Friday, May 25, 2018

तृतीय केदार बाबा तुंगनाथ तुंगनाथ दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे। तुगंनाथ पंचकेदारों में तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है। यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं। व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए। कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है। पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चन्द्रशिला चोटी के शीर्ष से, नंददेवी, पंच चली, बंदरपुंछ, केदारनाथ, चौखंबा और नीलेकंठ के हिमाचल पर्वत के हिमालय पर्वत के पेंटस्क्रेज़ के दृश्य, और एक तरफ गढ़वाल घाटी का साक्षी हो सकता है। ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इस दौरान भगवान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है। जय देवभूमि जय उत्तराखंड

तृतीय केदार

बाबा तुंगनाथ

तुंगनाथ दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है

देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे।
तुगंनाथ पंचकेदारों में तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है।  यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है।  कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं।

व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है) का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए।
कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है।

कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है।

पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चन्द्रशिला चोटी के शीर्ष से, नंददेवी, पंच चली, बंदरपुंछ, केदारनाथ, चौखंबा और नीलेकंठ के हिमाचल पर्वत के हिमालय पर्वत के पेंटस्क्रेज़ के दृश्य, और एक तरफ गढ़वाल घाटी का साक्षी हो सकता है।

ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। इस दौरान भगवान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है।

जय देवभूमि जय उत्तराखंड

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं? कृष्ण का उत्तर कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। कृष्ण का उत्तर बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े। कृष्ण का उत्तर मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया। कृष्ण का उत्तर तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया। कृष्ण का उत्तर अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा। कृष्ण का उत्तर अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। कृष्ण का उत्तर किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं?

कृष्ण का उत्तर

कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा।

कृष्ण का उत्तर

बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े।

कृष्ण का उत्तर

मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया।

कृष्ण का उत्तर

तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया।

कृष्ण का उत्तर

अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा।

कृष्ण का उत्तर

अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है।

कृष्ण का उत्तर

किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था। कृष्ण से कर्ण के प्रश्न द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं? कृष्ण का उत्तर कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। कृष्ण का उत्तर बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े। कृष्ण का उत्तर मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया। कृष्ण का उत्तर तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया। कृष्ण का उत्तर अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा। कृष्ण का उत्तर अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। कृष्ण का उत्तर किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी। कृष्ण का उत्तर इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

कर्ण ने कृष्ण से प्रश्न किए: हे वासुदेव! जन्म लेते ही मेरी माता ने मुझे त्याग दिया, लेकिन शूरवीर पैदा होना भी क्या मेरा अपराध था? गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र शिक्षा केवल इसलिए नहीं दी क्योंकि मैं क्षत्रिय नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

परशुराम ने मुझे युद्ध की शिक्षा दी, लेकिन यह जानने के पश्चात् कि मैं एक क्षत्रिय नहीं हूं उन्होंने भी मुझे हर सीख भूल जाने का श्राप दिया। इतना ही नहीं, भूलवश एक गाय को मेरे तरकश से चला बाण लग गया, तो उसके मालिक ने मुझे श्राप दे दिया, जबकि उसमें मेरा कोई गुनाह नहीं था।

कृष्ण से कर्ण के प्रश्न

द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा अपमान हुआ, यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे सत्य केवल इसलिए बताया ताकि अपने पांडव पुत्रों की रक्षा कर सकें। अपने जीवन में मुझे जो भी मान-सम्मान, वैभव मिला वह सब दुर्योधन ने ही मुझे दिया, तो उसके साथ, उसके लिए युद्ध लड़कर आखिर मैं कहां गलत हूं?

कृष्ण का उत्तर

कर्ण के इन प्रश्नों का उत्तर कृष्ण ने इस प्रकार दिया: हे कुंती पुत्र! कदाचित तुम्हारे साथ बुरा हुआ, किंतु मेरी कथा तुमसे बहुत अलग नहीं है। मेरा जन्म एक कारागार में हुआ और जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु तय कर दी गई। मेरे प्राणों की रक्षा के लिए जन्म लेते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा।

कृष्ण का उत्तर

बाल्यकाल से ही तुम तलवार, घोड़े, रथ, तीर और धनुष के साथ खेलते हुए बड़े हुए और मैं... मुझे गाय, गोबर की महक, झोपड़ी, यहां तक कि चलना सीखने से पहले ही अपने प्राण हरने के प्रयास भी सहने पड़े।

कृष्ण का उत्तर

मेरे पास कोई सेना, कोई शिक्षा नहीं थी, लेकिन मुझपर हमेशा ही उम्मीदों का यह भार था कि मैं सबकी परेशानियां दूर करने के लिए पैदा हुआ हूं। जब तुम सभी अपनी सक्षमताओं के लिए अपने गुरुओं द्वारा प्रशंसा के पात्र बन रहे थे, मुझे अक्षर ज्ञान तक नहीं मिला। सोलहवें साल में मैं ऋषि संदीपनी के गुरुकुल गया।

कृष्ण का उत्तर

तुमने उस कन्या से विवाह किया जिससे तुम प्रेम करते थे, किंतु मैं अपने प्रेम को विवाह की परिणति नहीं दे सका। और तो और, मुझे उन सभी गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मझसे विवाह करना चाहती थीं या जिन्हें मैंने राक्षसों की कैद से मुक्त कराया।

कृष्ण का उत्तर

अपने प्रति हुए इतने अन्यायों के बावजूद तुम शूरवीर कहलाए, किंतु जरासंध से अपने पूरे समुदाय की रक्षा हेतु जब मुझे उन्हें यमुना तट से लेकर जाना पड़ा तो लोगों ने मुझे भगोड़ा और कायर तक कहा।

कृष्ण का उत्तर

अगर दुर्धोयन यह युद्ध जीत गया, अवश्य ही तुम्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा। किंतु युद्धिष्ठिर के युद्ध जीतने के पश्चात भी मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिवा इस युद्ध को कराने का दोषी माना जाने के और इससे हुए विनाशों का उत्तरदायी कहलाने के।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! तुम्हें यह बात सदैव ज्ञात होनी चाहिए कि संसार में हर किसी का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर किसी के जीवन में अन्याय की घड़ियां हैं और कहीं ना कहीं वह अन्याय का शिकार हुआ है। तुम्हारे ही कुल में ना सिर्फ दुर्योधन, किंतु युद्धिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है।

कृष्ण का उत्तर

किंतु सही क्या है यह तुम्हारे अंतर्मन को सदैव ही पता होता है। हमने कितना अन्याय सहा, कितनी बार अपमान की पीड़ा झेली, कितनी बार हमारे कार्यों और हमारी योग्यताओं को ठुकरा दिया गया; इन सबको याद रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह याद करना है कि इन बातों पर उस वक्त हमारी कैसी प्रतिक्रिया थी।

कृष्ण का उत्तर

इसलिए हे कर्ण! मेरा तुमसे यही निवेदन है और तुम्हें सलाह भी है कि।।। अच्छा होगा अगर तुम अपने प्रति हुए अन्यायों की शिकायतें करना बंद कर खुद का विवेचन करो! जीवन ने भले ही तुम्हारे साथ अन्याय किया हो, किंतु यह तुम्हें अधर्म की राह पर चलने की आज्ञा नहीं देता! ये कभी मत भूलना कि अधर्म हर स्थिति में केवल और केवल विनाश का मार्ग है!

*सुन्दरकाण्ड का इतना माहात्म्य क्यों है? तुलसीदासजी रामकथा लिख रहे थे। हनुमानजी भगवान श्रीराम को अपने आत्मज से ज़्यादा प्रिय थे। प्रभु ने सोचा कि भक्त के मान में मेरा सम्मान है। हनुमानजी के माहात्म्य से संसार को परिचित कराने का ऐसा अवसर कहाँ मिलेगा! प्रभु ने अपना प्रभाव दिखाया। रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड को लिखते-लिखते तुलसी हनुमानजी को श्रीराम के समान सामर्थ्यवान लिख गए। तुलसीबाबा जितनी भी रामकथा लिखते उसे हनुमानजी को सौंप देते। कथा देखने के बाद हनुमानजी अनुमोदन करते थे। कहते हैं सुंदरकांड बजरंग बली भड़क गए कि भक्त को स्वामी के सामान प्रतापी कैसे लिख दिया? आगबबूले होकर वह इसे फाड़ने ही वाले थे कि श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिए और कहा- यह अध्याय मैंने स्वयं लिखा है पवनपुत्र, क्या मैं मिथ्या कहूँगा? इस विप्र का क्या दोष? हनुमानजी नतमस्तक हो गए- प्रभु आप कह रहे हैं तो यही सही है। मुझे मानस में सुंदरकांड सर्वाधिक प्रिय रहेगा। इसलिए सुंदरकांड के पाठ का इतना माहात्म्य है। सुन्दरकाण्ड का पाठ करने वाले के कष्ट हरने को तत्पर रहते हैं श्रीहनुमान। यदि रोज़ संभव न हो तो कम से कम मंगलवार या शनिवार को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। सनातन ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रभु शरणम् का प्रयास यदि पसंद आता है तो आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि इसे फैलाने में सहयोग करें। हमारे पोस्ट ज़रूर शेयर कर दिया करें। इससे प्रभुनाम के गुणगान में हमारा हौसला बढ़ता है। हनुमद् कृपा के लिए लिखें- 🌹।।जय सियाराम जय जय हनुमान।।🌹*

*सुन्दरकाण्ड का इतना माहात्म्य क्यों है? तुलसीदासजी रामकथा लिख रहे थे। हनुमानजी भगवान श्रीराम को अपने आत्मज से ज़्यादा प्रिय थे। प्रभु ने सोचा कि भक्त के मान में मेरा सम्मान है। हनुमानजी के माहात्म्य से संसार को परिचित कराने का ऐसा अवसर कहाँ मिलेगा! प्रभु ने अपना प्रभाव दिखाया। रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड को लिखते-लिखते तुलसी हनुमानजी को श्रीराम के समान सामर्थ्यवान लिख गए। तुलसीबाबा जितनी भी रामकथा लिखते उसे हनुमानजी को सौंप देते। कथा देखने के बाद हनुमानजी अनुमोदन करते थे। कहते हैं सुंदरकांड बजरंग बली भड़क गए कि भक्त को स्वामी के सामान प्रतापी कैसे लिख दिया? आगबबूले होकर वह इसे फाड़ने ही वाले थे कि श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिए और कहा- यह अध्याय मैंने स्वयं लिखा है पवनपुत्र, क्या मैं मिथ्या कहूँगा? इस विप्र का क्या दोष? हनुमानजी नतमस्तक हो गए- प्रभु आप कह रहे हैं तो यही सही है। मुझे मानस में सुंदरकांड सर्वाधिक प्रिय रहेगा। इसलिए सुंदरकांड के पाठ का इतना माहात्म्य है। सुन्दरकाण्ड का पाठ करने वाले के कष्ट हरने को तत्पर रहते हैं श्रीहनुमान। यदि रोज़ संभव न हो तो कम से कम मंगलवार या शनिवार को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। सनातन ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रभु शरणम् का प्रयास यदि पसंद आता है तो आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि इसे फैलाने में सहयोग करें। हमारे पोस्ट ज़रूर शेयर कर दिया करें। इससे प्रभुनाम के गुणगान में हमारा हौसला बढ़ता है। हनुमद् कृपा के लिए लिखें- 🌹।।जय सियाराम जय जय हनुमान।।🌹*

शाही स्नान का महात्मय..... . शाही स्नान का पर्व था। राम घाट पर भारी भीड़ लग रही थी। शिव पार्वती आकाश से गुजरे। पार्वती ने इतनी भीड़ का कारण पूछा - आशुतोष ने कहा - सिंघस्त कुम्भ पर्व पर शाही स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है। उसी लाभ के लिए यह स्नानार्थियों की भीड़ जमा है। पार्वती का कौतूहल तो शान्त हो गया पर नया संदेह उपज पड़ा, इतनी भीड़ के लायक स्वर्ग में स्थान कहाँ है? फिर लाखों वर्षों से लाखों लाख लोग इस आधार पर स्वर्ग पहुँचते तो उनके लिए स्थान भी तो कहीं रहता? छोटे से स्वर्ग में यह कैसे बनेगा? भगवती ने अपनानया सन्देह प्रकट किया और समाधान चाहा। भगवान शिव बोले - शरीर को गीला करना एक बात है और मन की मलीनता धोने वाला स्नान जरूरी है। मन को धोने वाले ही स्वर्ग जाते हैं। वैसे लोग जो होंगे उन्हीं को स्वर्ग मिलेगा। सन्देह घटा नहीं, बढ़ गया। पार्वती बोलीं - यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया किसने मन संजोया। यह कार्य से जाना जाता है। शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर प्रत्यक्ष उदाहरण से लक्ष्य समझाने का प्रयत्न किया। मार्ग में शिव कुरूप कोढ़ी बनकर पढ़ रहे। पार्वती को और भी सुन्दर सजा दिया। दोनों बैठे थे। स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती। अनमेल स्थिति के बारे में पूछताछ करती। पार्वती जी रटाया हुआ विवरण सुनाती रहतीं। यह कोढ़ी मेरा पति है। गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं। गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ। बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं। अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती। वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते। पार्वती लज्जा से गढ़ गई। भला ऐसे भी लोग स्नान को आते हैं क्या? निराशा देखते ही बनती थी। संध्या हो चली। एक उदारचेता आए। विवरण सुना तो आँखों में आँसू भर लाए। सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर तट तक पहुँचाया। जो सत्तू साथ में था उसमें से उन दोनों को भी खिलाया। साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा - आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं। धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं। प्रयोजन पूरा हुआ। शिव पार्वती उठे और कैलाश की ओर चले गए। रास्ते में कहा - पार्वती इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसने मन धोया और स्वर्ग का रास्ता बनाया। स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है। पार्वती तो समझ गई कि स्नान महात्म्य सही होते हुए भी... क्यों लोग उसके पुण्य फल से वंचित रहते हैं? 

शाही स्नान का महात्मय.....
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शाही स्नान का पर्व था। राम घाट पर भारी भीड़ लग रही थी।
शिव पार्वती आकाश से गुजरे। पार्वती ने इतनी भीड़ का कारण पूछा - आशुतोष ने कहा - सिंघस्त कुम्भ पर्व पर शाही स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है। उसी लाभ के लिए यह स्नानार्थियों की भीड़ जमा है।
पार्वती का कौतूहल तो शान्त हो गया पर नया संदेह उपज पड़ा, इतनी भीड़ के लायक स्वर्ग में स्थान कहाँ है? फिर लाखों वर्षों से लाखों लाख लोग इस आधार पर स्वर्ग पहुँचते तो उनके लिए स्थान भी तो कहीं रहता?
छोटे से स्वर्ग में यह कैसे बनेगा? भगवती ने अपनानया सन्देह प्रकट किया और समाधान चाहा।
भगवान शिव बोले - शरीर को गीला करना एक बात है और मन की मलीनता धोने वाला स्नान जरूरी है। मन को धोने वाले ही स्वर्ग जाते हैं। वैसे लोग जो होंगे उन्हीं को स्वर्ग मिलेगा।
सन्देह घटा नहीं, बढ़ गया।
पार्वती बोलीं - यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया किसने मन संजोया।
यह कार्य से जाना जाता है। शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर प्रत्यक्ष उदाहरण से लक्ष्य समझाने का प्रयत्न किया।
मार्ग में शिव कुरूप कोढ़ी बनकर पढ़ रहे। पार्वती को और भी सुन्दर सजा दिया। दोनों बैठे थे। स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती। अनमेल स्थिति के बारे में पूछताछ करती।
पार्वती जी रटाया हुआ विवरण सुनाती रहतीं। यह कोढ़ी मेरा पति है। गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं। गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ। बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं।
अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती। वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते।
पार्वती लज्जा से गढ़ गई। भला ऐसे भी लोग स्नान को आते हैं क्या? निराशा देखते ही बनती थी।
संध्या हो चली। एक उदारचेता आए। विवरण सुना तो आँखों में आँसू भर लाए। सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर तट तक पहुँचाया। जो सत्तू साथ में था उसमें से उन दोनों को भी खिलाया।
साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा - आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं। धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं।
प्रयोजन पूरा हुआ। शिव पार्वती उठे और कैलाश की ओर चले गए। रास्ते में कहा - पार्वती इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसने मन धोया और स्वर्ग का रास्ता बनाया। स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है।
पार्वती तो समझ गई कि स्नान महात्म्य सही होते हुए भी... क्यों लोग उसके पुण्य फल से वंचित रहते हैं?

पुरूषोत्तम मास या अधिक (मल)मास 16मई 2018से 13जून2018तक हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मल मास या पुरूषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत की हिंदू धर्मपरायण जनता इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवद् भक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहती है। ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से अनेक गुना अधिक फल मिलता है। यही वजह है कि श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति भक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि यदि यह माह इतना ही प्रभावशाली और पवित्र है, तो यह हर तीन साल में क्यों आता है? आखिर क्यों और किस कारण से इसे इतना पवित्र माना जाता है? इस एक माह को तीन विशिष्ट नामों से क्यों पुकारा जाता है? इसी तरह के तमाम प्रश्न स्वाभाविक रूप से हर जिज्ञासु के मन में आते हैं। तो आज ऐसे ही कई प्रश्नों के उत्तर और अधिकमास को गहराई से जानते हैं- हर तीन साल में क्यों आता है अधिकमास- वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है। मल मास का नाम क्यों दिया गया है? हिंदू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। मलिन मानने के कारण ही इस मास का नाम मल मास पड़ गया है। पुरूषोत्तम मास क्यों और कैसे पड़ा नाम? अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरूषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है। कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने उपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ पुरूषोत्तम मास भी बन गया। मास हर व्यक्ति विशेष अधिकमास को पुरूषोत्तम मास कहे जाने का एक सांकेतिक अर्थ भी है। ऐसा माना जाता है कि यह मास हर व्यक्ति विशेष के लिए तन-मन से पवित्र होने का समय होता है। इस दौरान श्रद्धालुजन व्रत, उपवास, ध्यान, योग और भजन- कीर्तन- मनन में संलग्न रहते हैं और अपने आपको भगवान के प्रति समर्पित कर देते हैं। इस तरह यह समय सामान्य पुरूष से उत्तम बनने का होता है, मन के मैल धोने का होता है। यही वजह है कि इसे पुरूषोत्तम मास का नाम दिया गया है। अधिकमास का पौराणिक आधार क्या है? अधिक मास के लिए पुराणों में बड़ी ही सुंदर कथा सुनने को मिलती है। यह कथा दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से जुड़ी है। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रह्मा जी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरता का वरदान मांगा। चूंकि अमरता का वरदान देना निषिद्ध है, इसीलिए ब्रह्मा जी ने उसे कोई भी अन्य वर मांगने को कहा। तब हिरण्यकश्यप ने वर मांगा कि उसे संसार का कोई नर, नारी, पशु, देवता या असुर मार ना सके। वह वर्ष के 12 महीनों में मृत्यु को प्राप्त ना हो। जब वह मरे, तो ना दिन का समय हो, ना रात का। वह ना किसी अस्त्र से मरे, ना किसी शस्त्र से। उसे ना घर में मारा जा सके, ना ही घर से बाहर मारा जा सके। इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने खुद को भगवान घोषित कर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार यानि आधा पुरूष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर, शाम के समय, देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीन कर उसे मृत्यु के द्वार भेज दिया। अधिकमास का महत्व क्या और क्यों है? हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते हैं। अधिकमास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इस पूरे मास में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और निर्मलता के लिए उद्यत होता है। इस तरह अधिकमास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर परम निर्मलता को प्राप्त कर नई उर्जा से भर जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निराकरण हो जाता है। अधिकमास में क्या करना उचित और संपूर्ण फलदायी होता है आमतौर पर अधिकमास में हिंदू श्रद्धालु व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं, उनके पापों का शमन करते हैं और उनकी समस्त इच्छाएं पूरी करते हैं। 

पुरूषोत्तम मास या अधिक (मल)मास

16मई 2018से 13जून2018तक

हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मल मास या पुरूषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत की हिंदू धर्मपरायण जनता इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवद् भक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहती है। ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से अनेक गुना अधिक फल मिलता है। यही वजह है कि श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति भक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि यदि यह माह इतना ही प्रभावशाली और पवित्र है, तो यह हर तीन साल में क्यों आता है? आखिर क्यों और किस कारण से इसे इतना पवित्र माना जाता है? इस एक माह को तीन विशिष्ट नामों से क्यों पुकारा जाता है? इसी तरह के तमाम प्रश्न स्वाभाविक रूप से हर जिज्ञासु के मन में आते हैं। तो आज ऐसे ही कई प्रश्नों के उत्तर और अधिकमास को गहराई से जानते हैं-

हर तीन साल में क्यों आता है अधिकमास- वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है।

मल मास का नाम क्यों दिया गया है?

हिंदू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। मलिन मानने के कारण ही इस मास का नाम मल मास पड़ गया है।
पुरूषोत्तम मास क्यों और कैसे पड़ा नाम?

अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरूषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है। कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने उपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ पुरूषोत्तम मास भी बन गया।
मास हर व्यक्ति विशेष

अधिकमास को पुरूषोत्तम मास कहे जाने का एक सांकेतिक अर्थ भी है। ऐसा माना जाता है कि यह मास हर व्यक्ति विशेष के लिए तन-मन से पवित्र होने का समय होता है। इस दौरान श्रद्धालुजन व्रत, उपवास, ध्यान, योग और भजन- कीर्तन- मनन में संलग्न रहते हैं और अपने आपको भगवान के प्रति समर्पित कर देते हैं। इस तरह यह समय सामान्य पुरूष से उत्तम बनने का होता है, मन के मैल धोने का होता है। यही वजह है कि इसे पुरूषोत्तम मास का नाम दिया गया है।

अधिकमास का पौराणिक आधार क्या है?

अधिक मास के लिए पुराणों में बड़ी ही सुंदर कथा सुनने को मिलती है। यह कथा दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से जुड़ी है। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रह्मा जी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरता का वरदान मांगा। चूंकि अमरता का वरदान देना निषिद्ध है, इसीलिए ब्रह्मा जी ने उसे कोई भी अन्य वर मांगने को कहा। तब हिरण्यकश्यप ने वर मांगा कि उसे संसार का कोई नर, नारी, पशु, देवता या असुर मार ना सके। वह वर्ष के 12 महीनों में मृत्यु को प्राप्त ना हो। जब वह मरे, तो ना दिन का समय हो, ना रात का। वह ना किसी अस्त्र से मरे, ना किसी शस्त्र से। उसे ना घर में मारा जा सके, ना ही घर से बाहर मारा जा सके। इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने खुद को भगवान घोषित कर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार यानि आधा पुरूष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर, शाम के समय, देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीन कर उसे मृत्यु के द्वार भेज दिया।

अधिकमास का महत्व क्या और क्यों है?

हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते हैं। अधिकमास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इस पूरे मास में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और निर्मलता के लिए उद्यत होता है। इस तरह अधिकमास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर परम निर्मलता को प्राप्त कर नई उर्जा से भर जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निराकरण हो जाता है।

अधिकमास में क्या करना उचित और संपूर्ण फलदायी होता है

आमतौर पर अधिकमास में हिंदू श्रद्धालु व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं, उनके पापों का शमन करते हैं और उनकी समस्त इच्छाएं पूरी करते हैं।