित हो गये और अपने आराध्य शिव का नाम लेकर परशु फेंका। श्रीगणेश परशु को नष्ट कर सकते थे पर पिता नाम सुनकर उनके नाम का मान रखने के लिए श्रीगणेश ने उसे दांत पर झेल लिया और उनका दांत टूट गया। इस कथा से पता चलता है हमारे श्रीगणेश कितने विनम्र और पिता के नाम का आदर करने वाले थे।

पिता के सच्चे पुत्र श्रीगणेश
भगवान शिव को माता पार्वती से मिलने का समय बहुत कम मिलता था अधिक समय वो ध्यान में रहते थे और कभी देवकार्य के लिए अभियानों में। भगवान श्रीगणेश इस बात को भलीभांति समझते थे सो जब भी शिव और पार्वती साथ होते तो वो किसी को पार्वती माता के महल में जाने ही नहीं देते थे जब तक कि माता या पिता आज्ञा नहीं देते थे। एक बार ऐसे समय वहां परशुराम पहुंच गए हमारे लाडले भगवान श्रीगणेश ने उनको साफ कह दिया कि वो न तो अंदर जाएंगे न परशुराम को जाने देंगे। इस बात पर वाद-विवाद शुरू हो गया जब ये बढ़ गया तो श्रीगणेश ने परशुराम को सूंड में लपेटकर फेंक दिया। परशुराम पूरे पाताल का भ्रमण करने निकल गये जब गति कम हुई तो वो वापस वहां पहुंच गये। पुन: विवाद होने लगा श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया अब वो भूमंडल का भ्रमण करने निकल गये गति कम होने पर वो वापस पहुंच गये।श्रीगणेश ने फिर से उनको उछाल दिया और वो अब ब्रम्हांड में चले गये वहां से भी जब वो वापस आ गये तो वो अत्यंत क्रोधित हो गये और अपने आराध्य शिव का नाम लेकर परशु फेंका। श्रीगणेश परशु को नष्ट कर सकते थे पर पिता नाम सुनकर उनके नाम का मान रखने के लिए श्रीगणेश ने उसे दांत पर झेल लिया और उनका दांत टूट गया। इस कथा से पता चलता है हमारे श्रीगणेश कितने विनम्र और पिता के नाम का आदर करने वाले थे।

तृतीय केदार बाबा तुंगनाथ तुंगनाथ दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे। तुगंनाथ पंचकेदारों में तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है। यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं। व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए। कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है। पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चन्द्रशिला चोटी के शीर्ष से, नंददेवी, पंच चली, बंदरपुंछ, केदारनाथ, चौखंबा और नीलेकंठ के हिमाचल पर्वत के हिमालय पर्वत के पेंटस्क्रेज़ के दृश्य, और एक तरफ गढ़वाल घाटी का साक्षी हो सकता है। ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इस दौरान भगवान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है। जय देवभूमि जय उत्तराखंड

तृतीय केदार

बाबा तुंगनाथ

तुंगनाथ दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है

देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे।
तुगंनाथ पंचकेदारों में तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है।  यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है।  कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं।

व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए।
कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है।

कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है।

पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चन्द्रशिला चोटी के शीर्ष से, नंददेवी, पंच चली, बंदरपुंछ, केदारनाथ, चौखंबा और नीलेकंठ के हिमाचल पर्वत के हिमालय पर्वत के पेंटस्क्रेज़ के दृश्य, और एक तरफ गढ़वाल घाटी का साक्षी हो सकता है।

ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इस दौरान भगवान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है।

जय देवभूमि जय उत्तराखंड

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं? कृष्ण का उत्तर कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। कृष्ण का उत्तर बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े। कृष्ण का उत्तर मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया। कृष्ण का उत्तर तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया। कृष्ण का उत्तर अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा। कृष्ण का उत्तर अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। कृष्ण का उत्तर किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं?

कृष्ण का उत्तर

कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा।

कृष्ण का उत्तर

बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े।

कृष्ण का उत्तर

मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया।

कृष्ण का उत्तर

तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया।

कृष्ण का उत्तर

अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा।

कृष्ण का उत्तर

अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है।

कृष्ण का उत्तर

किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं? कृष्ण का उत्तर कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। कृष्ण का उत्तर बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े। कृष्ण का उत्तर मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया। कृष्ण का उत्तर तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया। कृष्ण का उत्तर अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा। कृष्ण का उत्तर अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। कृष्ण का उत्तर किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं?

कृष्ण का उत्तर

कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा।

कृष्ण का उत्तर

बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े।

कृष्ण का उत्तर

मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया।

कृष्ण का उत्तर

तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया।

कृष्ण का उत्तर

अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा।

कृष्ण का उत्तर

अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है।

कृष्ण का उत्तर

किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

*सुन्दरकाण्ड का इतना माहात्म्य क्यों है? तुलसीदासजी रामकथा लिख रहे थे। हनुमानजी भगवान श्रीराम को अपने आत्मज से ज़्यादा प्रिय थे। प्रभु ने सोचा कि भक्त के मान में मेरा सम्मान है। हनुमानजी के माहात्म्य से संसार को परिचित कराने का ऐसा अवसर कहाँ मिलेगा! प्रभु ने अपना प्रभाव दिखाया। रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड को लिखते-लिखते तुलसी हनुमानजी को श्रीराम के समान सामर्थ्यवान लिख गए। तुलसीबाबा जितनी भी रामकथा लिखते उसे हनुमानजी को सौंप देते। कथा देखने के बाद हनुमानजी अनुमोदन करते थे। कहते हैं सुंदरकांड बजरंग बली भड़क गए कि भक्त को स्वामी के सामान प्रतापी कैसे लिख दिया? आगबबूले होकर वह इसे फाड़ने ही वाले थे कि श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिए और कहा- यह अध्याय मैंने स्वयं लिखा है पवनपुत्र, क्या मैं मिथ्या कहूँगा? इस विप्र का क्या दोष? हनुमानजी नतमस्तक हो गए- प्रभु आप कह रहे हैं तो यही सही है। मुझे मानस में सुंदरकांड सर्वाधिक प्रिय रहेगा। इसलिए सुंदरकांड के पाठ का इतना माहात्म्य है। सुन्दरकाण्ड का पाठ करने वाले के कष्ट हरने को तत्पर रहते हैं श्रीहनुमान। यदि रोज़ संभव न हो तो कम से कम मंगलवार या शनिवार को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। सनातन ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रभु शरणम् का प्रयास यदि पसंद आता है तो आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि इसे फैलाने में सहयोग करें। हमारे पोस्ट ज़रूर शेयर कर दिया करें। इससे प्रभुनाम के गुणगान में हमारा हौसला बढ़ता है। हनुमद् कृपा के लिए लिखें- 🌹।।जय सियाराम जय जय हनुमान।।🌹*

*सुन्दरकाण्ड का इतना माहात्म्य क्यों है? तुलसीदासजी रामकथा लिख रहे थे। हनुमानजी भगवान श्रीराम को अपने आत्मज से ज़्यादा प्रिय थे। प्रभु ने सोचा कि भक्त के मान में मेरा सम्मान है। हनुमानजी के माहात्म्य से संसार को परिचित कराने का ऐसा अवसर कहाँ मिलेगा! प्रभु ने अपना प्रभाव दिखाया। रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड को लिखते-लिखते तुलसी हनुमानजी को श्रीराम के समान सामर्थ्यवान लिख गए। तुलसीबाबा जितनी भी रामकथा लिखते उसे हनुमानजी को सौंप देते। कथा देखने के बाद हनुमानजी अनुमोदन करते थे। कहते हैं सुंदरकांड बजरंग बली भड़क गए कि भक्त को स्वामी के सामान प्रतापी कैसे लिख दिया? आगबबूले होकर वह इसे फाड़ने ही वाले थे कि श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिए और कहा- यह अध्याय मैंने स्वयं लिखा है पवनपुत्र, क्या मैं मिथ्या कहूँगा? इस विप्र का क्या दोष? हनुमानजी नतमस्तक हो गए- प्रभु आप कह रहे हैं तो यही सही है। मुझे मानस में सुंदरकांड सर्वाधिक प्रिय रहेगा। इसलिए सुंदरकांड के पाठ का इतना माहात्म्य है। सुन्दरकाण्ड का पाठ करने वाले के कष्ट हरने को तत्पर रहते हैं श्रीहनुमान। यदि रोज़ संभव न हो तो कम से कम मंगलवार या शनिवार को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। सनातन ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रभु शरणम् का प्रयास यदि पसंद आता है तो आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि इसे फैलाने में सहयोग करें। हमारे पोस्ट ज़रूर शेयर कर दिया करें। इससे प्रभुनाम के गुणगान में हमारा हौसला बढ़ता है। हनुमद् कृपा के लिए लिखें- 🌹।।जय सियाराम जय जय हनुमान।।🌹*

शाही स्नान का महात्मय..... . शाही स्नान का पर्व था। राम घाट पर भारी भीड़ लग रही थी। शिव पार्वती आकाश से गुजरे। पार्वती ने इतनी भीड़ का कारण पूछा - आशुतोष ने कहा - सिंघस्त कुम्भ पर्व पर शाही स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है। उसी लाभ के लिए यह स्नानार्थियों की भीड़ जमा है। पार्वती का कौतूहल तो शान्त हो गया पर नया संदेह उपज पड़ा, इतनी भीड़ के लायक स्वर्ग में स्थान कहाँ है? फिर लाखों वर्षों से लाखों लाख लोग इस आधार पर स्वर्ग पहुँचते तो उनके लिए स्थान भी तो कहीं रहता? छोटे से स्वर्ग में यह कैसे बनेगा? भगवती ने अपनानया सन्देह प्रकट किया और समाधान चाहा। भगवान शिव बोले - शरीर को गीला करना एक बात है और मन की मलीनता धोने वाला स्नान जरूरी है। मन को धोने वाले ही स्वर्ग जाते हैं। वैसे लोग जो होंगे उन्हीं को स्वर्ग मिलेगा। सन्देह घटा नहीं, बढ़ गया। पार्वती बोलीं - यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया किसने मन संजोया। यह कार्य से जाना जाता है। शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर प्रत्यक्ष उदाहरण से लक्ष्य समझाने का प्रयत्न किया। मार्ग में शिव कुरूप कोढ़ी बनकर पढ़ रहे। पार्वती को और भी सुन्दर सजा दिया। दोनों बैठे थे। स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती। अनमेल स्थिति के बारे में पूछताछ करती। पार्वती जी रटाया हुआ विवरण सुनाती रहतीं। यह कोढ़ी मेरा पति है। गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं। गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ। बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं। अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती। वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते। पार्वती लज्जा से गढ़ गई। भला ऐसे भी लोग स्नान को आते हैं क्या? निराशा देखते ही बनती थी। संध्या हो चली। एक उदारचेता आए। विवरण सुना तो आँखों में आँसू भर लाए। सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर तट तक पहुँचाया। जो सत्तू साथ में था उसमें से उन दोनों को भी खिलाया। साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा - आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं। धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं। प्रयोजन पूरा हुआ। शिव पार्वती उठे और कैलाश की ओर चले गए। रास्ते में कहा - पार्वती इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसने मन धोया और स्वर्ग का रास्ता बनाया। स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है। पार्वती तो समझ गई कि स्नान महात्म्य सही होते हुए भी... क्यों लोग उसके पुण्य फल से वंचित रहते हैं? 

शाही स्नान का महात्मय.....
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शाही स्नान का पर्व था। राम घाट पर भारी भीड़ लग रही थी।
शिव पार्वती आकाश से गुजरे। पार्वती ने इतनी भीड़ का कारण पूछा - आशुतोष ने कहा - सिंघस्त कुम्भ पर्व पर शाही स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है। उसी लाभ के लिए यह स्नानार्थियों की भीड़ जमा है।
पार्वती का कौतूहल तो शान्त हो गया पर नया संदेह उपज पड़ा, इतनी भीड़ के लायक स्वर्ग में स्थान कहाँ है? फिर लाखों वर्षों से लाखों लाख लोग इस आधार पर स्वर्ग पहुँचते तो उनके लिए स्थान भी तो कहीं रहता?
छोटे से स्वर्ग में यह कैसे बनेगा? भगवती ने अपनानया सन्देह प्रकट किया और समाधान चाहा।
भगवान शिव बोले - शरीर को गीला करना एक बात है और मन की मलीनता धोने वाला स्नान जरूरी है। मन को धोने वाले ही स्वर्ग जाते हैं। वैसे लोग जो होंगे उन्हीं को स्वर्ग मिलेगा।
सन्देह घटा नहीं, बढ़ गया।
पार्वती बोलीं - यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया किसने मन संजोया।
यह कार्य से जाना जाता है। शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर प्रत्यक्ष उदाहरण से लक्ष्य समझाने का प्रयत्न किया।
मार्ग में शिव कुरूप कोढ़ी बनकर पढ़ रहे। पार्वती को और भी सुन्दर सजा दिया। दोनों बैठे थे। स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती। अनमेल स्थिति के बारे में पूछताछ करती।
पार्वती जी रटाया हुआ विवरण सुनाती रहतीं। यह कोढ़ी मेरा पति है। गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं। गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ। बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं।
अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती। वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते।
पार्वती लज्जा से गढ़ गई। भला ऐसे भी लोग स्नान को आते हैं क्या? निराशा देखते ही बनती थी।
संध्या हो चली। एक उदारचेता आए। विवरण सुना तो आँखों में आँसू भर लाए। सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर तट तक पहुँचाया। जो सत्तू साथ में था उसमें से उन दोनों को भी खिलाया।
साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा - आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं। धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं।
प्रयोजन पूरा हुआ। शिव पार्वती उठे और कैलाश की ओर चले गए। रास्ते में कहा - पार्वती इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसने मन धोया और स्वर्ग का रास्ता बनाया। स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है।
पार्वती तो समझ गई कि स्नान महात्म्य सही होते हुए भी... क्यों लोग उसके पुण्य फल से वंचित रहते हैं?